सम्पादक की कलम से —- संजयोवाचः

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सम्पादक की कलम से —-

संजयोवाचः

जो नहीं हो सके  पूर्ण  काम
मै उनको  करता हूँ  प्रणाम !

जो छोटी सी नैया    लेकर
उतरे करने  को उदधि पार
मन की मन मे रही , स्वयं
हो गये  उसी मे  निराकार
           _ उनको प्रणाम !

जोउच्य शिखर की ओर वढे
रह रह नव  नव उत्साह  भर
पर कुछने लेली हिम समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे
              _ उनको प्रणाम !

जिनकी सेवाऐ    अतुलनीय
पर    विज्ञापन   से रहे   दूर
प्रतिकूलपरिस्थितिमे जिनके
कर दिये   मनोरथ  चूर चूर
              _ उनको प्रणाम !

कवि विशिष्ट ‘ नार्गाजुन ‘  की 1936 में लिखी इस विशेष कविता ‘ उनको प्रणाम ‘ से अपने ‘नये रास्ते’
और अंक बदलते साल की गतिशीलता में आप सभी को प्रणाम |

प्रणाम अनुशासन है प्रणाम शीतलता है प्रणाम आदर सीखाता है प्रणाम झुकना सीखाता है प्रणाम क्रोध मिटाता है हाथ जोड़ कर प्रणाम करने की प्रक्रिया मे अंहकार हाथ से कहीं छूट जाता है गिरते हुए अंहकार की गिरावट की उष्मा लेकर क्रोध शरीर से वाष्पित होकर यूहीं उड़ जाता है और प्रिसिपीटेट वनता है ‘ प्रेम ‘ _ _

प्रणाम प्रेम है प्रणाम की आवश्यक और पर्याप्त शर्त ही प्यार है और ‘प्यार’ _

प्रसिद्ध वैज्ञानिक चिंतक ‘कार्ल सैगन ‘ के शब्दो में
” हम इस अनन्त व्रह्मांड मे इतने छोटे है कि प्यार के बिना इन दूरियों को हम नही पाट सकते ”
और इन्ही दूरियों को कम करने के लिए बमवर्षक विमानों के साथ साथ गुलाव के फूलो का भी इस्तेमाल समय समय पर किया जाता रहा है पर दो दिलों को मिला कर खीची जाने वाली सवसे छोटी रेखा अभी भी निर्माणाधीन है _ _

प्रणाम उगते हुए सूरज को नही अपितु अधजले मोमवत्ती को जिसमे अभी भी पिघलने का हुनर है प्रणाम उसको नही जिसने टेनिस का ‘ ग्रेड़ स्लेम ‘ जीता है बल्कि उसे जो मुहल्ले के छोटे से उबड़ खावड़ मैदान पर लकड़ी के वल्ला पकडे पहली ही गेंद पर ईटो के विकेट के भरभरा कर गिरने की आवाज सुनता है पर झल्ला कर बल्ला नही फेकता_

इसी के साथ ” हिमालयी लोग ” पोर्टल पर मेरे साथ आप सभी का स्वागत और दोनों हाथ जोड़ कर
   🙏  ‘ प्रथम प्रणाम ‘ 🙏


संजय श्रीनेत
31/12/2018

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