उत्तराखंड में आपदाओं से मुक्ति के लिए क्यों होती थी बेडवार्त परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा हिमालयीलोग की प्रस्तुति ,नई दिल्ली www.himalayilog.com     /  www.lakheraharish.com हिमालयी क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास, लोक, भाषा, सरोकारों आदि को देश- दुनिया के सामने रखने के लिए हिमालयीलोग चैनल लाया गया है।  उत्तराखंड में कभी महामारी, अकाल आदि प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति पाने के लिए भगवान को प्रसन्न करने के लिए...
हिमालयीलोग ट्रस्ट का कार्यक्रम : राजेंद्र धस्माना व्याख्यानमाला -1 नयी दिल्ली। हिमालयीलोग ट्रस्ट गांधीवादी पत्रकार राजेंद्र धस्माना की स्मृति में प्रतिवर्ष ‘राजेंद्र धस्माना व्याख्यानमाला’ का आयोजन करेगा। इस साल का पहला राजेंद्र धस्माना व्याख्यान शनिवार, 21 सितंबर 2019 को यहां उत्तराखंड सदन में आयोजित किया गया। व्याख्यानमाला में इस बार दो विषय थे। 1- हिमालय की विलुप्त होती टांकणी लिपि- श्री रमेश...
प्राचीन ग्रंथों में तपोभूमि हिमवन्त बदरीकाश्रम, उत्तराखंड केदारखण्ड आदि नाम से प्रसिद्ध भू-भाग का नाम गढ़वाल सन् 1950 ई. के आसपास पड़ा। ख्याति प्राप्त इतिहासकारों का यह मत है कि उस वक्त इस प्रदेश में बावन या चौंसठ छोटे-छोटे सामन्तशाही ठाकुरगढ़ थे। ऋग्वेद में इन गढ़ों की संख्या 100 है। इसलिए अनेक गढ़ वाले देश अर्थात गढ़वाला या गढ़वाल...
  परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा हिमालयीलोग की प्रस्तुति, नई दिल्ली जै हिमालय, जै भारत। हिमालयीलोग के इस यूट्यूब चैनल में आपका स्वागत है। मैं जर्नलिस्ट डा. हरीश चंद्र लखेड़ा । आप जानते ही हैं कि उत्तराखंड में कुछ समय तक नेपाल के गोरखों का भी शासन रहा है। गढ़वाल में 12  साल और कुमायुं में 22 साल तक गोरख्याली/ गोख्याणी रहा...
बहुत पुरानी बात हह। उत्तराखंड के सभी गावों की तरह डंणु गांव के लोग भी अपने ग्राम देवता की पूजा करने के लिए हर मौसम में मंदिरों में जाते थे। थे। गांव के सभी लोग उस देवता की कृपा से सुखी और संपन्न रहते थे। वे हर फसल के कट चुकने पर देवताओं को चढ़ावा चढ़ाने दूर एक स्थान...
हिमालय की बेटी गौरा देवी को भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में याद किया जाता है। जंगलों को बचाने के लिए पेड़ों पर चिपकने का रास्ता उन्होंने ही दिखाया था। इसी वजह से इसे चिपको आंदोलन कहा जाने लगा। उत्तराखंड में जन प्रतिरोधों की परम्परा में यह आंदोलन अपना विशिष्ट स्थान रखता है। जहां एक ओर इस आंदोलन...
लंबे समय तक क्यों  एक-दूसरे से किलसते रहे गढ़वाली और कुमायुंनी ?     परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा    हिमालयीलोग की प्रस्तुति, नई दिल्ली      www.himalayilog.com  /    Sampadkiya News यूट्यूब चैनल     www.lakheraharish.com     E- mail- himalayilog@gmail.com जै हिमालय, जै भारत। हिमालयीलोग के इस यूट्यूब चैनल में आपका स्वागत है। मैं जर्नलिस्ट डा. हरीश चंद्र लखेड़ा इस बार एक ऐसे विषय पर बात करने जा रहा...
कैसे बने कुमायुंनी ब्राह्मणों के जाति संज्ञानाम परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा हिमालयीलोग की प्रस्तुति, नई दिल्ली www.himalayilog.com  / www.lakheraharish.com गढ़वाल (Garhwal) के ब्राह्मणों और जजमानों के बाद अब कुमायुं के ब्राह्मणों (Brahmins of Kumaon)के इतिहास पर यह लेख है।  इसके बाद कुमायुं के जजमानों के बारे में लिखूंगा।   मैं  पहले ही साफ कर देता हूं कि मेरा उद्देश्य इतिहास की जानकारी देना ...
हम भारतीय लोग बहुत पाखंडी हैं। गंगा- यमुना को कहते तो मां हैं लेकिन उनको गंदा नाले में बदल दिया है। अब उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले के बाद सभी की नजर है कि अब केंद्र से लेकर राज्यों की विभिन्न सरकारें इस मामले में क्या करती हैं। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बीते 21 मार्च को गंगा और यमुना को...
  परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा हिमालयीलोग की प्रस्तुति, नई दिल्ली www.himalayilog.com  / www.lakheraharish.com    जै हिमालय, जै भारत। मैं जर्नलिस्ट डा. हरीश चंद्र लखेड़ा इस बार एक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख कर रहा हूं, जब  गढ़वाल की यात्रा पर आए एक प्रधानमंत्री को  सरोला बामण का बनाया स्वादिष्ट भोजन पसंद आ गया था। जब तक मैं इस घटना का उल्लेख करूं, तब तक...
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