कभी विकास और रंगीला पुरुष तो आज असहाय और विस्मृत बीमार वृद्ध एनडी तिवारी

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———— हरीश लखेड़ा
नई दिल्ली। एनडी यानी नारायण दत्त तिवारी। यह नाम सुनते ही जेहन में एक साथ कई छवियां सामने आ जाती हैं। दो राज्यों उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री। नोएडा जैसा शहर बना कर विकास पुरुष का तमगा पा चुके एनडी तिवारी की एक छवि रंगीले पुरुष की भी रही है। एक छवि वह भी थी जब वे उत्तराखंड के लोगों की भावनाओं को कुचल कर कह रहे थे कि उनकी लाश पर बनेगा उत्तराखंड। लेकिन राज्य बनते ही वहां मुख्यमंत्री बनने चले गए।
इस सबके अलावा एक छवि यह भी है जब वे संजय गांधी के चप्पल उठा रहे थे। एक समय कांग्रेस को तोडक़र तिवारी कांग्रेस बना रहे थे। और अंत में एक छवि उनकी रंगीले पुरुष की भी रही है, जिसने अंतत: उनके शानदार राजनीतिक जीवन पर हमेशा के लिए दाग लगा दिया।
आज वही तिवारी दिल्ली के एक अस्पताल में बीमारी से जूझ रहे हैं। कई बार उनकी मौत की खबर भी उड़ा दी जाती है। जीवन की इस अंतिम बेला में एक दम विस्मृत कर दिए गए हैं। उत्तराखंडी समाज में उनकी तुलना में इंद्रमणि बडोनी को चाहने वाले आज भी मौजूद हैं। कहा जाता है कि यदि वे नैनीताल सीट से लोकसभा का चुनाव नहीं हारते तो पीवी नरसिंह राव की जगह देश के प्रधानमंत्री होते। तिवारी को उत्तराखंड में हमेशा ही एक खलनायक के तौर पर याद किया जाएगा। राज्य बनने के समय उत्तराखंड के हिस्स में साढ़े तीन हजार करोड़ का कर्ज आया था। इसके बावजूद वे दोनों हाथों से लुटाते रहे। सैकड़ों लोगों को लालबत्तियां बांट दीं। दर्जनों लोगों को ओएसडी बना दिया।
दुनिया बदल रही थी। नई प्रौद्योगिकी आ रही थी लेकिन उन्होंने उत्तराखंड के विकास का वंी पुराना मॉडल चुना जो बहुत पुराना हो चुका था। मैदानी क्षेत्रों में सिडकुल बसाए और वहां कारखाने लगा दिए। जबकि पहाड़ के विकास के हिसाब से कुछ भी नहीं किया। उत्तर प्रदेश के अपने चेलों पर उत्तराखंड का खुब पैसा लुटाया।
तिवारी को राष्ट्रपति का दावेदार माना जाता था, लेकिन उनके रंगीन मिजाज के कारण सब कुछ उलट गया। उनकी रंग रंगीलियों के कारण ही प्रसिद्ध गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने ‘ नौछमी नारैण’ जैसे गीत बनाए। इसके बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी न उनको आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बना दिया। लेकिन वहां वे सैक्स स्कैंडल में फंस गए और पद छोडऩा पड़ा। 2009 में उनका एक टेप सार्वजनिक हुआ था। एक कथित वीडियो में वे दो महिलाओं के साथ आपत्तिजनक अवस्था में दिख रहे थे। कांग्रेस और सोनिया गांधी ने उनसे पल्ला ही झाड़ लिया। इसके बाद तिवारी राजनीतिक हाशिए पर चले गये।
रोहित शेखर ने 2008 में तिवारी को अपना जैविक पिता बताते हुए मुकदमा ही कर दिया। इससे भी उनकी छाछालेदार हुई। अदालत ने तिवारी के खिलाफ जांच शुरू कर दी और उनका ब्लड सेम्पल लिया गया तथा रोहित शेखर और उसकी मां का भी डीएनए लिया गया। तिवारी जी नहीं चाहते की उनका डीएनए टेस्ट सार्वजनिक हो लेकिन अदालत ने सार्वजनिक करने को कहा तथा बाद में पता चला कि रोहित शेखर उनका ही पुत्र था। वर्षों से नानुकुर करते आ रहे तिवारी की अदालत में हार हुई । बाद में रोहित की मां उज्जवला शर्मा से 88 साल की उम्र में उन्होंने विवाह किया। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले एक समय यह भी आया कि वे अपने इस परिवार के साथ भाजपा के साथ हो गए।
अब 92 साल के तिवारी गंभीर तौर पर बीमार हैं। दिल्ली में मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में 26 अक्टूबर को भर्ती कराया गया था। सितंबर में तिवारी को मस्तिष्काघात (ब्रेन स्ट्रोक) हुआ था, जिसकी वजह से उनकी हालत नाजुक हो गई। आज उनको दखने वालों में गिने चुने लोग ही होते हैं।

  • परिचय
    नैनीताल जिले के बलुती गावं में पूर्णानंद तिवारी के घर 18 अक्टूबर सन 1925 को जन्में तिवारी को घाघ नेता माना जाता रहा है। उनके पिता वन विभाग में अधिकारी थे। हालांकि बाद में महात्मा गाँधी के असर के कारण उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और गाँधी के साथ असहयोग आन्दोलन में चले गए। तिवारी जी की शिक्षा हल्द्वानी, नैनीताल और बरेली में हुई. बाद में अपनी पढाई पूरी करने के बाद वे पिता पूर्णानंद की तरह आजादी के आन्दोलन में कूद गए। सन 1942 के आन्दोलन के ब्रिटिश सरकार के खिलाफ तीव्र आन्दोलन करने के कारण नैनीताल जेल में डाल दिए गए। इस जेल में पिता और पुत्र एक साथ रहे, लगभग 15 महीने की सजा के बाद तिवारी जी सन 1944 को जेल से बाहर आये। सन 1947 में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन के अध्यक्ष चुने गये। यह तिवारी जी के लिये राजनीतिक जीवन में आगे जाने की एक बड़ा कदम था। सन 1952 में तिवारी जी नैनीताल सीट से चुनाव लड़े और जीत गए तथा उत्तर प्रदेश के पहली विधानसभा के सदस्य के रूप में विधानसभा पहुचे। सन 1965 में तिवारी काशीपुर विधानसभा से चुनाव लड़े और जीत गए और पहली बार उत्तर प्रदेश के मंत्रीमंडल में जगह मिली तथा उनको कांग्रेस का साथ मिलता गया। सन 1969 से 1971 तक तिवारी जी कांग्रेस के युवा संघटन के अध्यक्ष चुने गए. तिवारी जी को बड़ा सम्मान तब मिला जब वे सन 1976 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और यह सरकार 1977 को गिर गइ तिवारी अकेले नेता हैं जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहे हैं। उत्तर प्रदेश के तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रहे। उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस ने तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया। 2007 में पार्टी चुनाव हारी तो तिवारी का पुनर्वास आंध्रप्रदेश के राज्यपाल के रूप में कर दिया गया।
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