कविता — मेरे पहाड़ की नारी

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— दीपशिखा गुसाईं  /

मेरे पहाड़ की नारी
मेरे पहाड़ की नारी
हिम्मत उसकी भारी।
पहाड़ सा जीवन
हर पल जीती,,
रहती सदा मुस्कुराती।
जब भी सोचा,
जब भी देखा,,
उसे जीवन से
लड़ते देखा।
चाहे हो बर्फीली सुबह या
ठण्ड से ठिठुरती रात,,
कभी न होती निढाल
कभी न माने हार।
‘रतब्याणी’ ही उठ कर
‘कल्यो’ रोट बनाती,,
‘गौड़ी’ दुहने के बाद,
जाने कब ‘बोण’ को जाती,
‘सुल्येटे’ में घास के पूले,
इतने न गिन पाते,,
कैसे चट्टानी रास्तों से
उठा कर वो ला पाती,,
कंधों पर ढेरों जिम्मेदारी
मेरे पहाड़ ही यह नारी।

घर आते ही ‘पुंगडे’ की
चिंता उसे सताती,,
जाने कैसे, किस तरह
वो सबकुछ है कर जाती।
आती कहाँ से हिम्मत उसको
पूछने पर मुस्कुराती।

ये पहाड़ ही हिम्मत उसकी
सब सहकर औरों का
जीवन सरल बनाती,,
नई उमंगों के बीज बोए
काटे गूढ़ रिश्तों के फोहे।
हर हाल में रखती
अपनी खुशबु बचाकर
खुद को रखती
संस्कारों से सँवारकर।

पहाड़ की हवा है बावरी,,
उन्नति के रास्ते ढूंढ ही लेती।
उसी हवा संग बहकर।
नारी जीवन मे रंग भर लेती।
हर रिश्ते को जोड़कर भी
पाया उसने ऊंचा मुकाम
कठिन पथरीली राहों को भी
बनाया कोमल और आसान।
गेंहूँ, दाल, चावल के अनाज से
चुनती जैसे कंकड़, पत्थर
लिखती अपनी किस्मत
जोड़कर अक्षर अक्षर।

मेरे पहाड़ की नारी
हिम्मत उसकी भारी।

“दीप

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