डोगरी भारत के जम्मू और कश्मीर प्रान्त में बोली जाने वाली एक भाषा है। वर्ष 2004 में इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। पश्चिमी पहाड़ी बोलियों के परिवार में, मध्यवर्ती पहाड़ी पट्टी की जनभाषाओं में, डोगरी, चंबयाली, मडवाली, मंडयाली, बिलासपुरी, बागडी आदि उल्लेखनीय हैं।डोगरी भाषा भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य की दूसरी मुख्य भाषा है।...
पहाड़ जैसा कठिन जीवन जी रहे हिमालयी लोगों के लिए अब तेंदुआ व गुलदार अब बहुत बड़ी मुसीबत  बनकर सामने आए हैं। यह बात खुद केंद्र सरकार भी मानने लगी है। अकेले उत्तराखंड में ही पिछले एक दशक के दौरान तेंदुआ व गुलदारों ने 560 हमलों में 203 लोगों को मार डाला और खा गये। इसलिए केंद्रीय पर्यावरण व वन...
बहुत पुरानी बात हह। उत्तराखंड के सभी गावों की तरह डंणु गांव के लोग भी अपने ग्राम देवता की पूजा करने के लिए हर मौसम में मंदिरों में जाते थे। थे। गांव के सभी लोग उस देवता की कृपा से सुखी और संपन्न रहते थे। वे हर फसल के कट चुकने पर देवताओं को चढ़ावा चढ़ाने दूर एक स्थान...
शिमला । कम ही लोग जानते हैं कि सोनिया गांधी नहीं बल्कि शोभा नेहरू नेहरू खानदान की पहली विदेशी बहू थीं।शोभा का विवाह देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के चचरे भाई बृजलाल के बेटे ब्रज कुमार नेहरू के साथ हुआ था।शोभा नेहरू का विवाह से पहले नाम मगदोलना फ्रीडमैन था और उनका उपनाम फौरी भी था।वह...
बात वर्ष1854 की है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन पियर्स ने रेड इंडियन की भूमि का एक विशाल भू-भाग खरीदने का प्रस्ताव उनके मुखिया शिएटल के पास भेजा। इस प्रस्ताव में उन्हें विस्थापित कर उनके लिए दूसरे इलाके में जमीन देने का प्रावधान था। सरल हृदय प्रकृति पुत्र शिएटल के लिए भूमि का अर्थ भेड़ों या चमकदार मोतियों की तरह...
घुघुती -बसूती, क्या खैली, दुधभाती! याद है आपको मां की सुनाई यह लोरी घुघुती -बसूती, क्या खैली, दुधभाती, कु देलो, मां देली---- याद है आपको यह लोरी। बचपन में मां-दादी, नानी, मौसी आदि की सुनाई यह लोरी आज भी हमारे मन-मस्तिष्क में छाई है। लेकिन अब इसे हम भूलते जा रहे हैं। शहरों में रह रहे उत्तराखंडी शायद ही अपने बच्चों को इसे सुनाते...
 ......लौट भी आओ ना पहाड़ / देखो ना /  ये नदी और झरने कुछ कह रहे हैं तुमसे  / सुनो तो सही इनकी प्यारी बातें  / जैसे कि पुकार रही हैं  तुमको / कि अब तो लौट आओ पहाड़ /  ............ देखो वो नीले आकाश में /  चमक रहे हैं सितारे बस तुम्हारे लिए / ये बुरांश, ग्वीराल भी तो खिले हैं तुम्हारे लिए   / अपने मन...
गढ़वाली भारत के उत्तराखण्ड राज्य में बोली जाने वाली एक प्रमुख भाषा है।    गढ़वाली बोली का क्षेत्र प्रधान रूप से गढ़वाल में होने के कारण यह नाम पड़ा है।     पहले इस क्षेत्र के नाम केदारखंड, उत्तराखंड आदि थे।    यहाँ बहुत से गढ़ों के कारण, मध्ययुग में लोग इसे ‘गढ़वाल’ कहने लगे।     ग्रियर्सन के भाषा- सर्वेक्षण के अनुसार इसके बोलने...
--देहरादून से नीलम पांडेय 'नील' ओ ईजा! सुण,सुण यौ पहाड़ क्ये कूँ रँई यौ नदी, गाढ़ गध्यार यौ खेतों में,लागी हल क्ये कूँ रंई सुण, भली भाँत सुण त्यार भीतेर बै जो आवाज आणै आज, उकै लै सुण तु बटे आवाज लै सुण जो बाट बै कई अपण शहर नैह गई फिर कतुक सालों तलक उँ वापस लै नी आय उनर जाण बाद जो खेत बांझ हैं गयी तु उन खेतोंक आवाज लै सुण पर  तु यौ सुनसान बाटां...
नई दिल्ली। कुमायुंनी के साहित्यकार पूरन चंद कांडपाल और गढ़वाली भााषा के साहित्यकार मदनमोहन डुकलाण को क्रमश: 2016 और 2017 के लिए कवि कन्हैयालाल डंडरियाल साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया है। प्रसिद्ध संत भोले जी महाराज व माता मंगला जी और मुख्य अतिथि केन्द्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा ने इन साहित्यकारों के यह सम्मान दिया। यहां कंस्टिट्यूशन क्लब...

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