खोई राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटे हरीश रावत !

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 — अवतार नेगी /

/ नई दिल्ली। उत्तराखंड विधान सभा चुनाव में बुरी तरह से मात खाने के बाद एक बार फिर से राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अब अपनी खोई राजनीतिक जमीन तलाश में जुट गए हैं। इसके लिए वे नाराज प्रवासी उत्तराखंडियों पर डोरे डाल रहे हैं और उनके छोटे छोटे कार्यक्रमों में भी शिरकत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। रावत जानते हैं कि कांग्रेस में राहुल युग आ जाने के बाद अब पार्टी में बुजुर्ग नेताओं के लिए संरक्षक व सलाहकार की ही भूमिका बची है। भाजपा तो अपने 75 साल की उम्र पार कर चुके नेताओं को मार्गदर्शक मंडल का सदस्य बना चुकी है। कांग्रेस की कमान युवा नेता के हाथ आ जाने के बाद हरीश रावत भी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। रावत के पास अब 2019 के लोकसभा चुनाव ही बचा हैं जहां वे अपनी राजनीति की अंतिम पारी खेल सकते हैं। राज्य में हरिद्वार की सीट अब उनके लिये क़तई सुरक्षित नहीं हैं । हाल के विधान सभा चुनाव में हरीश रावत दो सीटों से लड़े थे और दोनों जगह से बुरी तरह मात खाने वाले वे देश के पहले मुख्यमंत्री बने थे । हरिद्वार संसदीय सीट के तहत आने वाली हरिद्वार ग्रामीण विधान सभा सीट से भी वे हार गये थे जबकि इस सीट पर पहाड़ के लोगों के अलावा मुसलमानों और गुज़रों का वर्चस्व था जिसे कि कांग्रेस का परम्परागत वोट माना जाता है । फिर भी हिम्मत न हारने वाले रावत की निगाहें नैनीताल संसदीय सीट पर भी टिकी हुई हैं । लेकिन वहाँ दावेदार बहुत हैं इसलिये वे दिल्ली व एन सीआर में भी सीट तलाशने में लगे हैं । सवाल यह है कि दो-दो विधानसभा चुनाव हार चुके हरीश रावत को लोकसभा के लिए टिकट भी मिलेगा कि नहीं। उत्तराखंड में जिस तरह से लोगों ने रावत के नेतृत्व को नकार दिया उससे राहुल गांधी भी अब प्रदेश के लिए नया व युवा नेतृत्व तलाश रहे हैं। जिस तरह से हरीश ने अपनी अकर्मण्यता के चलते उत्तराखंड के कई दिग्गज कांग्रेस नेताओं का भाजपा में शामिल होने के लिये मजबूर किया उससे भी कांग्रेस आलाकमान उनसे पहले से ही नाराज़ था । लेकिन रावत के यह विश्वास दिलाने पर कि वे पार्टी को जीतायेगे, आलाकमान ने चुनाव को समीप देखते हुये उनकी ही पीठ थपथपाई । लेकिन पार्टी की शर्मनाक हार के बाद दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान के द्वार उनके लिये बंद हो गये । कई प्रयासों के बावजूद सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने अब तक रावत को मिलने का समय तक नहीं दिया है। सोनिया गांधी के जन्म दिन पर भी रावत अपनी वानर सेना लेकर 10 जनपथ पहुचे थे, लेकिन वे बाहर ही ढोल बजाकर लौट आए। विधानसभा के चुनाव 2022 में हैं तब तक वे 75 साल पार कर चुके होंगे। जाहिर है कि प्रदेश की राजनीति में अब रावत के लिए कुछ बचा नहीं है। उत्तराखंड से पहले से निराश रावत अब पार्टी आलाकमान के रुख ने और निराश कर दिया। इसलिए वे दिल्ली-एनसीआर के प्रवासियों के बीच फिर से अपने को स्थापित करने में लगे हैं ताकि कांग्रेस के दिल्ली में बैठे नेताओं को भी मालूम हो जाए कि वे आज भी कितने लोकप्रिय हैं। इसलिए उन्होंने उत्तरैण-मकरैण के दौरान दिल्ली -एनसीआर के प्रवासियों को भोजन पर बुलाया। पहले यह भोज सिर्फ उत्तराखंड के पत्रकारों के लिए था लेकिन पत्रकारों की नाराजगी को देखते हुए उन्होंने आम प्रवासियों को भी बुला दिया। दिल्ली मे उतरायणी के मौके पर आयोजित कार्यक्रमों भी रावत के जरूरत से ज्यादा सक्रिय होने का यही कारण हैं कि वे किसी तरह से आलाकमान को खुश करना चाहते हैं । वैसे ज्यादातर प्रवासी रावत से नाराज ही हैं। उत्तराखंडी प्रवासियों को रावत ने आदोलनकारियों की सूची में शामिल करने का वादा किया था। लेकिन उन्हें छला गया। दिल्ली में तैयार सूचियों को भाजपा सरकार ने फाइलों में दबा दिया है। बहरहाल, प्रवासियों की शिकायत यह है कि रावत ने मुख्यमंत्री रहते हुए एक बार भी प्रवासियों को दिल्ली में याद नहीं किया। उनके यहां हरिद्वार के लोग ही ज्यादा दिखते रहे। लेकिन अब जबकि वे खुद सडक़ पर हैं उनको प्रवासियों की याद आ गई है। रावत ने अपने कार्यकाल मे सैकडों लोगों से झूठे वादे किए। जब उनकी सरकार गई तो वे भाजपा के लिए लगभग 70 पोस्ट ऐसी छोड़ गए जिन पर वे अपने समर्थकों को नियुक्त कर सकते थे। प्रवासी आज भी याद करते हैं कि किस तरह उन्होंने उत्तराखंड क्रांतिदल के नेता पूरण सिंह डंगवाल और दिल्ली के मजदूर नेता मंगल सिंह नेगी का इस्तेमाल किया और जब सत्ता में आए तो उन्हें भूला दिया । यही उन्होंने पत्रकारों, शुभ चिन्तकों, अपने खास मित्रों और तपे तपाये समर्थकों के साथ भी किया। सुना है कि प्रवासियों को साधने के लिये हरीश रावत अब दिल्ली के बाद लखनऊ, चंडीगढ़ आदि शहरों में भी भोज आयोजित करने जा रहे हैं,लेकिन उनकी भोज की राजनीति कितनी सफल होगी यह वक्त ही बतायेगा क्योंकि अधिकतर प्रवासियों में अब भी मोदी के पकौडो का नशा है और वे कुल मिलाकर भाजपा के साथ ही हैं ।
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(अवतार नेगी वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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