ईजा को देखती हूँ बातें करते गाढ़ गधेरों, नदियों से और कभी कभी पहाड़ों से तो महसूस हुआ यकीनन पहाड़ों में औरतें दो तरह की होती हैं एक नदी और दूसरी पहाड़ सी नदी सी औरत बस बहती है संवेदनाओं के सुरों में कभी चंचल, कभी शान्त कभी मुखर भावों में अनजानी राहों में हिम सी पिघलती हुयी छोड़  आती है अपनी ऊँचाई,अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने मन के अबाध सौन्दर्य से खुद को...
नेपाली या खस कुरा नेपाल की राष्ट्रभाषा है । यह भाषा नेपाल की लगभग ४४ लोगों की मातृभाषा  है। यह भाषा नेपाल के अतिरिक्त भारत के सिक्किम, पश्चिम बंगाल, उत्तर-पूर्वी राज्यों असं असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय तथा उत्तराखण्ड के अनेक भारतीय लोगों की मातृभाषा है। भूटान, तिब्बत और म्यानमार के भी अनेक लोग यह भाषा बोलते हैं।नेपाल भाषा...
फूलों को कुचलते हुए दौड़ रहे हैं दिशाहीन हो हमारी नदियों और झरनों को रोक रहे हैं दिशाहीनता में इनकी दिशाहीनता अन्यमनस्कता में हृदयहीनता में हम पीड़ा ग्रस्त हो रहे हैं यह पृथ्वी रोगाक्रांत हो रही है यहां बैठकर मैं स्वयं को खा रहा हूं। मेरे हृदय में चरचरा रहे घाव की यह पीड़ा मात्र है, सिर्फ दर्द और टीस है। तुम जाओं इसी विश्वास में मैं भीगा लथपथ बैठा हूं। तुम...
 ......लौट भी आओ ना पहाड़ / देखो ना /  ये नदी और झरने कुछ कह रहे हैं तुमसे  / सुनो तो सही इनकी प्यारी बातें  / जैसे कि पुकार रही हैं  तुमको / कि अब तो लौट आओ पहाड़ /  ............ देखो वो नीले आकाश में /  चमक रहे हैं सितारे बस तुम्हारे लिए / ये बुरांश, ग्वीराल भी तो खिले हैं तुम्हारे लिए   / अपने मन...
पहाड़ के दुःख आपदा ग्रस्त असहाय लोग खाली पड़े मकान व् बंजर होती धरती वीरान होते प्रखंड बिरह अग्नि की ज्वाला दहक रही प्रचंड हे प्रवासी बंधुओ अब अपनी मातृ भूमि को न होने दो खण्ड खण्ड स्मरण रहे ये उत्तराखंड है अखंड/// जहाँ एक तरफ युवाओं का चौपट होता भविष्य है तो दूसरी ओर मादक पदार्थों का विषम विष है दूषित होती नदियां बर्गलाई जाती नाजुक कलियाँ हे प्रवासी बंधुओ अब अपनी मातृ भूमि को न...
माँ तू अब कितना बदल गई है, माँ सच तू वही तो है न? पहले एक चीख पर दौड़ आती थी, मुझसे पहले दर्द तुम्हें सताता था, बिन लोरी तेरे सो न पति थी, एक कहती तू दस सुनाती थी, सोचती कहीं चुप हुई और में उठ न जाऊं, माँ अब एक लोरी को तरस रही हूँ, सच माँ तू कितना बदल गई है।। स्कूल से आती तू...
--- दीपशिखा गुसाईं  / मेरे पहाड़ की नारी मेरे पहाड़ की नारी हिम्मत उसकी भारी। पहाड़ सा जीवन हर पल जीती,, रहती सदा मुस्कुराती। जब भी सोचा, जब भी देखा,, उसे जीवन से लड़ते देखा। चाहे हो बर्फीली सुबह या ठण्ड से ठिठुरती रात,, कभी न होती निढाल कभी न माने हार। 'रतब्याणी' ही उठ कर 'कल्यो' रोट बनाती,, 'गौड़ी' दुहने के बाद, जाने कब 'बोण' को जाती, 'सुल्येटे' में घास के पूले, इतने न गिन पाते,, कैसे चट्टानी रास्तों...
नई दिल्ली।  हिंदी पत्रकारिता में भारतेंदु हरिश्चंद्र को पहला पत्रकार माना जाता है लेकिन हिंदी व् कुमाउनी के आदि कवि गुमानी पंत (जन्म 1790-मृत्यु 1846, रचनाकाल 1810 ईसवी से) ने अंग्रेजों के यहां आने से पूर्व ही 1790 से 1815 तक सत्तासीन रहे महा दमनकारी गोरखों के खिलाफ कुमाउनी के साथ ही हिंदी की खड़ी बोली में कलम चलाकर एक...
डोगरी भारत के जम्मू और कश्मीर प्रान्त में बोली जाने वाली एक भाषा है। वर्ष 2004 में इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। पश्चिमी पहाड़ी बोलियों के परिवार में, मध्यवर्ती पहाड़ी पट्टी की जनभाषाओं में, डोगरी, चंबयाली, मडवाली, मंडयाली, बिलासपुरी, बागडी आदि उल्लेखनीय हैं।डोगरी भाषा भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य की दूसरी मुख्य भाषा है।...
ए मेरे पहाड़ कब तक तू/ अपनों की वापसी के लिए गिड़गिड़ायेगा / बहुत हुआ तू अब न अपने को यूँ तड़पाएगा/ जो गए वो अपने थे / लौट के आएंगे ये अब सपने है/ जो बचा है उसकी परवरिश की सोच/ नयी राहों की कर तलाश / बांस और निंगाल को तराश/ उफनती नदियों व् / धंसती धरती पर लगा अंकुश/ बृक्षों की पाट दे अपार श्रृंखला / पुष्पों...

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