कविता —-“धै” (आवाज़ देना )

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कविता —-“धै” (आवाज़ देना )
—— देहरादून से  सरला सेमवाल

थी कभी आबाद  धरती,
आज वीरान हो गयी है।
एक सुनसान,
सांय-सायं सी आवाज़  हो रही है।
चहुँ ओर  गुंजती,
एक आवाज़  पुकारती।
कैसी?
जैसे,कह रही हो,
कहाँ  गये तुम?
बुला रहे खेत-खलिहान तुम्हारे।
तिबारी,डंडयाली, गाँव के ये चौथरा,
पन्देरा पानी का,आवाज़  दे रहा,
आओगे कब?पनिहारन  बनके।
इष्ट देवी भी पुकारती फिर  रही,
कहाँ हो?मैं  अकेली रह गई ।
गाय -बैलों की गले की,
घंटियों  की गूंजने,
कह रही है हाँकने को ,
आओगे  कब  तुम  हमें ।
व्याकुल सा सरल,
कवि मन मेरा व्यथित  हो रहा,
जबाव  क्या  दूँ  ?
आज मैं  रो रहा।
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(देहरादून निवासी सरला सेमवाल  टीचर हैं। हिन्दी  साहित्य व  समाजशास्त्र  में शिक्षा-एम ए  तथा बी.एड. हैं।  )

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