कविता —सुबह जैसी शाम

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——- नीलम पांडेय नील

कुछ नही बस …..यूँ ही
खाली अक्षांश में
सोयी हुयी नियति मात्र
कभी रेतीले रेगिस्तान में
चमकते पानी का सा भ्रम ।

जब सुबह और शाम के फर्क
धुंधलाने लगते है तब रंगे हुऐ
गगन में अलसाया सा सूरज भी
अपनी तपिश में जलता
अकसर अकेला रह जाता है ।

धरा की रोशनी होकर भी वह
आने वाली शाम को उनींदी
आखों में समेट
चाँद के अनचाहे स्पर्श के
सपने देखता है ।

ढलती शाम में चांद जैसा
बनने की कोशिश
किन्तु सूरज फिर भी नही छोड़
पाता अपनी रक्तिमता
कितने अलग चांद और सूरज ।

एक ही आकाश में दो अजनबी
जब खुद आकाश गंगा के रास्ते में चलते हैं
तब चटक सुबह और इंद्रधनुषी शाम में
पुरी कायनाथ को गुलाबी हो आयी
आखों से समेटने लगते हैं ।

सदियों से ये लुकाछिपी
किसी से छुपी नही है
पर जब नही देख पाती
अधूरे मिलन को तब परियां
शाम को धरती पर उतरती हैं ।

वो बंद होते फुलों  में रात होने तक छुप
जाती है तब उसी क्षण शाम बेहद
रंगीन होती है ,कुछ पल सुरज और चांद
इकठ्ठे आसमान में दिखते है
आह ! तब थोड़ी सी सुबह जैसी शाम होती है ।

नीलम पांडेय नील

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