माँ तू अब कितना बदल गई है, माँ सच तू वही तो है न? पहले एक चीख पर दौड़ आती थी, मुझसे पहले दर्द तुम्हें सताता था, बिन लोरी तेरे सो न पति थी, एक कहती तू दस सुनाती थी, सोचती कहीं चुप हुई और में उठ न जाऊं, माँ अब एक लोरी को तरस रही हूँ, सच माँ तू कितना बदल गई है।। स्कूल से आती तू...
क्या हुआ कि दिल से उतर गया कोई। अश्क़ सा आँखों से निकल गया कोई। उसने जाहिर की शख़्सियत उसकी। और मेरे भीतर से...मर गया कोई। किसी रहबर की जरूरत नहीं रही। ऐसा सबक दे के गुज़र गया कोई। अब भी हर बात पे रूँधता है.. गला। कैसे कह दें कि ग़म से उबर गया कोई। वो ख़ंज़र तो था हिफ़ाज़त के वास्ते। और उसी से ...क़त्ल कर...
पाण्डवखोली के समीप दूर्णागिरी द्रोणांचल शिखर माया-महेश्वर प्रकृति-पुरुष दुर्गा कालिका क्या हो तुम कहाँ हो तुम सिर्फ हिमालय में या मेरे संर्वाग में हाहाकार करती एक गहन इतिहास छुपाये हिमालय की तलहटी में वर्षो से  एक कौतुहल एक जिज्ञासा मेरी या अबाध आस्था कई बार देखा या यूँ कहो हर बार सुबह उठकर देखा "रानीखेत" से पल पल पिघलते हिमालय को कभी हरे,सफेद, धानी कभी नांरगी बनते फिर शाम के ढलते सूरज में सवंरती पहाड़ियों को वो साक्षी रही तब जब मेरी शिकायतों के अंबार थे किन्तु...
एक नदी हूँ मैं। हिमखंड से निकली छोटी सी धारा चलती जा रही हूँ मैं। ना साथी कोई ना कोई सहारा बस अकेले ही सफर पर चली हूँ मैं। मिल गए साथी भी सफर में हो गयी थोड़ी बड़ी मैं। हिला दिया पत्थर को बना लिया रास्ता अपना थोड़ी जि़द्दी हो गयी हूँ मैं। ठान ली समन्दर से मिलने की, मिल कर ही रही हूँ मैं। कोशिश...
ईजा को देखती हूँ बातें करते गाढ़ गधेरों, नदियों से और कभी कभी पहाड़ों से तो महसूस हुआ यकीनन पहाड़ों में औरतें दो तरह की होती हैं एक नदी और दूसरी पहाड़ सी नदी सी औरत बस बहती है संवेदनाओं के सुरों में कभी चंचल, कभी शान्त कभी मुखर भावों में अनजानी राहों में हिम सी पिघलती हुयी छोड़  आती है अपनी ऊँचाई,अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने मन के अबाध सौन्दर्य से खुद को...
ए मेरे पहाड़ कब तक तू/ अपनों की वापसी के लिए गिड़गिड़ायेगा / बहुत हुआ तू अब न अपने को यूँ तड़पाएगा/ जो गए वो अपने थे / लौट के आएंगे ये अब सपने है/ जो बचा है उसकी परवरिश की सोच/ नयी राहों की कर तलाश / बांस और निंगाल को तराश/ उफनती नदियों व् / धंसती धरती पर लगा अंकुश/ बृक्षों की पाट दे अपार श्रृंखला / पुष्पों...
एक दिन दुःखी होकर धरती ने कहा नील गगन से देख अत्याचार मुझ पर तू भी तो दुःखी होता है मन मे बस मुझ पर तू इतनी दया करना अपने आगोश मे छुपे बादलों से कहना कि तुम अब की बार जोरों से बरसना ताकी हरा भरा हो जाये धरती का कोना बोला नील गगन तुझ पर यूँ ही अगर जंगल साफ होते जायेंगे तो मेरे आगोश...
 ......लौट भी आओ ना पहाड़ / देखो ना /  ये नदी और झरने कुछ कह रहे हैं तुमसे  / सुनो तो सही इनकी प्यारी बातें  / जैसे कि पुकार रही हैं  तुमको / कि अब तो लौट आओ पहाड़ /  ............ देखो वो नीले आकाश में /  चमक रहे हैं सितारे बस तुम्हारे लिए / ये बुरांश, ग्वीराल भी तो खिले हैं तुम्हारे लिए   / अपने मन...
नई दिल्ली।  हिंदी पत्रकारिता में भारतेंदु हरिश्चंद्र को पहला पत्रकार माना जाता है लेकिन हिंदी व् कुमाउनी के आदि कवि गुमानी पंत (जन्म 1790-मृत्यु 1846, रचनाकाल 1810 ईसवी से) ने अंग्रेजों के यहां आने से पूर्व ही 1790 से 1815 तक सत्तासीन रहे महा दमनकारी गोरखों के खिलाफ कुमाउनी के साथ ही हिंदी की खड़ी बोली में कलम चलाकर एक...
कहां जाऊं मैं? तुम यही समझते हो ना / कि, तुम्हारे पलायन पर मैं बहुत खुश हुआ था। / कि, मैं इसी ताक में था / कि तुम्हारे हिस्से की थाली हड़पकर / मालामाल हो जाऊं। / कि, तुम्हारी विरासत का एकमात्र मालिक बन / तुम्हारी ज़मीन को मुट्ठी में कैद कर लूं। / कि, श्मशानों में सपनों के महल बनाकर / तुम्हारी हर याद, हर निशान को...

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