डायनासोर की तरह विलुप्त हो गई है उत्तराखंड पत्रकार परिषद

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नई दिल्ली। जिस संस्था की कमान कभी राजेंद्र धस्माना, एनके डोभाल, डा. गोविंद सिंह जैसे वरिष्ठ पत्रकारों के हाथ रही है वह आज डायनासोर की तरह विलुप्त हो गई है। उत्तराखंड राज्य आंदोलन से लेकर पहाड़ के सराकारों को दिल्ली में दमदार तरीके से उठाने वाली इस संस्था को अब पत्रकार ही भूलने लगे हैं।
पिछले लगभग एक दशक से यह संस्था एक भी ऐसा कार्यक्रम नहीं कर पाई है जिसे लोग याद रख सकें। एक-दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों को बुलाकर समारोह तो किए लेकिन अब तो कई साल से बैठक तक नहीं हो पई है।
लगभग 10 साल पहले इस संस्था को पुनर्जीवित करने के लिए वरिष्ठ पत्रकारों की एक कार्यकारी कार्यकारिणी बनाई गई थी। इसके अध्यक्ष देवेंद्र उपाद्याय को अध्यक्ष (कार्यकारी) अध्यक्ष और अवतार नेगी को बनाया गया। लेकिन संस्था का पुर्नगठन नहीं किया गया। उपाध्यय के  निधन के बाद तो संस्था का क्या हाल है यह भी किसी को मालूम नहीं है। वैसे चर्चा यह भी है कि एक गैर पत्रकार ने  उत्तराखंड पत्रकार परिषद नाम से पंचीकरण करा दिया है और वे इससे अध्यक्ष भी बन चुके हैं। 90 के दशक में इस संस्था के गठन के समय से ही इसमें विवाद भी शुरू हो गए थे। क्योंकि इसमें कई गैर पत्रकारों को भी सदस्य बना दिया गया।
जब जबकि उत्तराखंड में सरकारी तंत्र पर दबाव बनाने की बेहद आवश्यकता है, पत्रकारों की इस संस्था को पुनर्जीवित करने की अति आवश्यकता है।
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