बसंत पंचमी में फ्योंली का फूल और मेरा बचपन

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बसंत पंचमी में फ्योंली का फूल और मेरा बचपन
— हरीश लखेड़ा( की फेसबुक वॉल से साभार)
बसंत का आगमन हो चुका है। उत्तराखंड में यह वसंत या बसंत के आगमन का संदेश फ्योंली या फ्यूंली का फूल देता है।  इसके खिलते ही माना जाता है कि बसंत आ गया है। यह फूल भगवान भालेनाथ शिव को बहुत प्रिय है और उन्होंने यह पांच पंखुडिय़ों वाला पीले रंग का फ्योंली का फूल मां पार्वती को भेंट किया था। यही फूल स्वर्ग की ओर हिमालय से जाते हुए द्रोपदी ने पांचों पांडवों से मांगा था,  जो कि गंगा के किनारे खतरनाक पडाड़ी पर खिला था। द्रोपदी ने उसी फ्योंली के फूल को लाने के लिए पांडवों से कहा था। भीम अपनी जान को हथेली पर रखकर उसे लाए और द्रोपदी को भेंट किया था।
वसंत पंचमी पर आज (10 फरवरी, 2019 को) मां सरस्वती की पूजा करते हुए मन उत्तराखंड स्थित गांव की ओर चला गया। यादों के झरने बहने लगे। ऐसे झरने कि रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उस गांव में मेरा बचपन में था। उस बचपन में गांव में मां थी, पिता थे, गांव के सभी भाई-बहन भी थे, काकी-बोडी सभी थे। यादों के झरने बहने लगे थे। गांव में बसंत पंचमी पर घर को गोबर- मिट्टी से लीप-पोत कर दरवाजे पर गेहूं- जौ की बालियां लगाई जाती थी। बालियों को दरवाजे पर टिकाए रखने  के लिए गोबर लगाया जाता था। इन दिनों खेतों में गेहूं- जौ के साथ सरसों के पीले फूल भी खिले दिखते थे और बीच-बीच में कलौ-मटर भी। हम  बच्चे  सभी की नजरों से छूप कर खेतों में घुस जाते और मटरों की फलियों पर टूट पड़ते थे। कितने मीठे होते थे वे कलौ-मटर।
बसंत पंचमी के दिन ही गांव में नववर्ष में हल लगाने की प्रक्रिया शुरू होती थी। बैलों के सींगों पर तेल लगाया जाता था और उन्हें जौ के आटे से बना विशेष पींडू खाने को दिया जाता था। घर में मीठे पकवान भी बनते थे। इसलिए इस दिन का बहुत बेसब्री से इंतजार भी रहता था। आज ही के दिन गांव में छोटे बच्चों का अन्नप्राश संस्कार होता था। यानी बच्चों के मुंह में शहद, गुड या खीर रखकर अन्न खिलाने की शुरूआत होती थी। इसी दिन बच्चों को पहली बार क,ख,ग आदि लिखने की शुरआत होती थी। मां सरस्वती का दिन होने से शिक्षा का प्रारंभ इस शुभ मुहूर्त पर होता था। मैं  10वीं तक इंटर कॉलेज रिखणीखाल और फिर 12वीं तक सिद्धखाल इंटर कॉलेज चुरानी से हॉस्टल से छुट्टी के दौरान बसंत पंचमी पर गांव में आता था। बसंत आते ही महाशिवरात्रि और होली का इंतजार होने लगता था। पिताजी इसी दिन घर में पडित जी को बुलाते और वे हम भाई-बहनों समेत सभी के वर्षफल की पूजा कर जाते थे। पंडित जी हमारी जन्मपत्रियों से एक साल का  वर्षफल निकालते थे। पंडित जी अपने सभी  यजमानों के घर जाकर उनको आशीर्वाद देते थे।
उत्तराखंड में बसंत पंचमी के दौरान ही पहाड़ में फ्योंली फूल खिलता है। पहाड़ के लोकजीवन में गहरे से रचे-बसे इस फूल को लेकर कहा जाता है कि भगवान भोलेनाथ शिवजी ने फ्योंली का फूल मां पार्वती को भेंट किया था। माना जाता है कि यह फूल पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां पार्वती को बहुत प्रिय है। बहुत सुंदर और  पीले रंग की पांच पंखुडिय़ों वाली फ्योंली का खिलना वसन्त ऋतु के आगमन का प्रतीक है।
फ्योंली को लेकर उत्तराखंड में एक लोककथा भी है। उस लोककथा के कई रूप मिलते हैं।  उत्तराखंड के देवगढ़ के राजा की इकलौती व प्यारी बेटी थी। राजकुमारी बहुत सुंदर और गुणवान थीं। राजकुमारी की बीमारी असामयिक मृत्यु हो गयी। राजा ने राजमहल के एक कोने में राजकुमारी का स्मारक बनवा दिया। वहां बाद में एक  पीले रंग का पांच पंखुड़ी फूल खिल गया।  उसे फ्योंली कहा गया। यह फूल बसंत के आगमन का संदेश  देता है। पहाड़ में वसंत को बसंत कह देते हैं।
