भूले -बिसरे : निश्छल पत्रकार थे वीरेन्द्र बर्त्वाल

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—–  व्योमेश चन्द्र जुगरान

( हिमालयीलोग दिल्ली में उत्तराखंड के पुराने पत्रकारों को याद कर रहा है।  वीरेन्द्र बर्त्वाल पहली पीढ़ी के पत्रकारोंमें से एक थे ।  22 जुलाई को उनकी  नौवीं पुण्यतिथि थीं।)

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नई दिल्ली। परम आदरणीय वीरेन्द्र बर्त्वालजी तब नवभारत टाइम्स दिल्ली मे न्यूज एडिटर थे। मैं नभाटा के जयपुर संस्करण में था। जब भी दिल्ली आना होता, बर्त्वाल जी से मिलने उनके दफ्तर जरूर जाता। ऐसे ही एक अवसर पर मिलने जा पहुंचा।

काम में मशगूल वे तुरंत ही आदतन अति आत्मीयता से मिले। पास बैठाकर कुशल क्षेम पूछने लगे। तभी कार्यकारी संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह अपने कक्ष से निकले और गैलरी की ओर जाते दिखे। बर्त्वालजी ने आव न देखा ताव, मेरा हाथ पकड़ा और सुरेंद्र प्रताप की ओर लपकते हुए मुझे उनके सामने खड़ा कर दिया। परिचय कराते हुए बोले- सुरेंद्रजी यह लड़का आजकल जयपुर में है, काम में अच्छा है। आप कहें तो मैं इसे यहीं रोक लूं। वैसे भी डेस्क पर लोग कम हैं।

एसपी बर्त्वालजी के इस बालसुलभ व्यवहार पर मुस्करा दिए और बोले- ‘अरे..अरे.. बर्त्वाल साहब ऐसा जुल्म न करें। श्यामाचार्यजी (जयपुर के स्थानीय संपादक) मुझे कहीं का नहीं छोड़ेंगे, कहेंगे मेरे आदमी को दिल्ली में रोक लिया। अभी इन्हें जाने दीजिए। मौका आएगा तो फिर कभी रोक लेंगे।’ इस घटना के साल-डेढ़ साल बाद अचानक एसपी के आदेश पर मुझे दिल्ली बुला लिया गया। पर मेरा दुर्भाग्य कि बर्त्वालजी के सानिध्य में काम का मौका नहीं मिला क्यों कि तब तक वे रिटायर हो चुके थे।

उनके साथ काम कर चुके नवभारत टाइम्स दिल्ली के मेरे सहयोगी प्रणव कुमार सुमन बताते हैं कि दुबली-पतली काया वाले बर्त्वाल साहब अत्यंत मृदुभाषी, सरल, सहज और दूसरे की पीड़ा महसूस करने वाले इनसान थे। मेहनती स्वभाव के बर्त्वालजी चीफ-सब होते हुए भी डेस्क पर बहुत सारी खबरें खुद बना लेते थे। उन्होंने कभी मातहतों पर रुआब नहीं गांठा। खासकर नए पत्रकारों से वे बेहद नरमी से पेश आते थे और खूब प्रोत्साहन देते थे। उनके इसी गुण के कारण नए लोग उनके साथ काम करते हुए बहुत सहज महसूस करते थे।

जब वह रिलेस्क रहते थे तो हास-परिहास से जुड़े कई दिलचस्प किस्से सुनाया करते। बाद में वह समाचार संपादक बने। इससे जूनियरों को बड़ी सहूतियत हुई। उन दिनों नभाटा में अतिरिक्त समय काम करने पर 25 रुपये की पर्ची फूड अलांउस के नाम पर मिलती थी। तब पत्रकारों की तनख्वाह बहुत कम होती थी, इसलिए कई साथी इस पर्ची के लिए लालायित रहते थे। बर्त्वालजी अक्सर जूनियर पत्रकारों को खुद ही इस मद में मदद पहुंचाते रहते थे।

जब भी किसी साथी को छुट्टी की दरकार होती, वे निराश नहीं होने देते। कभी कभी तो छुट्टी लेने को खुद ही कहते, बशर्ते उन्हें पता चल जाए कि फलां साथी के घर-परिवार में कोई परेशानी चल रही है। वह कहते- ‘दफ्तर में तो काम चल जाएगा लेकिन अपने घर की दिक्कत तो तुम ही दूर करोगे।’ उनकी इस दरियादिली से कई बार दफ्तर में मुसीबत खड़ी हो जाती, पर वे इसे स्वयं झेल लेते थे।

रिटायर होने के बाद भी उन्हें साथी पत्रकारों की बहुत फिक्र रहती थी। जब भी कोई उनसे मिलता तो हर किसी के बारे में पूछते रहते। सबकी कुशल क्षेम और सहायता को लालायित बर्त्वालजी अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन एक सौम्य और हमदर्द इनसान के रूप में हम सबके जेहन में वे हमेशा जीवित हैं।

वीरेंद्र बर्त्वालजी अविभाजित चमोली (अब रुद्रप्रयाग) जिले की मंदाकिनी घाटी के मालकोटी गांव के थे। वे हिन्दी के कीट्स कहे जाने वाले इसी गांव के अमर कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के चचेरे भाई थे। बर्त्वालजी का जन्म सन 1930 में पौड़ी शहर में हुआ था। उनके पिता ठाकुर सुरेन्द्र सिंह बर्त्वाल जिला परिषद पौड़ी के प्रथम सेक्रेट्री थे। ठाकुर साब को शहर के विकास की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कार्यों के लिए याद किया जाता है। बर्त्वाल परिवार का निवास स्थान पौड़ी के ऐजेंसी के निकट तहसील रोड पर था। यह मकान आज भी इस परिवार की पैतृक संपत्ति है। बर्त्वालजी रिटायर होने के उपरांत अमूमन आधा साल यहीं गुजारते थे।

बर्त्वालजी की शिक्षा पौड़ी, मसूरी, लखनऊ और इलाहाबाद में हुई। वे हिन्दी और अंग्रेजी में डबल एमए थे। 1957 में उन्होंने अंग्रेजी अखबार बाम्बे क्रोनिकल से पत्रकारिता शुरू की और बाद में बंबई नवभारत टाइम्स से जुड़ गए। सन 1960 वे स्थानांतरित होकर दिल्ली आ गए। यहां नवभारत टाइम्स की संपादकीय टीम के महत्वपूर्ण अंग के रूप में वर्षों तक सेवा करने के बाद वर्ष 1989 में वह समाचार संपादक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।  22 जुलाई 2008 को दिल्ली में 78 साल की आयु में उन्होंने संसार को अलविदा कह दिया।

बर्त्वालजी की पत्नी सरोजनी संगीत की गहन जानकार थीं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में संगीत पर उनके समीक्षात्मक लेख छपते रहते थे। दुर्भाग्य से जनवरी 2012 में मयूर विहार, फेस-1 स्थित आवास पर लुटेरों ने उन्हें अकेला पाकर जान से मार डाला। उनके कातिल आज तक नहीं पकड़े जा सके। बर्त्वाल परिवार में पुत्र हेमेन्द्र हैं जो अंग्रेजी के जाने-माने पत्रकार हैं और हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली में विशेष संवाददाता रह चुके हैं।
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(व्योमेश चन्द्र जुगरान  वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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