"तेरा ठहराव तीरथ बने , तेरा फैलाव वरदान हो" .... पिछले दिनों नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा को एक जीवित संज्ञा माना। कोर्ट के इस निर्णय के अपने निहितार्थ हैं मगर जिस रोज यह आया, अब तक अज्ञात ही रहे कवि उमाशंकर बडूनी की रचना "गंगावतरण" सजीव हो उठी। कवि आज हमारे बीच में नहीं है और उनका काम भी उनके...
पहाड़ के दुःख आपदा ग्रस्त असहाय लोग खाली पड़े मकान व् बंजर होती धरती वीरान होते प्रखंड बिरह अग्नि की ज्वाला दहक रही प्रचंड हे प्रवासी बंधुओ अब अपनी मातृ भूमि को न होने दो खण्ड खण्ड स्मरण रहे ये उत्तराखंड है अखंड/// जहाँ एक तरफ युवाओं का चौपट होता भविष्य है तो दूसरी ओर मादक पदार्थों का विषम विष है दूषित होती नदियां बर्गलाई जाती नाजुक कलियाँ हे प्रवासी बंधुओ अब अपनी मातृ भूमि को न...
क्या हुआ कि दिल से उतर गया कोई। अश्क़ सा आँखों से निकल गया कोई। उसने जाहिर की शख़्सियत उसकी। और मेरे भीतर से...मर गया कोई। किसी रहबर की जरूरत नहीं रही। ऐसा सबक दे के गुज़र गया कोई। अब भी हर बात पे रूँधता है.. गला। कैसे कह दें कि ग़म से उबर गया कोई। वो ख़ंज़र तो था हिफ़ाज़त के वास्ते। और उसी से ...क़त्ल कर...
ये ऊंचे- ऊंचे पहाड़ / बाट देखते रहे/ बाट देख रहे हैं / बाट देखते रहेंगे / कि मेरे / कभी न कभी / जरूर लौटेंगे. देवेन्द्र जोशी, देहरादून
कविता -- अंतहीन इंतज़ार -------चंडीगढ़  से मीनाक्षी मोहन 'मीता' सूने पर्वतों की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों के किनारे हरे-भरे वृक्षों की कतारों से झाँकती, दूर तक निर्जन-पथ को निहारती वो उदास आँखें कर रही हैं आज भी इंतज़ार उस वर्तमान का जो उसके अतीत को सँवरता, महकता रहा जो हर पल उसके संग-संग चल उन आंखों में नए स्वप्न भरता रहा पर.... अपनी आंखों में संजोये अनंत आकाश को छूने के  स्वप्नों को सच...
---- रूचिता बहुगुणा उनियाल   गांव के पीछे घाटी से उतरकर एक नदी बहती थी नदी के पानी में बहता था जीवन,, मछलियों की बिरादरी ,मगरमच्छों के कुटुंब उसमें बहता था जीवन का सार मृत्यु से लेकर जन्म तक जन्म से लेकर मृत्यु तक नदी बहती थी अविरल धारा में अचानक एक दिन,,!! उसकी धारा को रोका गया बहते हुए जीवन को टोका गया अब .... मछलियों के शव तैरते हैं उसके पानी...
कुमाऊँनी भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में बोली जाने वाली एक भाषा/बोली है। इस भाषा को हिन्दी की सहायक पहाड़ी भाषाओं की श्रेणी में रखा जाता है। कुमाऊँनी भारत की ३२५ मान्यता प्राप्त भाषाओं में से एक है और २६,६०,००० (१९९८) से अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। उत्तराखण्ड के निम्नलिखित जिलों - अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर,...
कविता ---याद आता है पहाड़ी गांव  ---  श्रीनगर, उत्तराखंड  से अरविन्द उनियाल, 'अनजान', भुलाना है बहुत मुश्किल बराबर याद आता है । हमें अपना पहाड़ी गाँव अक्सर याद आता है । सवेरे कोयलें आकर, छतों पर  चहचहाती थी । सुनहरी धूप आँगन में उतरकर जगमगाती थी । पकाती रोटियाँ अम्मा, पिताजी हल लगाते थे - झँगोरे-मँडवे की खेतों में फसलें लहलहाती थी । गली, खलिहान, खेतों का...
गढ़वाली भारत के उत्तराखण्ड राज्य में बोली जाने वाली एक प्रमुख भाषा है।    गढ़वाली बोली का क्षेत्र प्रधान रूप से गढ़वाल में होने के कारण यह नाम पड़ा है।     पहले इस क्षेत्र के नाम केदारखंड, उत्तराखंड आदि थे।    यहाँ बहुत से गढ़ों के कारण, मध्ययुग में लोग इसे ‘गढ़वाल’ कहने लगे।     ग्रियर्सन के भाषा- सर्वेक्षण के अनुसार इसके बोलने...
--देहरादून से नीलम पांडेय 'नील' ओ ईजा! सुण,सुण यौ पहाड़ क्ये कूँ रँई यौ नदी, गाढ़ गध्यार यौ खेतों में,लागी हल क्ये कूँ रंई सुण, भली भाँत सुण त्यार भीतेर बै जो आवाज आणै आज, उकै लै सुण तु बटे आवाज लै सुण जो बाट बै कई अपण शहर नैह गई फिर कतुक सालों तलक उँ वापस लै नी आय उनर जाण बाद जो खेत बांझ हैं गयी तु उन खेतोंक आवाज लै सुण पर  तु यौ सुनसान बाटां...

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