उत्तराखंड के फलों  में  एक ऐसा फल जिसे सिर्फ सोचकर मुह में पानी आ जाता है वह है हिसर, hisar या हिंसालु  ।यह फल चीड़ के जंगल में पाया जाता है। अक्सर  यह  फल माल मवेशी चराने वाले बच्चे तोड़ कर लाते हैं और फिर सब इसके मीठे  स्वाद का मजा लेते हैं। इसे अंग्रेजी में हिमालयन येलो रसबेरी कहा जाता है ।यह एक झाड़ीनुमा पौधा चीड़ के जंगल में पाया जाता है जिसका वैज्ञानिक  नाम Rubus ellipticus  है जो Rosaceae परिवार का पौधा है। भारत तथा दक्षिणी अफ्रीका का मूल पौधा होने पर यह  श्रीलंका,भुटान,विएतनाम ,चीन,म्यांमार ,फि़लीपीन्स,ऑस्ट्रेलिया ,हवाई में भी पाया जाता है। मेरे ख्याल से यह  हिमालय का सबसे स्वादिष्ट जंगली फल है।  यह छाया में तथा खुले में हर जगह पाया जाता है। यह घनी झाडी का रूप ले लेती जिसकी वजह से यह दूसरे किसी पौधे को वहां पनपने नही देती ,एक  झाड़ीनुमा सीधा पौधा जो 2 से 5  मीटर तक ऊँचा  जिसकी शाखा पर लाल रंग के छोटे छोटे कांटे होते हैं  इसे दूसरे पेड़ पौधों पर चढ़ते भी देखा गया है।जिसके कारण इसे जानवर नही खाते और यह अपना अस्तित्व आज भी बनाए हुए है।  यह एक ऐसा पौधा है जिसके पत्ते 3 एक साथ होते तथा दिल के आकर के होते हैं , जो 5-10 सेंटीमीटर लम्बे तथा 2-3 इंच चोड़े , जिसकी ऊपरी सतह गहरी तथा निचली सतह हल्के हरे रंग की होती है। ऊपरी सतह पर बारीक़ कॉन्टे होते हैं। छोटा सा सफेद रंग का फूल  शाखा के सबसे ऊपरीजो 5 पंखडुयों का रहता है हर किसी का मन मोह लेता है। फल गर्मी के मौसम में पिले रंग का रहता है जो अक्सर जंगलो मे देखने को मिलता है।
भारत में इसे अगल अलग नाम से जाना जाता है असम में जोतेलपोका हिमाचल में आखे,आखी,अनचु, हिंदी में हिंसालु,आंचु कश्मीरी में गौरीफल ,हिसारा ,गढ़वाली में हिंसार,हिसर,हिशालु,जोगिया हिसालु नेपाल में टोलु तथा असेलु पंजाब में आखि तथा जम्मू में आखरे कहा जाता है।
यह 2000 से 5000 फुट ऊंचाई तक पाया जाता है यहाँ 1250 से 7000 मिलीमीटर तक बारिश होती हो। यह नमी वाली जगह या पानी के किनारे पाया जाता है।पाकिस्तान मे इसे खेत की बाढ़ के लिए लगाया जाता है तथा पत्ते बकरी को खिलाए जाते हैं।यह जड़ से तथा बीज से खुद ही तैयार हो जाता है।हवाई मे 1960 में इसे एक शोभादार पौधे के रूप मे लगाया गया था पर इसके हर माहोल के अनुकूल खुद को ढाल लेना आज इस महाद्वीप के लिए  एक आक्रामक खरपतवार बन गया है। ऐसा देखने को मिलता है की जब जंगल को आग लगती है तो इसकी जड़ें नंगी हो जाती है और जैसे ही अनुकूल वातावरण मिलता है वहीं से एक नया पौधा तैयार हो जाता है। फल स्वादिष्ट होने के कारण पक्षी ,जानवर तथा इंसान द्वारा एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है जो किसी भी वातावरण में खुद को डालकर पनपने लगता है।
हिमालयन येलो रसबेरी एक औषधिय पौधा है जो जंगल में कुदरती तरीके से पाया जाता है। तिब्बत में इसे तरह तरह की दवाई बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। वहाँ इसका पंचांग इस्तेमाल किया जाता है।यह   typhiod बुखार कम करता है। इसकी छाल का भितरी हिस्सा गुर्दे का टॉनिक है तथा गैस को भी कम करता है।यह हैजा तथा पेचिस में भी काम आता है। जड़ की पेस्ट जख्म को जल्दी भरती है।फल बुखार कम करता है तथा गला खराब होने पर लाभदायक होता है।अगर कोई अपना मानसिक सन्तुलन खो रहा हो तो उसके लिए यह फल लाभदायक व शक्तिवर्दक होता है।
कुछ शोधकर्ताओं का कहना है की इससे मिलने वाला  titerpehoids मिर्गी को ठीक करके दिमागी संतुलन बनाता है।यह antio&idant & antimicrobial और  antiinflammatory  है। इस फल की जीवनावधि बहुत कम होती है इस लिए अगर उसी दिन ना खाया गया तो खराव हो जाता है। इसकी जड़ से क्वाथ बनाया जाता है जिसमे tannins तथा  polyphenols  और saccharides पाए जाते हैं जिससे त्वचा के लिए moisturiser बनता है जिसे अगर गुलाब के तेल या गुलाब जल में मिला कर अगर इस्तेमाल किया जाए तो अच्छे नतीजे मिलते हैं।
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(दिल्ली में रह रही नंदनी बड़थ्वाल फोरेस्ट्री में एम.एस-सी. हैं। वे उत्तराखंड के मुद्दों पर लगातार लिख रही हैं। हिसालु या हिसार का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। हिमालयी क्षेत्र का यह फल अपने आप में अनोखा है। नंदनी बड़थ्वाल इस बार इसी हिंसालु को लेकर जानकारी दे रही हैं। नंदनी जी का आभार)
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