कविता — कैसी तलाश है ये

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—– सुमन पंत
कैसा सफर है मेरा
कैसी तलाश है ये,
क्या खोजती हूं हर पल
और किसकी आस है ये।

मंजिल मुझे पता है
राहों की भी खबर है,
फिर भी भटक रही हूं
ये बेख़ुदी सी क्यों है।

हैं हमसफ़र भी संग में
मौसम भी है सुहाना,
इन ठंडी फ़ुहारों में
फिर भी तपन सी क्यो है।

लगने लगा है जीवन
पिंजरे के पंछी जैसा,
उड़ना भी जानती हूं
दरवाज़ा भी खुला है।

फिर क्यों नहीं हूं उड़ती
ये कौन रोकता है,
अदृश्य बेड़ियो को
मन क्यों स्वीकारता है।

छोड़ा है खुद को मैने
उस माँझी के सहारे,
जो सब की नैय्या एक दिन
कर देता है किनारे।

लगता है सब दिशाएं
आपस मे मिल गईं है,
मुझसे ही सब शुरू है
और अंत भी मुझ में।

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सुमन पंत


सुमन पंत अपने बारे में कहती हैं —-

समाज के लिए  छोटा मोटा कुछ करने का जब भी अवसर मिलता है करती हूं ,राजस्थान  मेरी जन्मभूमि भी है और कर्मभूमि भी। पर वहाँ रहकर भी माता पिता के आशीर्वाद से पहाड़ी  संस्कृति  और भाषा दोनों   अच्छे से जानती हूँ।  दोनों संस्कृतियां हैं मुझमें, यहाँ हरिद्वार में पहाड़ी समाज से पूरी तरह जुड़ी हूँ, पहाड़ी ब्वारीयों का एक समूह भी है हमारा जो नई बहुओं को अपनी भाषा और संस्कृति से प्रेम करना सिखाता है।अंग्रेजी साहित्य और राजनीति शास्त्र में MA हूँ BEd हूँ,  अंग्रेजी साहित्य में phd कर रही थी वो आज तक अधूरी है ।

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