नाच-गानों और कवि सम्मेलनों का सांस्कृतिक ततंबा

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——- व्योमेश चन्द्र जुगरान /
नई दिल्ली। पहाड़ हो चाहे देहरादून या दिल्ली, इन दिनों हमारे पर्वतीय समाज में जगह-जगह नाचगानों, मेळे-खौळों और कवि सम्मेलनों का ततंबा मचा  हुआ है। पहाड़ के प्रमुख अखबारों में इन्हीं खबरों की भरमार है। यह ‘उत्सवी वातायन’ सत्ता प्रतिष्ठानों को भी खूब भा रहा है क्योंकि उनके लिए सर्वश्रेष्ठ स्थिति यही है कि समस्याओं का पहाड़ नाच-गानों के कौतुक और दरी-कुर्सी-कनात के बहुरंगी साये में अलसाता रहे।

कभी-कभी लगता है मानो पहाड़ के लोक उत्सवों ने, खासकर राज्य बनने के बाद एक बड़ी मनोरंजन मंडी का रूप धर लिया है जिसमें सड़ा-गला सब बिक रहा है। मोटी रकम खर्च करने की हैसियत रखने वाले प्रायोजकों को मंच पर वाहवाही लूटने और उत्तराखंड में राजनीतिक भविष्य के हसीन सपने दिखाए जा रहे हैं।

आपस में ही गुटबंदी कर कथित पहाड़ी कविगण फूलमालाओं, दुशालों और स्मृतिचिन्हों के आदान-प्रदान का धतकर्म करते नजर रहे हैं। यानी तू मुझे मुल्लाक कह, मैं तुझे काजी..। इस कवायद में सबसे बड़ी क्षति यह हो रही है पहाड़ की बुनियादी चिन्ता से जुड़े बड़े सवाल मंचों के हंसगुल्ले होकर रह गए हैं।

यहां राजधानी दिल्ली में भी हम पहाड़ी लोग दिनोंदिन अधिक मेले जुटाने लगे हैं। हमारे आयोजनों में पहाड़ से नामी कलाकारों को मोटी रकम खर्च कर बुलाया जाता है। वो गाते हैं, हम झूमते हैं और फिर माइक-कुर्सियां समेट ली जाती हैं।

माना कि समुदायों के लिए उनके सांस्कृतिक उत्सवों का बहुत महत्व होता है। सांस्कृतिक मंच लोगों को उनकी जडों तक पहुंचने का सबसे आसान और प्रभावी रास्ता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज महानगरों की उतावली संस्कृति के बीच हमारा समुदाय अपनी माटी से जुड़ी पहचान चाहता है। नई पीढ़ी भी संबंधित परंपराओं और संस्कारों को जानें, यह जरूरी है। दिल्ली में पट्टियों के हिसाब से बने हमारे दर्जनों संगठनों के बीच एकता और सद् भाव रहे, इसके लिए लोकोत्सवों से बेहतर औषधि कोई नहीं है।

वैसे भी हमारे लोकोत्सव राजधानी दिल्ली। के मिश्रित सांस्कृतिक मिजाज में शानदार रंग भरते आए हैं। उत्तराखंडी रामलीला और होली जैसे आयोजनों का अपना निराला इतिहास है। हमें यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि प्रवासी पहाड़ी समुदाय यदि अपनी विभिन्न संस्थाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों से न जुड़ा होता तो उत्तराखंड राज्य आंदोलन को पहाड़ से बाहर शायद वैसी कौंध नहीं मिल पाती।

मगर आज स्थिति बदल गई दिखती है। एक ‘सांस्कृतिक अतिवाद’ हमारे समाज को चपेट में लेता जा रहा है। हमने संस्कृति के उत्थाैन के नाम पर छोटे-छोटे जत्थे बना लिए हैं। कुकुरमुत्तों की तरह उग आए नए नए संगठनों के बीच आगे दिखने की होड़ लगी है। सोशल मीडिया का दौर है तो सच को झूठ और झूठ को सच दिखाने का उपक्रम जारी है और प्रचार के इस सहज सुलभ माध्यम से कईयों की दुकानदारी चल निकली है।

