भाजपाई त्रिवेंद्र सरकार का कांग्रेसी फैसला

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देहरादून। कांग्रेसी तो पहले से बदनाम हैं कि वे झुग्गियां बसाते हैं। ताकि वोट पा सकें। दिल्ली को बदरंग बनाने में कांग्रेसियों का बड़ा हाथ रहा है। लेकिन भाजपा, जो कि खुद को पार्टी विद डिफरेंस कहती रही है, अब कांग्रेस की राह पर है।
त्रिवेंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश, बिहार से आकर देहरादून में नदियों, नालों, सडक़ों के किनारे अवैध कब्जा करके बसे लोगों को वोट बैंक के चलते हटाने से बचा लिया है। अदालत के फैसले को उलटने के लिए अध्यादेश ला चुकी है। संघ का कार्यकर्ता रहे त्रिवेंद्र ने इससे पहले शराब की दुकानों को बचाने के लिए भी अदालत के फैसले को उलट सा दिया था। अब त्रिवेंद्र रावत कांग्रेसी जैसे हो गए हैं।
त्रिवेंद्र सरकार के राज्य की अवैध मलिन बस्तियों को उजाडऩे से बचाने की सरकार की कोशिश पर राज्यपाल ने अपनी मुहर लगा दी है। राज्यपाल डॉ. केके पाल ने कैबिनेट से पास नगर निकायों एवं प्राधिकरणों हेतु विशेष प्राविधान-2018 अध्यादेश के मसौदे को मंजूरी दे दी है। राज्यपाल की मंजूरी के साथ ही अध्यादेश तत्काल प्रभाव से लागू होगा और छह माह के भीतर सरकार को इसे विधानसभा में पास करना होगा।  त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल की बैठक में मलिन बस्तियों को तोडऩे से रोकने के लिए अध्यादेश का मसौदा पेश किया गया था। इसे सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी गई थी। अब राज्य के समस्त निकायों और प्राधिकरणों पर यह व्यवस्था लागू होगी।
अध्यादेश के तहत राज्य के नगर निकायों में मलिन बस्तियों के सुधार, अनियोजित निर्माण, विनियमितीकरण, पुनर्वासन, पुनर्व्यवस्थापन तथा उससे संबंधित व्यवस्थाओं एवं अतिक्रमण निषेध नियमावली-2016 प्रचलन में रहेगी। साथ ही राज्य सरकार तीन साल के भीतर मलिन बस्तियों एवं झुग्गी झोपडय़िों के रूप में हुए अनधिकृत निर्माण और अतिक्रमण के समाधान के लिए सभी आवश्यक प्रयास करेगी।
इस अध्यादेश में 11 मार्च 2018 कट ऑफ डेट है। यानी इसके बाद किसी प्रकार के अनधिकृत निर्माण को अध्यादेश के तहत राहत नहीं मिलेगी। वहीं सार्वजनिक सडक़ों, फुटपाथ, गलियों और पटरियों पर किए गए अतिक्रमण को भी कोई छूट नहीं मिलेगी। इसके अलावा यदि राज्य सरकार को इस अध्यादेश के तहत की गई व्यवस्था को लागू करने में दिक्कत होती है तो राजपत्र में प्रकाशित आदेश में ऐसे प्रावधान किए जा सकेंगे जो कठिनाई दूर करने में सहायक होंगे। हालांकि इसके लिए अध्यादेश लागू करने के बाद अधिकतम दो साल का ही वक्त सरकार के पास है।

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