कविता — हे माँ ! आज मनाओ ‘ नो फोन डे ‘ —- दीपशिखा गुसांई ‘ दीप ‘

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माँ तू अब कितना बदल गई है,
माँ सच तू वही तो है न?
पहले एक चीख पर दौड़ आती थी,
मुझसे पहले दर्द तुम्हें सताता था,
बिन लोरी तेरे सो न पति थी,
एक कहती तू दस सुनाती थी,
सोचती कहीं चुप हुई और में उठ न जाऊं,
माँ अब एक लोरी को तरस रही हूँ,
सच माँ तू कितना बदल गई है।।
स्कूल से आती तू गेट पर मिलती,
आज माँ तू कहीं न दिखती,
भूख लगे तू झट बनाती,
जो में चाहूं मुझे खिलाती,
माँ अब तू कहती बस एक मिनट,
और ये मिनट घंटों ले लेते,
सच माँ तू कितना बदल गई है।।
तरस रही तेरा कसकर गले लगाना,
बिन त्यौहार पार्टी करना,
कभी बनाती पिज़्ज़ा,कभी इडली तो कभी करते मिलकर डांस पार्टी,
माँ तू मेरी पसंद का हर काम करती,
पर माँ अब तू कितना बदल गई है।।

माँ बस प्रश्न का उत्तर दे दे,
में ज्यादा पसंद या अपना फोन तुझे है,
चल माँ बस हफ्ते में एक दिन सिर्फ और सिर्फ एक दिन “No phone day” मानते है।
क्या माँ कर पाओगी ऐसा तुम।।
सच माँ तू कितना बदल गई है।।
“हाँ माँ तू सच में कितना बदल गई है।।”

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(देहरादून में टीचर  दीपशिखा गुसांई ‘ दीप ‘ गणित में  M.Sc. हैं।  वे बहुत अच्छी कवितायेँ भी लिखती हैं।  हिमालयी लोग के लिए उन्होंने यह कविता लिखी है।  दीप का आभार )

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