एक नदी हूँ मैं। हिमखंड से निकली छोटी सी धारा चलती जा रही हूँ मैं। ना साथी कोई ना कोई सहारा बस अकेले ही सफर पर चली हूँ मैं। मिल गए साथी भी सफर में हो गयी थोड़ी बड़ी मैं। हिला दिया पत्थर को बना लिया रास्ता अपना थोड़ी जि़द्दी हो गयी हूँ मैं। ठान ली समन्दर से मिलने की, मिल कर ही रही हूँ मैं। कोशिश...
ईजा को देखती हूँ बातें करते गाढ़ गधेरों, नदियों से और कभी कभी पहाड़ों से तो महसूस हुआ यकीनन पहाड़ों में औरतें दो तरह की होती हैं एक नदी और दूसरी पहाड़ सी नदी सी औरत बस बहती है संवेदनाओं के सुरों में कभी चंचल, कभी शान्त कभी मुखर भावों में अनजानी राहों में हिम सी पिघलती हुयी छोड़  आती है अपनी ऊँचाई,अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने मन के अबाध सौन्दर्य से खुद को...
ए मेरे पहाड़ कब तक तू/ अपनों की वापसी के लिए गिड़गिड़ायेगा / बहुत हुआ तू अब न अपने को यूँ तड़पाएगा/ जो गए वो अपने थे / लौट के आएंगे ये अब सपने है/ जो बचा है उसकी परवरिश की सोच/ नयी राहों की कर तलाश / बांस और निंगाल को तराश/ उफनती नदियों व् / धंसती धरती पर लगा अंकुश/ बृक्षों की पाट दे अपार श्रृंखला / पुष्पों...
एक दिन दुःखी होकर धरती ने कहा नील गगन से देख अत्याचार मुझ पर तू भी तो दुःखी होता है मन मे बस मुझ पर तू इतनी दया करना अपने आगोश मे छुपे बादलों से कहना कि तुम अब की बार जोरों से बरसना ताकी हरा भरा हो जाये धरती का कोना बोला नील गगन तुझ पर यूँ ही अगर जंगल साफ होते जायेंगे तो मेरे आगोश...
 ......लौट भी आओ ना पहाड़ / देखो ना /  ये नदी और झरने कुछ कह रहे हैं तुमसे  / सुनो तो सही इनकी प्यारी बातें  / जैसे कि पुकार रही हैं  तुमको / कि अब तो लौट आओ पहाड़ /  ............ देखो वो नीले आकाश में /  चमक रहे हैं सितारे बस तुम्हारे लिए / ये बुरांश, ग्वीराल भी तो खिले हैं तुम्हारे लिए   / अपने मन...
नई दिल्ली।  हिंदी पत्रकारिता में भारतेंदु हरिश्चंद्र को पहला पत्रकार माना जाता है लेकिन हिंदी व् कुमाउनी के आदि कवि गुमानी पंत (जन्म 1790-मृत्यु 1846, रचनाकाल 1810 ईसवी से) ने अंग्रेजों के यहां आने से पूर्व ही 1790 से 1815 तक सत्तासीन रहे महा दमनकारी गोरखों के खिलाफ कुमाउनी के साथ ही हिंदी की खड़ी बोली में कलम चलाकर एक...
कहां जाऊं मैं? तुम यही समझते हो ना / कि, तुम्हारे पलायन पर मैं बहुत खुश हुआ था। / कि, मैं इसी ताक में था / कि तुम्हारे हिस्से की थाली हड़पकर / मालामाल हो जाऊं। / कि, तुम्हारी विरासत का एकमात्र मालिक बन / तुम्हारी ज़मीन को मुट्ठी में कैद कर लूं। / कि, श्मशानों में सपनों के महल बनाकर / तुम्हारी हर याद, हर निशान को...
"तेरा ठहराव तीरथ बने , तेरा फैलाव वरदान हो" .... पिछले दिनों नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा को एक जीवित संज्ञा माना। कोर्ट के इस निर्णय के अपने निहितार्थ हैं मगर जिस रोज यह आया, अब तक अज्ञात ही रहे कवि उमाशंकर बडूनी की रचना "गंगावतरण" सजीव हो उठी। कवि आज हमारे बीच में नहीं है और उनका काम भी उनके...
                      एक तरफ गर्म साँसे है                            एक तरफ ठंडी आहें है                           असमंजस में पड़ा हूँ में                            किस तरफ कदम बढ़ाऊं                             मुझसे ही जुडी दोनों राहें है……….. एक दिखता शैतान बड़ा एक शराफत का दामन थामे है असमंजस में पड़ा हूँ में किसको दुत्कारू किसको गले लगाऊं दोनों ही अपनी संताने है ……….                                    एक कट्टरता की बात करे                                      एक सबको लेकर साथ चले                                 ...
फूलों को कुचलते हुए दौड़ रहे हैं दिशाहीन हो हमारी नदियों और झरनों को रोक रहे हैं दिशाहीनता में इनकी दिशाहीनता अन्यमनस्कता में हृदयहीनता में हम पीड़ा ग्रस्त हो रहे हैं यह पृथ्वी रोगाक्रांत हो रही है यहां बैठकर मैं स्वयं को खा रहा हूं। मेरे हृदय में चरचरा रहे घाव की यह पीड़ा मात्र है, सिर्फ दर्द और टीस है। तुम जाओं इसी विश्वास में मैं भीगा लथपथ बैठा हूं। तुम...

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