शहरों के उत्तराखंडी ‘कौथिग’ का मतलब केवल जगमग करती चीजों को प्रणाम !

0
403

——वेद विलास उनियाल /

/       / कौथिग शब्द बहुत अलग चीज है। वहां लोग अपनी इच्छा से आते हैं , लाए नहीं जाते। मगर उत्तराखंड भवन के आयोजन के लिए लोग जुटाए जाते हैं। मुख्यमंत्री का आयोजन और श्रोता महज पचास।. दूसरा मुंबई कौथिक की भीडृ घमंड करने के लिए नहीं है..। जिसका नाम ही कौथिग है यानी मेला। मेला किसी एक या दो का नहीं होता । कोई यह समझता है कि कौथिग कुछ लोगों तक सीमित है तो गलत है। आखिर राज्य सरकार पैसा देती है। माता मंगला भोले महाराज जैसे दयालू लोगों की कृपा बरसती है। दिल्ली देहरादून चंडीगढृ से भी लोग आते हैं तो कुछ न कुछ देकर चले आते हैं। इतना विज्ञापन, मुख्यमंत्री से लेकर मत्री विधायकों का ताम झाम। लाव लश्कर। एक ब्रांड मेला बनना स्वाभाविक है। इसके अलावा उत्तराखंड से आए कलाकारों का समूह। कुछ कला संस्कृति के बावले तो अपने निजी खर्च पर कौथिग में कलाकारों की टोलियां भेजते रहे हैं। धन भी देते रहे। इसका नियोजन करना महत्वपूर्ण है। पर भीड पर गुमान न कीजिए। कौथिग की टीम ने बहुत मेहनत करके एक मुकाम बनाया है। लेकिन थोडा संभलना है। कुछ दिशा से अलग होती चीजों को संजोना है।

जिस उत्तरकाशी बागेश्वर , गौचर के मेले में सरकार लगभग अंगूठा दिखा देती है , दानदाताओं को भी उन वास्वतविक कौथिगो से मतलब नहीं होता। दिल्ली चंडीगढ देहरादून वाले जिस उत्साह से मुंबई के लिए जहाज में चढते हैं गौचर उत्तरकाशी रवईं जोनसार की ओर नहीं झांकते। तब भी वहां हजारों लोग आते हैं। अब कम होने लगे यह अलग बात। बस दुआ कीजिए कि कौथिग कौथिग ही रहे। कहीं ये अति ग्लेमराइज हो गया , या दिशा से भटका तो औधें मुंह न गिर जाए। संगीत भी बिगड़ रहा है वहां। रंगीन रोशनी में कुछ मूल चीजें छिटक भी रही हैं।

कवि पूरण पथिक दुनिया से चलेजाते हैं। कौथिग दो शब्द उन पर नहीं कह पाता है। प्रख्यात रंगकर्मी पत्रकार लेखक राजेंद्र धस्माना हमसे बिछुड जाते हैं, कौथिग तक शायद सूचना नहीं होती। सतपुली के विख्यात हारमोनियम वादक का निधन होता है। कौथिक का मंच श्रद्धाजलि नहीं दे पाता है । कौथिग क्या केवल उन लोगों के लिए जो हसते खेलते तरानों के बीच है।
हमारे कौथिग का मतलब क्या है। कई असहाय है दिक्कत में है तो कौथिग सुध नहीं लेता। उसे केवल ग्लैमराइज जीवन चाहिए।

केवल जगमग करती चीजों को प्रणाम। जिनसे कुछ हासिल उनकी जय जय। केवल रंगबिरंगे उत्सव तक सीमित रहना। नहीं कौथिग की संपूर्णता सुख दुख, बीते समय आज के समय हर चीज को अपने साथ जोडे रखना है। जिन्हें याद किया उन्हें याद रखना अच्छी बात है क्या कौथिग रुद्रप्रयाग की उस सात में पढने वाली बच्ची को मंच दे सकेगा जिसने अपने गांव में अच्छा स्कूल न होने की व्यथा पर पत्र लिखा है। क्या कभी किसी हुडका बजाने वाले का सम्मान हुआ। क्या किसी एपण कला या शिल्प कला के प्रवीण का सम्मान हुआ।
या केवल नाच गाना आए ,, तभी कौथिग बुलाएगा। क्या मंच को आकर्षक बनाने सेलिब्रिटी ही याद की जाएंगी। या वही याद किए जाएंगे जिनकी कहीं कुछ चल रही है। या जो आज के लिए उपयोगी है। कल दूसरे आएंगे। ये भी भुला दिए जाएंगे।

