कविता —- एक नदी बहती थी

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—- रूचिता बहुगुणा उनियाल

 
गांव के पीछे घाटी से उतरकर
एक नदी बहती थी

नदी के पानी में बहता था जीवन,,

मछलियों की बिरादरी ,मगरमच्छों के कुटुंब

उसमें बहता था जीवन का सार

मृत्यु से लेकर जन्म तक

जन्म से लेकर मृत्यु तक

नदी बहती थी अविरल धारा में

अचानक एक दिन,,!!

उसकी धारा को रोका गया

बहते हुए जीवन को टोका गया

अब ….
मछलियों के शव तैरते हैं उसके पानी में

नदी की खामोश चीखों से

दहशत फैल रही है हर कोने में

एक औरत बनी है आज नदी
मैले कुचैले और फटे कपड़ों में

सड़ी गली लाशों की दुर्गंध से

खुद को जिंदा रखने की नाकाम कोशिश करती

अस्तित्व बचाने के लिए आतुर

फिर से अविरल बहने को उत्सुक

घाटी से नीचे बहने वाली नदी!!!
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— रूचिता बहुगुणा उनियाल
शिक्षा- अंग्रेजी साहित्य में डबल एम ए
– नरेन्द्र नगर टिहरी गढ़वाल
सतत लेखन–कविता, कहानी, समसामयिक लेख आदि
ईमेल    –    ruchitauniyalpg@gmail.com
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