----- सुमन पंत कैसा सफर है मेरा कैसी तलाश है ये, क्या खोजती हूं हर पल और किसकी आस है ये। मंजिल मुझे पता है राहों की भी खबर है, फिर भी भटक रही हूं ये बेख़ुदी सी क्यों है। हैं हमसफ़र भी संग में मौसम भी है सुहाना, इन ठंडी फ़ुहारों में फिर भी तपन सी क्यो है। लगने लगा है जीवन पिंजरे के पंछी जैसा, उड़ना भी जानती हूं दरवाज़ा भी खुला है। फिर...
कविता -- जीवन के इस पथ पर --- देहरादून से सुमन काला इतना नेह न देना मुझकों भूल जाऊं,, सब कुछ जो मिला जीवन मे वो भी था,,,, पल दो पल का..... लेकिन...... तुम्हें भूला न पायी जीवन के इस पथ पर तुम्हारे ही नेह ने दिया है साहस.... कँटली राहोँ पर चलने का जीवन की दुर्गम राहों को सुगम कर डाला तुम्हारे ही नेह ने जीवन के...... हाँ, ! नवीन पथ पर तुम ...... भूला दो...
-- देहरादून से कांता घिल्डियाल की कविताएं 1 -- निश्चल शांत मेदिनी में स्नेहातुर चाँदनी मौन अम्बर के सितारों संग अपलक निहारती है हिमश्वेत शिखरों को ! सुरभित समीर संग उत्तुंग श्रंग से परे हटाती है मेघों का लिहाफ़ ! फिर हौले से ओढाकर उपास्य देव को रत्नजड़ित चादर एकांत प्रेम के मौन गवाहों संग सुनती है आत्मा का अनहद नाद !! 2 -   !! सुनो पारावार !! मुझे नही लुभाता तुम्हारा अनन्त विस्तार, गोद में खेलती कई ज़रदोज़ी तारों...
कविता -- अंतहीन इंतज़ार -------चंडीगढ़  से मीनाक्षी मोहन 'मीता' सूने पर्वतों की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों के किनारे हरे-भरे वृक्षों की कतारों से झाँकती, दूर तक निर्जन-पथ को निहारती वो उदास आँखें कर रही हैं आज भी इंतज़ार उस वर्तमान का जो उसके अतीत को सँवरता, महकता रहा जो हर पल उसके संग-संग चल उन आंखों में नए स्वप्न भरता रहा पर.... अपनी आंखों में संजोये अनंत आकाश को छूने के  स्वप्नों को सच...
गढ़वाली कविता - मेरा पहाड़ा  की नारी --------- अनूप सिंह रावत खैरी दुःख विपदा छन त्वैकू भारी. जनु भी होलू हे हिक्मत ना हारी.. धन धन हे मेरा पहाडा की नारी... भेलू पखाण, डांडी कांठी घासा कु जांदी. स्वामी जी की खुद मा, बाजूबंद लगान्दी. सासु बेटी ब्वारी होली पहाडा घस्यारी.. धन धन हे मेरा पहाडा की नारी... रौली गदिन्युं छ्वाल्या मा पाणी कु जांदी. बांजा जाड्यूं कु ठंडो...
कविता ---याद आता है पहाड़ी गांव  ---  श्रीनगर, उत्तराखंड  से अरविन्द उनियाल, 'अनजान', भुलाना है बहुत मुश्किल बराबर याद आता है । हमें अपना पहाड़ी गाँव अक्सर याद आता है । सवेरे कोयलें आकर, छतों पर  चहचहाती थी । सुनहरी धूप आँगन में उतरकर जगमगाती थी । पकाती रोटियाँ अम्मा, पिताजी हल लगाते थे - झँगोरे-मँडवे की खेतों में फसलें लहलहाती थी । गली, खलिहान, खेतों का...
---- रूचिता बहुगुणा उनियाल   गांव के पीछे घाटी से उतरकर एक नदी बहती थी नदी के पानी में बहता था जीवन,, मछलियों की बिरादरी ,मगरमच्छों के कुटुंब उसमें बहता था जीवन का सार मृत्यु से लेकर जन्म तक जन्म से लेकर मृत्यु तक नदी बहती थी अविरल धारा में अचानक एक दिन,,!! उसकी धारा को रोका गया बहते हुए जीवन को टोका गया अब .... मछलियों के शव तैरते हैं उसके पानी...
 .................... उपासना सेमवाल हे! विधाता सूण यन रंचणा क्या रचाई त्वैन नौनू अपड़ू खास अर, बेटी बिराणी बणाई त्वैन। ल्वै मासू पीड़ा आंसू, यखु जन बणाई त्वीन फ्यैर इथा बड़ू फरक कनकै ते कराई त्वीन।। मैत्यूं भी पराई हवै , स्वारंयू भी पराई हवै सब्यूं कि जन आंख्यूं मां कीस जन बिनाणी रे।। अर यो बैरी समाज भी ते बेट्यूं तै कसाई बेटी नि छे खाली स्य...
--देहरादून से नीलम पांडेय 'नील' ओ ईजा! सुण,सुण यौ पहाड़ क्ये कूँ रँई यौ नदी, गाढ़ गध्यार यौ खेतों में,लागी हल क्ये कूँ रंई सुण, भली भाँत सुण त्यार भीतेर बै जो आवाज आणै आज, उकै लै सुण तु बटे आवाज लै सुण जो बाट बै कई अपण शहर नैह गई फिर कतुक सालों तलक उँ वापस लै नी आय उनर जाण बाद जो खेत बांझ हैं गयी तु उन खेतोंक आवाज लै सुण पर  तु यौ सुनसान बाटां...
---  रश्‍मि‍ शर्मा ( रांची से वरिष्ठ पत्रकार रश्‍मि‍ शर्मा ने यह लेख विशेष तौर पर हिमालयीलोग के लिए लिखा है। उन्होंने लद्दाख की  यात्रा का सुन्दर वर्णन  किया है।   रश्‍मि‍ शर्मा जी का आभार ) ........ जहाज से उतरते ही पाया कि‍ यह क्षेत्र सैनि‍क छावनी है। छोटा सा एयरपोर्ट जि‍सका नाम है ' कुशेक बकुला रि‍नपोछे टर्मिनल, लेह'। लेह हवाई अड्डा मुख्यतः सेना के लिए...

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