कविता – निश्चल शांत मेदिनी में

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— देहरादून से कांता घिल्डियाल की कविताएं

1 — निश्चल शांत मेदिनी में

स्नेहातुर चाँदनी
मौन अम्बर के सितारों संग
अपलक निहारती है
हिमश्वेत शिखरों को !
सुरभित समीर संग
उत्तुंग श्रंग से
परे हटाती है
मेघों का लिहाफ़ !
फिर
हौले से ओढाकर
उपास्य देव को
रत्नजड़ित चादर
एकांत प्रेम के
मौन गवाहों संग
सुनती है
आत्मा का अनहद नाद !!

2 –   !! सुनो पारावार !!
मुझे नही लुभाता
तुम्हारा अनन्त विस्तार,
गोद में खेलती कई
ज़रदोज़ी तारों की अल्पनाएं,
अठखेलियाँ करती पर्वत श्रृंखलाएं!!
निहारते हुए तुम्हे !
दिखता है मुझे !!
पीड़ा मिश्रित आँसुओं का अनन्त सैलाब,
दूर-दूर तक तैरते आधे-अधूरे ख्वाब
तब मेरी आँखे भी
बन जाती हैं दरिया
और इनमें बहने लगता है
वो अटूट अपनापन,
मधुर स्मृतियाँ समेटे जलमग्न भवन
और
मज़बूरन अपनी माटी से दूर जाती
माँ-बहनों का करुण-क्रन्दन.
 (  कांता घिल्डियाल अंग्रेजी में स्नातकोत्तर है।   )

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