गायन की परंपरा तो कई साल पहले छूट गई। बस कुछ कलाकार निभा लेते हैं। कौथिग की भीड़ से खुशी हो सकती है। पर बहुत कुछ सजोने की जरूरत है। और हां उत्तराखंड की संस्कृति और परंपरा का मतलब केवल नाच गाना ही नहीं। कौथिग में 80 प्रतिशत नाच गाना ही होता है। कुछ दिखाने के दो चार आयोजन भले हो जाए। आप लोग बुरा मानेंगे लेकिन बहत कुछ होने पर भी यह फिल्म फेस्टिवल जैसा लगता है । कौथिग का मिजाज तो हमे उत्तरकाशी के माघ, बागेश्वर बसंत पंचमी और गौचर के मेलों में ही दिखता था। रवाई जौनसार के मेलो में दिखता है। मेले में लोग मिलते जुलते थे। सागर किनारे तो बस तेज संगीत को सुनना है। पचास तरह की रोशनी में उछाल भरते नृत्य दखने में। जागर के लिए ऐसे साउंड है कि मलाड घाटकोपर तक का आदमी डर जाए। जागर, बाजुबंद, छोपती, बारहमासा , ऋुतुगीत मांगल की असली मिठास लहक सब गायब सी है। कहां हैं असली झुमैलो, कहां है थड्या नृत्य। कहां है कुमाऊनी होली के होल्यार। कहां है खुदेड़ गीत । इस शोर शराबे में किसको किसकी खुद। सब तो वहां झूम रहे हैं। थिरक रहे हैं। क्योंकि माहौल यही कि सब भूलों और थिरको। फिर साथ में बंटता चुरमा, पलायन के दुख दर्द का। कुछ नकली सा। अपना मुल्क इस तरह याद नही किया जाता। बाजुबंद ठीक से लगाओ, चैती गाओ, न्यूली को मन से भीग कर गाओ। पहाडों की खुद लगने लग जाएगी । वरना दस दिन नाचे फिर मगन। कौन पहाड़ कैसा पहाड। सच यही है कि कौथिक को उस पहाड़ को ठीक से याद करना होगा। केवल आयोजन के लिए कुछ रस्म निभाने से बहुत ऊपर। हां जो प्रयास होता है वह कुछ न होने से बहुत अच्छा है।

याद आया इसी कौथिग सेे निकले कुछ युवा हिमालय बनी टी शर्ट पहने उत्तराखंड में हक्तक्षेप करने भी आए थे। क्यों अब क्या इसकी जरूरत नहीं । या उद्देश्य पूरे हो गए। एक गीत भी तैयार किया था । कुछ नारे भी थे। कुछ जोशीली बातें भी थी। सब एकाएक कहां चला गया।

मिनाक्षी भट्टजी को जरूर लोगों को जोडने और कौथिग को बेहतर संजोने का प्रयास करते हुए देखा। वह संवेदनशील हैं। लेकिन टीम के लोग थोडा और व्यापक दायरे में सोचने लगे तो ऐसे मेलों का फायदा होगा। वरना दस दिन का उत्सव। अखबार भी रंग जाएंगे। एक दूसरे की प्रशंसा होगी। कुछ फूल मालाएं भी गले में पड़ जाएगी। लेकिन यह कौथिग की मूल भावना से अलग होगा। मुझे खूब कोसे मगर थोडा सोचे। हमें अच्छा लगेगा अगर कौथिग कौथिग की तरह लगे।

(साभार –वेद विलास उनियाल जी की  फेसबुक वाल से )


 

(वेद विलास उनियाल जी  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here