क्या हुआ कि दिल से उतर गया कोई। अश्क़ सा आँखों से निकल गया कोई। उसने जाहिर की शख़्सियत उसकी। और मेरे भीतर से...मर गया कोई। किसी रहबर की जरूरत नहीं रही। ऐसा सबक दे के गुज़र गया कोई। अब भी हर बात पे रूँधता है.. गला। कैसे कह दें कि ग़म से उबर गया कोई। वो ख़ंज़र तो था हिफ़ाज़त के वास्ते। और उसी से ...क़त्ल कर...
पाण्डवखोली के समीप दूर्णागिरी द्रोणांचल शिखर माया-महेश्वर प्रकृति-पुरुष दुर्गा कालिका क्या हो तुम कहाँ हो तुम सिर्फ हिमालय में या मेरे संर्वाग में हाहाकार करती एक गहन इतिहास छुपाये हिमालय की तलहटी में वर्षो से  एक कौतुहल एक जिज्ञासा मेरी या अबाध आस्था कई बार देखा या यूँ कहो हर बार सुबह उठकर देखा "रानीखेत" से पल पल पिघलते हिमालय को कभी हरे,सफेद, धानी कभी नांरगी बनते फिर शाम के ढलते सूरज में सवंरती पहाड़ियों को वो साक्षी रही तब जब मेरी शिकायतों के अंबार थे किन्तु...
एक नदी हूँ मैं। हिमखंड से निकली छोटी सी धारा चलती जा रही हूँ मैं। ना साथी कोई ना कोई सहारा बस अकेले ही सफर पर चली हूँ मैं। मिल गए साथी भी सफर में हो गयी थोड़ी बड़ी मैं। हिला दिया पत्थर को बना लिया रास्ता अपना थोड़ी जि़द्दी हो गयी हूँ मैं। ठान ली समन्दर से मिलने की, मिल कर ही रही हूँ मैं। कोशिश...
देहरादून। ग्लोबल वार्मिंग के चलते मैदानों की वनस्पतियां अब पहाड़ों की ओर जाने लगी हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में वानस्पतिक विज्ञानियों के अध्ययन के अनुसार तापमान में वृद्धि के कारण मैदानी क्षेत्रों में पनपने वाली अनेक वनस्पतियां अब पहाड़ों की ओर रुख करने लगी हैं। वैज्ञानिक अध्ययन में उत्तराखंड के सोमेश्वर घाटी में साल वृक्षों की बढ़वार में तेजी...
ईजा को देखती हूँ बातें करते गाढ़ गधेरों, नदियों से और कभी कभी पहाड़ों से तो महसूस हुआ यकीनन पहाड़ों में औरतें दो तरह की होती हैं एक नदी और दूसरी पहाड़ सी नदी सी औरत बस बहती है संवेदनाओं के सुरों में कभी चंचल, कभी शान्त कभी मुखर भावों में अनजानी राहों में हिम सी पिघलती हुयी छोड़  आती है अपनी ऊँचाई,अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने मन के अबाध सौन्दर्य से खुद को...
ए मेरे पहाड़ कब तक तू/ अपनों की वापसी के लिए गिड़गिड़ायेगा / बहुत हुआ तू अब न अपने को यूँ तड़पाएगा/ जो गए वो अपने थे / लौट के आएंगे ये अब सपने है/ जो बचा है उसकी परवरिश की सोच/ नयी राहों की कर तलाश / बांस और निंगाल को तराश/ उफनती नदियों व् / धंसती धरती पर लगा अंकुश/ बृक्षों की पाट दे अपार श्रृंखला / पुष्पों...
एक दिन दुःखी होकर धरती ने कहा नील गगन से देख अत्याचार मुझ पर तू भी तो दुःखी होता है मन मे बस मुझ पर तू इतनी दया करना अपने आगोश मे छुपे बादलों से कहना कि तुम अब की बार जोरों से बरसना ताकी हरा भरा हो जाये धरती का कोना बोला नील गगन तुझ पर यूँ ही अगर जंगल साफ होते जायेंगे तो मेरे आगोश...
बहुत पुरानी बात है। एक राजा की सात बेटियां थीं। एक दिन उसने अपनी बेटियों को बुलाया और पूछने लगा, ‘मैं तुम्हें कैसा लगता हूं?’ बड़ी बेटी ने कहा, ‘आप मुझे मीठे लगते हैं।’ दूसरी से पूछा तो उसने भी यही उत्तर दिया। फिर तीसरी, चौथी, पांचवीं और छठी से पूछा। उन्होंने भी यही बात दोहराई। किसी ने गुड़...
नई दिल्ली। पेरिस के जलवायु सम्मेलन को दो साल हो चुके हैं।   तब तय किया गया था कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सभी देश धरती का तापमान अब दो डिग्री से ज्यादा नहीं बढऩे देंगे, लेकिन यह घोषणा कागजी साबित  होती दिख रही है। यदि इस घोषणा पर अब भी ईमानदारी से अमल नहीं हुआ तो यह तय...
 ......लौट भी आओ ना पहाड़ / देखो ना /  ये नदी और झरने कुछ कह रहे हैं तुमसे  / सुनो तो सही इनकी प्यारी बातें  / जैसे कि पुकार रही हैं  तुमको / कि अब तो लौट आओ पहाड़ /  ............ देखो वो नीले आकाश में /  चमक रहे हैं सितारे बस तुम्हारे लिए / ये बुरांश, ग्वीराल भी तो खिले हैं तुम्हारे लिए   / अपने मन...

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