यह भी कहा जाता है कि शादी के बाद राजकुमारी जाने पर उन्हें मायके की बहुत याद आती है। मायके की याद में राजकुमारी ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया था। राजकुमारी की समाधि के पास बाद में जो पीला फूल खिला वह फ्योंली कहलाने लगा।
एक कथा यह भी है कि गांव के एक गरीब परिवार की बेटी का नाम फ्योंली था। एक बार एक गढ़ी के राजकुमार को जंगल में शिकार खेलते खेलते देर हो गई। राजकुमार ने फ्योंली के गांव में शरण लेनी पड़ी। राजकुमार फ्योंली पर मुग्ध हो गया और उसने फ्योंली के माता पिता से उसके  साथ शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। दोनों की शादी हो गई। फ्योंली राजमहल में आ गई। लेंिकन फ्योंली की मन राजभवन में नहीं लगा। एक दिन उसने मायके जाने की जिद पकड़ ली। राकुमार ने उसे भेज भी दिया। गांव में फ्योंली गंभीर तौर पर बीमार पड़ गई। कहा जाता है कि फ्योंली अपने ही पड़ासी गांव के युवक से प्रेम करती थी।  राजकुमार से उसने मां-पिता के कहने पर शादी तो कर दी लेकिन गम में धीरे-धीरे बीमार पड़ गई। बीमार फ्योंली को देखने राजकुमार उसके गांव आया और उससे उसकी अन्तिम इच्छा पूछी। फ्योंली ने कहा कि मृत्यु के बाद गांव की किसी मुंडेर की मिट्टी में उसकी समाधि बनाई जाए। राजकुमार ने ऐसा ही किया। बाद में वहां एक पीले रंग का फूल खिल गया।  तब से पहाड़ में खेतों की मुंडेर पर फ्योंली आज भी खिलता रहता है।
कहा जाता है कि भगवान शिव ने भां पार्वती को फ्यूंली का फूल दिया था। इसके अलावा स्वर्ग की ओर हिमालय से जाते हुए द्रोपदी ने पांचों पांडवों से गंगा के किनारे खतरनाक पहाड़ी पर खिली फ्योंली के फूल को लाने के लिए कहा था। भीम अपन जान को हथेली पर रखकर उसे लाए और द्रोपदी को भेंट किया था।
वसंत को सभी ऋतुओं का राजा कहा जाता है।  इस कारण ही इस दिन को बसंत पंचमी कहा जाता है। अब खेतों में फसलें लहलहाने लगती है।  फूल भी खिलने लगते है। मौसम बदलने लगता है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन बुद्धि व विद्या की देवी मां सरस्वती का जन्म हुआ। इसलिए बसंत पचमी के दिन मां सरस्वती माता की विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है । इस दिन लोगों को पीले रंग के कपडे पहन कर पीले फूलों से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।   मां सरस्वती की पूजा करने के पीछे एक पौराणिक कथा भी है । सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण और ब्रह्मा जी ने मां सरस्वती की पूजा की थी। कहा जाता है कि मां सरस्वती एक बार श्री कृष्ण पर मोहित हो गयी और उन्हें  पति के रूप में पाने के लिए इच्छा करने लगी। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि वे तो राधा से प्रेम करते हैं। उन्होंने  मांग सरस्वती को वरदान  दे दिया था कि प्रत्येक विद्या का इच्छुक माघ महीने की शुल्क पंचमी को तुम्हारा पूजन करेंगे। वरदान देने के बाद सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण ने ही मां सरस्वती की पूजा की थी। बसंत पंचमी को नये कार्य शुरु करने के लिए  शुभ माना जाता है। आप सभी को बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।

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— हरीश लखेड़ा

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