कविता — अंतहीन इंतज़ार

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कविता — अंतहीन इंतज़ार
——-चंडीगढ़  से मीनाक्षी मोहन ‘मीता’

सूने पर्वतों की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों के किनारे
हरे-भरे वृक्षों की कतारों से झाँकती,
दूर तक निर्जन-पथ को निहारती
वो उदास आँखें
कर रही हैं आज भी इंतज़ार
उस वर्तमान का जो उसके अतीत को सँवरता,
महकता रहा
जो हर पल उसके संग-संग चल
उन आंखों में नए स्वप्न भरता रहा
पर….
अपनी आंखों में संजोये
अनंत आकाश को छूने के  स्वप्नों को सच करने को
उन्हीं पगडंडियों से निकल गया बहुत दूर
एक नए क्षितिज की तलाश में,
अपने नन्हे घरौंदे को छोड़
उड़ चला विस्तृत आकाश में,
छोड़ गया प्रकृति के उस मधुर स्पर्श को
जो सुवासित करता था तन-मन उसका,
छोड़ गया उस स्नेहिल गोद को,
जो सहलाती थी उसे हर पल,
छोड़ गया उस संगिनी को
जो करती थी उससे
कुछ हंसी ठिठोली,गुनती थी संग उसके कुछ राग -विराग,कुछ मनुहार के मीठे पल
छोड़ गया उस मनमीत को
नीर भरी बदली बन जाने को
जो आज भी नम आंखों से दूर तक एकटक देखती है,
पुकारती है, उस वर्तमान को
ताकि वो भी बुन सके अपने भविष्य की चादर
ओर ओढ़ ले उस एहसास को
जो तुम्हारे साथ से पूर्ण होगा
हाँ तुम ही तो हो उसका भूत,भविष्य और वर्तमान
उसकी पहचान ,उसका सम्मान
हाँ लौटना ही होगा तुम्हें…उसके अस्तित्व की रक्षा हेतु
लौटना ही होगा तुम्हें…उसके अंतहीन इंतज़ार के मौन को,,
राग के मधुर स्वरों में
बदलने को
लौटना ही होगा तुम्हे
एक बार फिर से…


(चंडीगढ़ में टीचर  निवासी मीनाक्षी मोहन ‘मीता’  हिंदी में एम.ए. व बीएड  हैं , कविताएं लिखती हैं। )

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