जम्मू विश्वविद्यालय में पत्रकारिता व जन संचार विभाग के प्रुमख डा. गाविंद सिंह सज्जनता का दूसरा नाम हैं।  दिल्ली में पत्रकारिता में लंबी पारी खेल चुके डा. गोविंद सिंह अब पत्रकार तैयार करने में लगे हैं। इससे पहले वे उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी में पत्रकारिता व जन संचार विभाग के प्रुमख रहे हैं। डा. गोविंद सिंह जैसे बहुत कम लोग...
विकास चाहिए तो केंद्र पर दबाव बनाएं हिमालयी राज्य ले. जनरल मदन मोहन लखेड़ा (पूर्व राज्यपाल मिजोरम) जनरल लखेड़ा का मानना है कि आजादी के बाद हिमालयी राज्यों का जिस तेजी से विकास होना चाहिए था, वह नहीं हुआ है। जल और जंगल समेत अधिकतर प्राकृतिक संसाधन हिमालयी राज्यों के हैं, लेकिन उनका फायदा मैदानी लोगों को ज्यादा मिलता है। वह...
नई दिल्ली। दिल्ली से लेकर उत्तराखंड में जिस किताब से रामलीला का मंचन किया जाता है उसके लेखक थे छम्मी लाल ढौंडियाल। ढौंडियाल का दिल्ली में 23 अप्रैल को देहांत हो गया है । हिमालयीलोग  छम्मीलाल ढौंडियाल की भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। उनकी किताब का नाम था -- ‘श्री संपूर्ण रामलीला अभिनय’ । अब तक इस किताब के 20 संस्करण...
नदी की तरह बहता रहा, समुद्र में जाकर ही मिलना है व खारा होना है --वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र धस्माना महात्मा गांधी या गांधीवाद, हिमालय या रेगिस्तान, वामपंथ हो या पूंजीवाद यानी भी कोई विषय, राजेन्द्र धस्माना इस तमाम विषयों का चलता-फिरता इन्साइक्लोपीडिया हैं। किसी भी मुद्दे पर नये विचार रख सकते हैं। दूरदर्शन में समाचार संपादक रहने के बाद सम्पूर्ण गांधी...
साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी कवि  वीरेन डंगवाल का जन्म  5 अगस्त 1947   को  कीर्तिनगर, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड में हुआ। उनकी माँ एक मिलनसार धर्मपरायण गृहणी थीं और पिता स्वर्गीय रघुनन्दन प्रसाद डंगवाल प्रदेश सरकार में कमिश्नरी के प्रथम श्रेणी अधिकारी थे ।डंगवाल ने मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल और अन्त में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने...
नई दिल्ली। हिमालयपुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म दिवस 25  अप्रेल, को देश भर में संकल्प दिवस के रूप में मनाया गया. एक साधारण परिवार से सम्बद्ध , अकूत संघर्षों के मार्फ़त देश ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय राजनीती में अपना विशिष्ठ स्थान बनाने वाली एक अदद हस्ती  थे, जिसने जन्म तो लिया गढ़वाल , उत्तराखंड के एक छोटे से...
पहली गढ़वाली फिल्म ‘जग्वाल’ के निर्माता पारासर गौड़ अब  सात समंदर पार कनाडा में रहते हैं। 1983 में बनी इस फिल्म के आने के बाद उत्तराखंड में गढ़वाली और कुुमांउनी फिल्मों के निर्माण के दरवाजे खुल गये। अब तक दो दर्जन से ज्यादा फिल्में बन चुकी हैं। पारासर को गढ़वाली फिल्मों के  दादा साहेब फालके कहा जा सकता है। उनका...
नई दिल्ली। उनके द्वार से कोई भी निराश हो कर नहीं जाता है। उत्तराखंड  ही नहीं, देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोग उनके पास मदद की आस लेकर आते हैं और वे उनकी मदद भी करते हैं। जी हां, बात हो रही है भोले महाराज औ माता मंगला जी की। उत्तराखंड मूल के संत दिल्ली में रहते हैं। उनका हंस...
शहीद श्रीदेव सुमन महान क्रांतिकारी थे।  श्रीदेव सुमन के संघर्ष ने टिहरी रियासत की चूलें हिला दी थीं। वे अहिंसावादी स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने टिहरी जेल में एक बार नहीं बल्कि दो बार आमरण अनशन किया। दूसरी बार 84 दिनों तक जेल के भीतर आमरण अनशन करते हुए श्रीदेव सुमन ने 25 जुलाई, 1944 को अपने प्राण त्याग दिये।  ...

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