हिमालय की पुरातन लिपि टांकरी

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हिमालय की पुरातन लिपि टांकरी

– टांकरी में जौनसारी को लिखने का सफल प्रयोग कर चुके हैं रमेश जोशी

नयी दिल्ली। कश्मीर से नेपाल तक के भू भाग में कभी टांकरी लिपि का प्रचलत था। इसी में वहां की भाषा-बोलियों को लिखा जाता था। यह हिमालयी क्षेत्र के ब्राह्मणों की पूजा की भाषा भी रही है।लेकिन क्रूर मुगलों और अंग्रेजों की नीतियों के कारण यह लिपि अब प्रचलन से लगभग बाहर हो गई है।
अधिकतर पहाड़ी भाषायें टांकरी लिपि में ही लिखी गई है । टांकरी लिपि शारदा लिपि से निकली है और यह गुरमुखी लिपि से भी सम्बन्धित है । आज भी पुराने राजस्व रिकॉर्ड, पुराने मंदिर की घंटियों या पुराने किसी बर्तन में टांकरी में लिखे शब्द देखे जा सकते हैं। टांकरी लिपि ब्राह्मी परिवार की लिपियों का ही हिस्सा है जो कि कश्मीरी में प्रयोग होने वाली शारदा लिपि से निकली है। जम्मू कश्मीर की डोगरी, हिमाचल प्रदेश की चम्बियाली, कुल्लुवी, और उत्तराखंड की गढ़वाली समेत कई भाषाएं टांकरी में लिखी जाती थी। नेपाल में भी इस लिपि के प्रयोग के सबूत मिले हैं।
माना जाता है कि कौलान्तक पीठ की अनेक लिपियों का प्रयोग विशेष साधनाओं को गोपनीय रखने के लिए होता है। इनमें से कुछ भाषाएं और लिपियां साधकों को अनिवार्य रूप से सिखाई जाती रही है। टांकरी लिपि भी इनमें शामिल है। यह भी माना जाता है कि इसको बिना जाने कोई ‘कौल साधक’  नहीं हो सकता।
इस प्राचीन लिपि टांकरी पर लंबे समय से चले शोध के बाद यह खुलासा हुआ है कि टांकरी लिपि का दमन मुगलों व अंग्रेजों ने किया था। मुगलों ने यहां पर उर्दू भाषा को तरजीह दी और अंग्रेजों ने भी उर्दू भाषा पढऩे वाले लोगों को ही अपने शासन में नौकरी दी। जिस कारण अध्यात्मिक एवं मंत्रों उच्चारण में प्रयोग होने वाली टांकरी भाषा का धीरे-धीरे पत्तन हुआ। लेकिन पारंपरिक एवं वांशिकी तौर पर कुछ घरों में पुश्तैनी तौर पर टांकरी पढऩे की परंपरा रही।


उत्तराखंड के जौनसार क्षेत्र के मूल निवासी व भारतीय सूचना सेवा के अफसर रमेश जोशी इस लिपि में जौनसारी को लिखने का सफल प्रयोग कर चुके हैं।

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