तीन दशक पहले लिखा गया यह पत्र तब मध्य हिमालयी क्षेत्र में दलितों की दयनीय हालत की कहानी बयां करता है। हालांकि तब से गंगा-यमुना में बहुत सा पानी बह गया है, पहाड़ की परिस्थितियां बद गई हैं। हम एक बार उसी दौर में लौटकर आपको तब के हालात बताना चाहते हैं। ------- जोधालाल शाह ने अपनी पत्नी को लिखे कुछ...
नई दिल्ली। कुमायुंनी के साहित्यकार पूरन चंद कांडपाल और गढ़वाली भााषा के साहित्यकार मदनमोहन डुकलाण को क्रमश: 2016 और 2017 के लिए कवि कन्हैयालाल डंडरियाल साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया है। प्रसिद्ध संत भोले जी महाराज व माता मंगला जी और मुख्य अतिथि केन्द्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा ने इन साहित्यकारों के यह सम्मान दिया। यहां कंस्टिट्यूशन क्लब...
कहां जाऊं मैं? तुम यही समझते हो ना / कि, तुम्हारे पलायन पर मैं बहुत खुश हुआ था। / कि, मैं इसी ताक में था / कि तुम्हारे हिस्से की थाली हड़पकर / मालामाल हो जाऊं। / कि, तुम्हारी विरासत का एकमात्र मालिक बन / तुम्हारी ज़मीन को मुट्ठी में कैद कर लूं। / कि, श्मशानों में सपनों के महल बनाकर / तुम्हारी हर याद, हर निशान को...
 .................... उपासना सेमवाल हे! विधाता सूण यन रंचणा क्या रचाई त्वैन नौनू अपड़ू खास अर, बेटी बिराणी बणाई त्वैन। ल्वै मासू पीड़ा आंसू, यखु जन बणाई त्वीन फ्यैर इथा बड़ू फरक कनकै ते कराई त्वीन।। मैत्यूं भी पराई हवै , स्वारंयू भी पराई हवै सब्यूं कि जन आंख्यूं मां कीस जन बिनाणी रे।। अर यो बैरी समाज भी ते बेट्यूं तै कसाई बेटी नि छे खाली स्य...
--- दीपशिखा गुसाईं  / मेरे पहाड़ की नारी मेरे पहाड़ की नारी हिम्मत उसकी भारी। पहाड़ सा जीवन हर पल जीती,, रहती सदा मुस्कुराती। जब भी सोचा, जब भी देखा,, उसे जीवन से लड़ते देखा। चाहे हो बर्फीली सुबह या ठण्ड से ठिठुरती रात,, कभी न होती निढाल कभी न माने हार। 'रतब्याणी' ही उठ कर 'कल्यो' रोट बनाती,, 'गौड़ी' दुहने के बाद, जाने कब 'बोण' को जाती, 'सुल्येटे' में घास के पूले, इतने न गिन पाते,, कैसे चट्टानी रास्तों...
फूलों को कुचलते हुए दौड़ रहे हैं दिशाहीन हो हमारी नदियों और झरनों को रोक रहे हैं दिशाहीनता में इनकी दिशाहीनता अन्यमनस्कता में हृदयहीनता में हम पीड़ा ग्रस्त हो रहे हैं यह पृथ्वी रोगाक्रांत हो रही है यहां बैठकर मैं स्वयं को खा रहा हूं। मेरे हृदय में चरचरा रहे घाव की यह पीड़ा मात्र है, सिर्फ दर्द और टीस है। तुम जाओं इसी विश्वास में मैं भीगा लथपथ बैठा हूं। तुम...
एक नदी हूँ मैं। हिमखंड से निकली छोटी सी धारा चलती जा रही हूँ मैं। ना साथी कोई ना कोई सहारा बस अकेले ही सफर पर चली हूँ मैं। मिल गए साथी भी सफर में हो गयी थोड़ी बड़ी मैं। हिला दिया पत्थर को बना लिया रास्ता अपना थोड़ी जि़द्दी हो गयी हूँ मैं। ठान ली समन्दर से मिलने की, मिल कर ही रही हूँ मैं। कोशिश...
--देहरादून से नीलम पांडेय 'नील' ओ ईजा! सुण,सुण यौ पहाड़ क्ये कूँ रँई यौ नदी, गाढ़ गध्यार यौ खेतों में,लागी हल क्ये कूँ रंई सुण, भली भाँत सुण त्यार भीतेर बै जो आवाज आणै आज, उकै लै सुण तु बटे आवाज लै सुण जो बाट बै कई अपण शहर नैह गई फिर कतुक सालों तलक उँ वापस लै नी आय उनर जाण बाद जो खेत बांझ हैं गयी तु उन खेतोंक आवाज लै सुण पर  तु यौ सुनसान बाटां...
कुमाऊँनी भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में बोली जाने वाली एक भाषा/बोली है। इस भाषा को हिन्दी की सहायक पहाड़ी भाषाओं की श्रेणी में रखा जाता है। कुमाऊँनी भारत की ३२५ मान्यता प्राप्त भाषाओं में से एक है और २६,६०,००० (१९९८) से अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। उत्तराखण्ड के निम्नलिखित जिलों - अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर,...
गढ़वाली भारत के उत्तराखण्ड राज्य में बोली जाने वाली एक प्रमुख भाषा है।    गढ़वाली बोली का क्षेत्र प्रधान रूप से गढ़वाल में होने के कारण यह नाम पड़ा है।     पहले इस क्षेत्र के नाम केदारखंड, उत्तराखंड आदि थे।    यहाँ बहुत से गढ़ों के कारण, मध्ययुग में लोग इसे ‘गढ़वाल’ कहने लगे।     ग्रियर्सन के भाषा- सर्वेक्षण के अनुसार इसके बोलने...

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