कविता -- अंतहीन इंतज़ार -------चंडीगढ़  से मीनाक्षी मोहन 'मीता' सूने पर्वतों की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों के किनारे हरे-भरे वृक्षों की कतारों से झाँकती, दूर तक निर्जन-पथ को निहारती वो उदास आँखें कर रही हैं आज भी इंतज़ार उस वर्तमान का जो उसके अतीत को सँवरता, महकता रहा जो हर पल उसके संग-संग चल उन आंखों में नए स्वप्न भरता रहा पर.... अपनी आंखों में संजोये अनंत आकाश को छूने के  स्वप्नों को सच...
गढ़वाली कविता - मेरा पहाड़ा  की नारी --------- अनूप सिंह रावत खैरी दुःख विपदा छन त्वैकू भारी. जनु भी होलू हे हिक्मत ना हारी.. धन धन हे मेरा पहाडा की नारी... भेलू पखाण, डांडी कांठी घासा कु जांदी. स्वामी जी की खुद मा, बाजूबंद लगान्दी. सासु बेटी ब्वारी होली पहाडा घस्यारी.. धन धन हे मेरा पहाडा की नारी... रौली गदिन्युं छ्वाल्या मा पाणी कु जांदी. बांजा जाड्यूं कु ठंडो...
कविता ---याद आता है पहाड़ी गांव  ---  श्रीनगर, उत्तराखंड  से अरविन्द उनियाल, 'अनजान', भुलाना है बहुत मुश्किल बराबर याद आता है । हमें अपना पहाड़ी गाँव अक्सर याद आता है । सवेरे कोयलें आकर, छतों पर  चहचहाती थी । सुनहरी धूप आँगन में उतरकर जगमगाती थी । पकाती रोटियाँ अम्मा, पिताजी हल लगाते थे - झँगोरे-मँडवे की खेतों में फसलें लहलहाती थी । गली, खलिहान, खेतों का...
नई दिल्ली। आखिरकार वह जीवन और मृत्यु के बीच की जंग हार गई। उत्तराखंड के पौड़ी में पेट्रोल डालकर जलाई गई छात्रा ने रविवार को दिल्ली के सफदरजंंग अस्पताल में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। अपनी मृत्यु के साथ वह वे सवाल भी छोड़ गई कि उत्तराखंड किधर जा रहा है। उत्तराखंड में पहले ऐसी घटनाएं सुनने को भी...
---- रूचिता बहुगुणा उनियाल   गांव के पीछे घाटी से उतरकर एक नदी बहती थी नदी के पानी में बहता था जीवन,, मछलियों की बिरादरी ,मगरमच्छों के कुटुंब उसमें बहता था जीवन का सार मृत्यु से लेकर जन्म तक जन्म से लेकर मृत्यु तक नदी बहती थी अविरल धारा में अचानक एक दिन,,!! उसकी धारा को रोका गया बहते हुए जीवन को टोका गया अब .... मछलियों के शव तैरते हैं उसके पानी...
 .................... उपासना सेमवाल हे! विधाता सूण यन रंचणा क्या रचाई त्वैन नौनू अपड़ू खास अर, बेटी बिराणी बणाई त्वैन। ल्वै मासू पीड़ा आंसू, यखु जन बणाई त्वीन फ्यैर इथा बड़ू फरक कनकै ते कराई त्वीन।। मैत्यूं भी पराई हवै , स्वारंयू भी पराई हवै सब्यूं कि जन आंख्यूं मां कीस जन बिनाणी रे।। अर यो बैरी समाज भी ते बेट्यूं तै कसाई बेटी नि छे खाली स्य...
--देहरादून से नीलम पांडेय 'नील' ओ ईजा! सुण,सुण यौ पहाड़ क्ये कूँ रँई यौ नदी, गाढ़ गध्यार यौ खेतों में,लागी हल क्ये कूँ रंई सुण, भली भाँत सुण त्यार भीतेर बै जो आवाज आणै आज, उकै लै सुण तु बटे आवाज लै सुण जो बाट बै कई अपण शहर नैह गई फिर कतुक सालों तलक उँ वापस लै नी आय उनर जाण बाद जो खेत बांझ हैं गयी तु उन खेतोंक आवाज लै सुण पर  तु यौ सुनसान बाटां...
---  रश्‍मि‍ शर्मा ( रांची से वरिष्ठ पत्रकार रश्‍मि‍ शर्मा ने यह लेख विशेष तौर पर हिमालयीलोग के लिए लिखा है। उन्होंने लद्दाख की  यात्रा का सुन्दर वर्णन  किया है।   रश्‍मि‍ शर्मा जी का आभार ) ........ जहाज से उतरते ही पाया कि‍ यह क्षेत्र सैनि‍क छावनी है। छोटा सा एयरपोर्ट जि‍सका नाम है ' कुशेक बकुला रि‍नपोछे टर्मिनल, लेह'। लेह हवाई अड्डा मुख्यतः सेना के लिए...
--- दीपशिखा गुसाईं  / मेरे पहाड़ की नारी मेरे पहाड़ की नारी हिम्मत उसकी भारी। पहाड़ सा जीवन हर पल जीती,, रहती सदा मुस्कुराती। जब भी सोचा, जब भी देखा,, उसे जीवन से लड़ते देखा। चाहे हो बर्फीली सुबह या ठण्ड से ठिठुरती रात,, कभी न होती निढाल कभी न माने हार। 'रतब्याणी' ही उठ कर 'कल्यो' रोट बनाती,, 'गौड़ी' दुहने के बाद, जाने कब 'बोण' को जाती, 'सुल्येटे' में घास के पूले, इतने न गिन पाते,, कैसे चट्टानी रास्तों...
------- नीलम पांडेय नील कुछ नही बस .....यूँ ही खाली अक्षांश में सोयी हुयी नियति मात्र कभी रेतीले रेगिस्तान में चमकते पानी का सा भ्रम । जब सुबह और शाम के फर्क धुंधलाने लगते है तब रंगे हुऐ गगन में अलसाया सा सूरज भी अपनी तपिश में जलता अकसर अकेला रह जाता है । धरा की रोशनी होकर भी वह आने वाली शाम को उनींदी आखों में समेट चाँद के अनचाहे स्पर्श के सपने...

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