यह तेरा हिस्सा है/ कहकर छोटा-सा भू-भाग क्यों देते हो मुझे! / घेरा लगाकर सुंदर बनाने पर भी / यह मुझे कतई पसंद नहीं! / उस घेरे के भीतर / वह घर / उसके अंदर भी कमरे ही कमरे / उन कमरों के अंदर भी अपने-अपने / स्तर और स्थान हैं! / कैसा आश्चर्य! / कैसी चाह / कैसी प्रथा है यहां की ? / तुमुस छोटे से घेरे से घेरे...
ये ऊंचे- ऊंचे पहाड़ / बाट देखते रहे/ बाट देख रहे हैं / बाट देखते रहेंगे / कि मेरे / कभी न कभी / जरूर लौटेंगे. देवेन्द्र जोशी, देहरादून
डोगरी भारत के जम्मू और कश्मीर प्रान्त में बोली जाने वाली एक भाषा है। वर्ष 2004 में इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। पश्चिमी पहाड़ी बोलियों के परिवार में, मध्यवर्ती पहाड़ी पट्टी की जनभाषाओं में, डोगरी, चंबयाली, मडवाली, मंडयाली, बिलासपुरी, बागडी आदि उल्लेखनीय हैं।डोगरी भाषा भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य की दूसरी मुख्य भाषा है।...
नई दिल्ली। कुमायुंनी के साहित्यकार पूरन चंद कांडपाल और गढ़वाली भााषा के साहित्यकार मदनमोहन डुकलाण को क्रमश: 2016 और 2017 के लिए कवि कन्हैयालाल डंडरियाल साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया है। प्रसिद्ध संत भोले जी महाराज व माता मंगला जी और मुख्य अतिथि केन्द्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा ने इन साहित्यकारों के यह सम्मान दिया। यहां कंस्टिट्यूशन क्लब...
गढ़वाली भारत के उत्तराखण्ड राज्य में बोली जाने वाली एक प्रमुख भाषा है।    गढ़वाली बोली का क्षेत्र प्रधान रूप से गढ़वाल में होने के कारण यह नाम पड़ा है।     पहले इस क्षेत्र के नाम केदारखंड, उत्तराखंड आदि थे।    यहाँ बहुत से गढ़ों के कारण, मध्ययुग में लोग इसे ‘गढ़वाल’ कहने लगे।     ग्रियर्सन के भाषा- सर्वेक्षण के अनुसार इसके बोलने...
                      एक तरफ गर्म साँसे है                            एक तरफ ठंडी आहें है                           असमंजस में पड़ा हूँ में                            किस तरफ कदम बढ़ाऊं                             मुझसे ही जुडी दोनों राहें है……….. एक दिखता शैतान बड़ा एक शराफत का दामन थामे है असमंजस में पड़ा हूँ में किसको दुत्कारू किसको गले लगाऊं दोनों ही अपनी संताने है ……….                                    एक कट्टरता की बात करे                                      एक सबको लेकर साथ चले                                 ...
पाण्डवखोली के समीप दूर्णागिरी द्रोणांचल शिखर माया-महेश्वर प्रकृति-पुरुष दुर्गा कालिका क्या हो तुम कहाँ हो तुम सिर्फ हिमालय में या मेरे संर्वाग में हाहाकार करती एक गहन इतिहास छुपाये हिमालय की तलहटी में वर्षो से  एक कौतुहल एक जिज्ञासा मेरी या अबाध आस्था कई बार देखा या यूँ कहो हर बार सुबह उठकर देखा "रानीखेत" से पल पल पिघलते हिमालय को कभी हरे,सफेद, धानी कभी नांरगी बनते फिर शाम के ढलते सूरज में सवंरती पहाड़ियों को वो साक्षी रही तब जब मेरी शिकायतों के अंबार थे किन्तु...
कविता ---याद आता है पहाड़ी गांव  ---  श्रीनगर, उत्तराखंड  से अरविन्द उनियाल, 'अनजान', भुलाना है बहुत मुश्किल बराबर याद आता है । हमें अपना पहाड़ी गाँव अक्सर याद आता है । सवेरे कोयलें आकर, छतों पर  चहचहाती थी । सुनहरी धूप आँगन में उतरकर जगमगाती थी । पकाती रोटियाँ अम्मा, पिताजी हल लगाते थे - झँगोरे-मँडवे की खेतों में फसलें लहलहाती थी । गली, खलिहान, खेतों का...
पहाड़ के दुःख आपदा ग्रस्त असहाय लोग खाली पड़े मकान व् बंजर होती धरती वीरान होते प्रखंड बिरह अग्नि की ज्वाला दहक रही प्रचंड हे प्रवासी बंधुओ अब अपनी मातृ भूमि को न होने दो खण्ड खण्ड स्मरण रहे ये उत्तराखंड है अखंड/// जहाँ एक तरफ युवाओं का चौपट होता भविष्य है तो दूसरी ओर मादक पदार्थों का विषम विष है दूषित होती नदियां बर्गलाई जाती नाजुक कलियाँ हे प्रवासी बंधुओ अब अपनी मातृ भूमि को न...
तीन दशक पहले लिखा गया यह पत्र तब मध्य हिमालयी क्षेत्र में दलितों की दयनीय हालत की कहानी बयां करता है। हालांकि तब से गंगा-यमुना में बहुत सा पानी बह गया है, पहाड़ की परिस्थितियां बद गई हैं। हम एक बार उसी दौर में लौटकर आपको तब के हालात बताना चाहते हैं। ------- जोधालाल शाह ने अपनी पत्नी को लिखे कुछ...

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