यह कवायद उन पुराने संगठनों से बिल्कुल भिन्न्  है जो आपस में सुख-दुख बांटते आए हैं और अपने सीमित आर्थिक साधनों से समाज में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक योगदान करते रहे हैं। इन संगठनों/संस्थांओं ने पहाड़ और मैदान के बीच एक सामंजस्य स्थारपित करने का भी नेक काम किया है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि नए उभरे सारे संगठन गड़बड़ हैं। कई ग्रुप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। हमने स्वयं ऐसे संगठनों को पाया है जो प्रचार से दूर किसी मॉल परिसर या पार्क में मिलते हैं और पहाड़ के लिए कोई बड़ी सहायता व सामाजिक काम की तैयारी के निमित्त गहन विचार-विमर्श करते हैं। उन्हें अपने कार्यक्रमों के लिए न किसी नेता की जरूरत पड़ती है और न किसी प्रायोजक की। हमें लगता है कि मकसद बड़ा हो और स्पष्ट हो तो किसी भी संगठन और संस्थाग को उसी के भीतर से ऊर्जा प्राप्त होती है।

ऐसे संगठनों को अलग करते हुए देखें तो आज हमारे ज्यादातर सांस्कृतिक आयोजनों का मुख्य मकसद मनोरंजन और अपनी-अपनी संस्थाओं की धाक जमाना है। हालांकि इसमें किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए, परंतु सिर्फ यह न हो कि नेगीजी-राणाजी आ जाएं, लोग उनके गानों पर थिरकें-नाचें और फिर कुर्सी-दरी समेट ली जाएं। बेहतर हो कि हमारे लोकोत्सव मनोरंजन के साथ-साथ पहाड़ के जरूरी सरोकारों/समस्याओं से भी साफ-साफ जुड़ते नजर आएं।

बड़े कलाकारों की उपस्थिति का लाभ उठाते हुए हमें चाहिए हम अपने मंचों को मनोविनोद के साथ-साथ पहाड़ के वृहत्तर विमर्श का भी हिस्सा बनाएं। इसकी जरूरत इसलिए भी है कि उत्तराखंड से छनकर आने वाली खबरें अच्छी नहीं हैं। एक पर्वतीय प्रदेश के रूप में वहां हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, पलायन जैसी अहम चिन्ताओं के लिए राज्य सरकार द्वारा पलायन आयोग के गठन का मूढ़ निर्णय !

वर्तमान ‘सांस्कृतिक अति’ की वर्जनाएं समझनी होंगी। सियासी पार्टियों के नेता मंचों पर आकर उत्तराखंडी संस्कृति के लिए हमारी पीठ मलासते हैं मगर जरूरत के वक्त पीठ दिखाने से भी बाज नहीं आते। याद करें, किरण नेगी के साथ हुए अमानवीय अत्याचार के खिलाफ जंतर-मंतर पर हमारे बीच मोमबत्ती जलाए कोई नेता दिखाई दिया? राजनीतिक भागीदारी की मांग पर किस पार्टी ने हमारी बात सुनी? लोकभाषा अकादमी के नाम पर आश्वासन के सिवा क्या मिला? सामाजिक सरोकारों से जुड़ी विभिन्न शासकीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व, अनुदान इत्यादि के मामले में हमारी प्रतिभाएं क्यों हाशिये पर हैं?

यह माना जा सकता है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन और इसके फलस्वरूप राज्य प्राप्तिं के साथ ही हमारा प्रवासी समाज अपने सांस्कृतिक सरोकार का एक चक्र पूरा कर चुका है। पर, अब दूसरे चक्र की जिम्मेदारियां अधिक चुनौतीपूर्ण हैं। गैरसैंण और पंचेश्वर जैसे मुद्दों पर सरकारों को झुकाने में हमारे सांस्कृतिक आयोजन मजबूत कड़ी का काम कर सकते हैं।
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( व्योमेश चन्द्र जुगरान  वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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