–देहरादून से नीलम पांडेय ‘नील’

ओ ईजा! सुण,सुण यौ
पहाड़ क्ये कूँ रँई
यौ नदी, गाढ़ गध्यार
यौ खेतों में,लागी हल
क्ये कूँ रंई
सुण, भली भाँत सुण
त्यार भीतेर बै
जो आवाज आणै
आज, उकै लै सुण
तु बटे आवाज लै सुण
जो बाट बै कई अपण
शहर नैह गई
फिर कतुक सालों तलक
उँ वापस लै नी आय
उनर जाण बाद जो
खेत बांझ हैं गयी
तु उन खेतोंक
आवाज लै सुण
पर  तु यौ सुनसान
बाटां कै नी देख
मैं जाणनु कि तकै
निशास लागू रौ
किलैकि माठू माठ हमेरी
यौ बाखली खाली ह्वै गे
पर तू देखिए, एक दिन यौं
कुड़ीक लोग वापस त आल
जो जो पलायन कर गयी
उँ सब आल एक दिन
गाँ दैब्तोंक बुलाण पर
या जेधिन तु बिदा ह्वै
जाली उधिन उँ आल
आहा ! कसिक
उनर आणल, त्यैर मरियम
लै गौं में रौनक ह्वे जाली
पर जब उ गुड़ै कटक
दगड़ चहा  प्याल
तब भुल जाल, भुल जाल
उ अपण ऐसप्रेसो काफी
देखिऐ, उधीन त्यैर बिना यौ
खाली घर उनुकैं चिढ़ाल
मन मन उचाट लगाल
तब जब हरी भरी घर
और त्येर याद आली
ईजा ! ओ ईजा
व्यी द्वार की सांकल
लै नी खोल पाल
व्यी द्वार की सांकल
लै नी खोल पाल ।

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नीलम पांडेय ‘नील’

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