चिपको आंदोलन: हिमालय की बेटी गौरा देवी

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हिमालय की बेटी गौरा देवी को भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में याद किया जाता है। जंगलों को बचाने के लिए पेड़ों पर चिपकने का रास्ता उन्होंने ही दिखाया था। इसी वजह से इसे चिपको आंदोलन कहा जाने लगा। उत्तराखंड में जन प्रतिरोधों की परम्परा में यह आंदोलन अपना विशिष्ट स्थान रखता है। जहां एक ओर इस आंदोलन ने जन को वन से जोड़ा है, वहीं दूसरी ओर यह भी कर दिखाया है कि भूमि से जुड़े लोग स्वयं यदि अपनी आवश्यकताओं, सोच और व्यावहारिकता के अनुरूप नीति निर्धारित करेंगे तो ऐसी नीति उनके लिए उस नीति से सदैव, अधिक सार्थक होगी, जो दिल्ली और लखनऊ के वातानुकूलित कक्षों में बैठकर कागजी आंकड़ों के आधार पर बनाई जाती रही है। साथ ही, यह भी आवश्यक नहीं है कि समस्याओं का समाधान नौकरशाह और बुद्धिजीवी सोचें। यह कार्य उन समस्याओं से रोजमर्रा जूझने वाले भी कर सकते हैं। चिपको की पृष्ठिभूमि और योजना इसी का जीवंत उदाहरण है।


उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में इस शताब्दी के प्रारंभ से ही, अंग्रेजों द्वारा वन संपदा की लूट प्रारंभ हुई। वनों का अर्थ केवल लकड़ी हो गया और इसी कारण वन व्यापारिक दोहन के पर्याय बनकर रह गए। यह नही समझा गया कि मात्र पेड़ वन नहीं हैं, वनों को अस्तित्व में आने में शताब्दियां लग जाती हैं। वनों की यह लूट स्वतंत्रता के बाद भी चलती रही। जनता भी इसे अपना भाग्य समझकर झेलती रही। जनता का रोष तब बढ़ा जब वृक्षों की उन्हीं प्रजातियों का व्यापारिक स्तर पर कटान होने लगा, जो जन सामान्य द्वारा अपने कृषि उपकरण बनाने व अन्य दैनिक प्रयोग में लाई जाती थीं। अत: मूलभूत समस्या थी कि पेड़ों को कैसे बचाया जाए अर्थात पेड़ों का कटान कैसे रोका जाए। यह कार्य वन विभाग के निर्देशन में सुनियोजित ढंग से वनीय, ठेकेदारों के मजदूरों द्वारा किया जाता था जो जनसामान्य में से ही होते थे। अंतत: प्रतिकार का स्वत: स्फूर्त ऐसा ढंग सामने आया, जो ‘चिपको’ के नाम से विख्यात हो गया।


अप्रैल 1973 में दशौली ग्राम स्वराज्य संघ, गोपेश्वर द्वारा इसकी योजना बनाई गई और तय हुआ कि कुल्हाड़ी का वार पेड़ पर नहीं अपितु अपनी पीठ पर झेला जाएगा। सर्वप्रथम केदार घाटी में कटान हेतु फाटा-रामपुर में पेड़ों का छपान होने पर इस नीति को अपनाया गया। दशौली ग्राम स्वराज्य संघ के मंत्री शिशुपाल सिंह कुंवर ने क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं और गोपेश्वर से आई महिलाओं ने फाटा-रामपुर के स्थानीय ग्रामीणों को पेड़ों से चिपकने हेतु प्रेरित किया और पेड़ काटने वालों को खाली हाथ लौटना पड़ा।


ग्राम्य और वन्य जीवन से जुड़ी जनता के लिए अब यह समझना सहज हो गया था कि सरकार जंगल काटने का प्रयास करेगी और हमें उन्हें बचाना होगा। इसी क्रम में दशौली ग्राम स्वराज्य संघ के प्रसिद्ध कार्यकर्ता श्री चंडी प्रसाद भट्ट को विशेष सक्रिय होना पड़ा, 26 मार्च, 1974 को जोशीमठ से बसों द्वारा मजदूरों को रैणी पहुंचाया गया। रैणी गांव की महिलाओं को जब यह सूचना मिली कि कुछ अजनबी लोग जंगल के नजदीक पहुंच रहे हैं, तो रैणी की ही गौरा देवी ने प्रतिकार करने का मन बनाया और २७ महिलाओं  के साथ रैणी के जंगल की ओर प्रस्थान किया। उनके साथ जाने वालों में 6 तो मात्र 10 से 16 वर्ष की बच्चियां ही थीं। रैणी गांव में जंगल कटान की पूरी तैयारी थी। कुल्हाड़ियां तैयार की जा रही थीं और वन विभाग के कर्मचारी व ठेकेदार आराम कर रहे थे। स्त्रियों के वहां पहुंचने पर ठेकेदारों को क्रोध आना स्वाभाविक था। गौरा देवी व उनकी साथियों ने अनुनय-विनय का ही मार्ग अपनाया। यहां तक कहा कि वन हमारा मायका है। ‘यदि पेड़ों को काटोगे तो हम विवश होकर उनसे चिपक जाएंगे। इस पर भी नशे में धुत एजेंटों और बंदूकधारी कर्मचारियों ने धमकी दी। तब स्पष्ट शब्दों में कह दिया गया कि हम यहां छाती पर गोली और पीठ पर कुल्हाड़ी खाने के लिए तैयार होकर आई हैं। स्त्रियों की दृढ़ता के कारण मजदूर और ठेकेदार बगैर जंगल काटे ही नीचे से वापस लौट गए। इस प्रकार यह एक बहुत बड़ी सफलता का सूचक और जनसंकल्प का परिणाम ही माना जा सकता है। गौरा देवी और उनकी साथियों के दृढ़ संकल्प ने चंडी प्रसाद भट्ट को अभिभूत कर दिया और उत्तराखंड की धरती ‘चिपको’ की गूंज से आंदोलित होने लगी। धीरे-धीरे यह आंदोलन देश-दुनिया में मशहूर हो गया।

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