हिंदी पत्रकारिता के जनक व कुमायुंनी और खड़ी बोली के आदि कवि गुमानी पंत की धरती उत्तराखंड की पत्रकारिता आज पथभ्रमित हो चली है। प्रदेश में कुकरमुत्तों की तरह निकल रहे पत्र-पत्रिकाओं खबरिया चैनल और वेबसाइट देखकर स्पष्ट हो जाता है कि इन सभी की प्राथमिकता यहां के जनसरोकार नहीं हैं, बल्कि पत्रकारिता की आड़ में अपने विभिन्न व्यवसायों...
एक गांव में एक विधवा औरत और उसकी 6-7 साल की बेटी रहते थे। किसी प्रकार गरीबी में वो दोनों अपना गुजर बसर करते थे। एक बार माँ सुबह सवेरे घास के लिए गयी और घास के साथ काफल भी तोड़ के लायी। बेटी ने काफल देखे तो बड़ी खुश हुई। माँ ने कहा कि मैं खेत में काम...
परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा
हिमालयीलोग की प्रस्तुति, नई दिल्ली
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जै हिमालय, जै भारत। मैं जर्नलिस्ट डा. हरीश चंद्र लखेड़ा इस बार गढ़वाल के गढ़ों के बारे में जानकारी दे रहा हूं। इसके बाद कुमायुं समेत हिमालयी क्षेत्रों के गढ़ों (Garhwal, Garh, Garhi, Forts of Uttarakhand)की जानकारी देने का प्रयास दूंगा।
जब तक मैं आगे बढूं, तब...
जलते अंगारों के कुंड में क्या कोई मानव चल सकता है? जी हां ऐसे दृश्य देखते हैं तो उत्तराखंड चले आइए। यहां जागरों व देव पूजन के समय यह सब देखा जा सकता है।
हाल में भी केदारघाटी यक्षराज (जाख देवता) की पूजा के समय ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। यहां मंदिर परिसर में आग का कुंड बनाया गया...
Uttarakhand
चक्रवर्ती सन्यासी जगद्गुरु आदि शंकराचार्य : भरतखंड को एकसूत्र में बांध गया वह नंबूदरी ब्राह्मण
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केदारेश्वर में चिरविश्राम कर रहे हैं आदि शंकराचार्य
परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा
हिमालयीलोग की प्रस्तुति, नई दिल्ली
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जगद्गुरु आदि शंकराचार्य को भगवान भोलेनाथ शिव का अवतार माना जाता है। उनका इस धरा पर उस कालखंड में पदार्पण हुआ, जब सनातन धर्म भारत भूमि में लगातार क्षीण होता जा रहा था। उस कालखंड में सनातन धर्म यानी हिंदू धर्म को...
कैसे बने कुमायुंनी ब्राह्मणों के जाति संज्ञानाम
परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा
हिमालयीलोग की प्रस्तुति, नई दिल्ली
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गढ़वाल (Garhwal) के ब्राह्मणों और जजमानों के बाद अब कुमायुं के ब्राह्मणों (Brahmins of Kumaon)के इतिहास पर यह लेख है। इसके बाद कुमायुं के जजमानों के बारे में लिखूंगा। मैं पहले ही साफ कर देता हूं कि मेरा उद्देश्य इतिहास की जानकारी देना ...
पहली गढ़वाली फिल्म ‘जग्वाल’ के निर्माता पारासर गौड़ अब सात समंदर पार कनाडा में रहते हैं। 1983 में बनी इस फिल्म के आने के बाद उत्तराखंड में गढ़वाली और कुुमांउनी फिल्मों के निर्माण के दरवाजे खुल गये। अब तक दो दर्जन से ज्यादा फिल्में बन चुकी हैं।
पारासर को गढ़वाली फिल्मों के दादा साहेब फालके कहा जा सकता है। उनका...
घुघुती -बसूती, क्या खैली, दुधभाती!
याद है आपको मां की सुनाई यह लोरी
घुघुती -बसूती, क्या खैली, दुधभाती,
कु देलो, मां देली----
याद है आपको यह लोरी। बचपन में मां-दादी, नानी, मौसी आदि की सुनाई यह लोरी आज भी हमारे मन-मस्तिष्क में छाई है। लेकिन अब इसे हम भूलते जा रहे हैं।
शहरों में रह रहे उत्तराखंडी शायद ही अपने बच्चों को इसे सुनाते...
जै हिमालय, जै भारत।
परिकल्पना- डा. हरीश चन्द्र लखेड़ा
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उत्तराखंड के गांवों के किसी भी परिवार में 1863 तक शराब पीने वाला एक भी व्यक्ति नहीं था। तत्कालीन कुमायुं के सीनियर कमीश्नर ने 1863 में आबकारी विभाग को भेजी रिपोर्ट में लिखा था कि पहाड़ के लोग नशे के व्यसन से मुक्त...
परिकल्पना- डा. हरीश चंद्र लखेड़ा
हिमालयीलोग की प्रस्तुति /नयी दिल्ली
दोस्तों, इस बार आपके लिए उत्तराखंड की राजनीति के एक महत्वपूर्ण पहलू को लेकर आया हूं। 9 नवंबर 2000 को भारत के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए इस हिमालयी राज्य को मुख्यमंत्री तो बहुत मिले, लेकिन एक भी ऐसा नहीं मिला, जो राजनीतिक व सार्वजनिक जीवन के मानदंडों...




























