महान क्रांतिकारी शहीद श्रीदेव सुमन

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शहीद श्रीदेव सुमन महान क्रांतिकारी थे।  श्रीदेव सुमन के संघर्ष ने टिहरी रियासत की चूलें हिला दी थीं। वे अहिंसावादी स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने टिहरी जेल में एक बार नहीं बल्कि दो बार आमरण अनशन किया। दूसरी बार 84 दिनों तक जेल के भीतर आमरण अनशन करते हुए श्रीदेव सुमन ने 25 जुलाई, 1944 को अपने प्राण त्याग दिये।   सुमन का जन्म टिहरी रियासत के बमुण्ड पट्टी के जौल ग्राम में हुआ था। उनके पिता पं. हरिराम बडोनी वैद्य थे। श्रीदेव सुमन ने टिहरी स्कूल से मिडिल परीक्षा 1929 में उत्तीर्ण करने के बाद देहरादून के सनातन धर्म स्कूल में अध्यापन कार्य कीया।  उन्होंने ‘हिन्दी पत्र बोध’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की और कई समाचार पत्रों का संपादन भी किया।   सुमन के विचार बचपन से ही क्रांतिकारी थे। उन्होंने टिहरी रियासत की दमनकारी नीतियों का विरोध शुरू कर दिया। सन् 1930 में उन्होंने देहरादून में टिहरी राज्य प्रजा मंडल की स्थापना की और टिहरी के सामंतवाद के विरुद्ध लड़ाई छेड़ दी।
सन् 1930 में श्रीदेव सुमन नम सत्याग्रह आंदोलनकारियों के साथ सम्मिलित हो गए और पड़े जाने पर 14 दिन जेल में रखे गये बाद में वे मनुदेव शास्त्री के संपर् में आए और उनके सहयोग से दिल्ली में देवनागरी महाविद्यालय की नींव डाली गई। दिल्ली में अध्ययन व अध्यापन के साथ-साथ श्रीदेव सुमन साहित्यि सेवा में भी लगे रहते थे। उन्होंने ‘सुमन सौरव’ नाम से अपनी विताओं का संग्रह प्रकाशित की या जो देशभक्ति पूर्ण और समाज सुधार से संबंधित है। प्रसिद्ध साहित्यकार कालेलर जी ने उन्हें राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यालय में नियुक्त की या जहां श्रीदेव सुमन ने राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। श्रीदेव सुमन ने टिहरी राज्य प्रजामंडल के प्रतिनिधि के रूप में इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 1940 में उन्होंने टिहरी रियासत की दमनकारी नीतियों के विरोध में जनता को जागृत करने का प्रयत्न की या, परन्तु टिहरी में आम सभाओं के आयोजन पर लगे प्रतिबंध के कारण वह वापस देहरादून लौट आए। अगस्त 1942 में राष्ट्रव्यापी ‘भारत छोड़ों आन्दोलन’ के कारण टिहरी रियासत से बाहर प्रजामंडल के सभी कर्यकर्ता गिरफ्तार हो गए और सुमन जी को आगरा सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। 19 नवम्बर, 1943 को आगरा सेंट्रल जेल से रिहा कर दिये गये। उन्होंने टिहरी रियासत की जन विरोधी राज-सत्ता को उखाडऩे के लिए अपना आंदोलन तेज की या श्रीदेव सुमन को 30 सितम्बर, 1943 को चम्बा में गिरफ्तार कर लिया गया और वे टिहरी जेल भेज दिए गए। रियासत की जेल में उन्हें ठोर यातनाएं दी गई और उन पर राजद्रोह का झूठा मुकदमा चलाया गा। श्रीदेव सुमन ने कहा की मेरे विरुद्ध जो गवाह पेश कीए गए, वे बनावटी व झूठे हैं। मैं जहां अपने भारत देश लिए पूर्ण स्वाधीनता में विश्वास करता हूं। उन पर दो वर्ष की कठोर कारावास व 200 रु. जुर्माना की या गया। जेल में श्रीदेव सुमन को कठोर यातनाएं दी गई। उन की न्यायोचित मांगे न माने जाने के विरोध में उन्होंने 3 मई, 1944, को अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू कर दिया। इसके बाद टिहरी रियासत के विरुद्ध लड़ा गया उनका शांतिपूर्ण आन्दोलन सुमन जी के व्यक्तित्व का पूरा इतिहास है, गांधी जी सत्याग्रह का सुमन जी एक अति सुन्दर उदाहरण बने। 209 दिनों की जेल की एकान्त यातना और 84 दिन की इस ऐतिहासिक अनशन के बाद मात्र 29 वर्ष की अल्पआयु में 25 जुलाई, 1944, को यह क्रांतिकारी अपने देश, आदर्श और आन के लिए इस संसार से विदा हो गए। टिहरी रियासत के कर्मचारियों ने जनाक्ररोश के भय से 25 जुलाई, 1944 की रात्रि को अमर शहीद श्रीदेव सुमन के शव को बिना उनके परिवार को सूचित कीए टिहरी की भिलंगना नदी में बलपूर्वक जलमग्न कर दिया।

आजादी से पूर्व टिहरी राज्य की जनता न केवल अंग्रेजी हुकूमत बल्कि टिहरी की राजशाही से भी बुरी तरह त्रस्त थी। टिहरी रियासत  में जनता के लिए स्कूल, पेयजल व रोजगार आदि की बेहद कमी थी, शराब की भट्टियां अत्यधिक संख्या में खुली हुईं थी। एकमात्र इंटर कालेज टिहरी में था जिसमें राजा के कृपापात्र बच्चे ही भर्ती हो सकते थे। टिहरी में सभा करने व भाषण देने पर भी पाबंदी थी।
1938 में कांग्रेस के गुजरात के हरिपुर अधिवेशन में निर्णय लिया गया कि देशी राज्य की प्रजा अपने प्रजा मंडलों द्वारा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करेगी।
23 जनवरी, 1939 को देहरादून में टिहरी राज्य प्रजा मंडल की स्थापना की गयी। श्रीदेव सुमन को इसकी कमान सौंपकर सचिव बनाया गया। प्रजा मंडल ने राजा के समक्ष पौण टोटी कर खत्म किया जाए, बरा बेगार बंद किया जाए तथा राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाए इत्यादि मांगें रखीं। परन्तु राजा नरेन्द्र ने प्रजा मंडल की मांगों को मानने की जगह आंदोलन के दमन का तरीका अख्तियार किया। 1942 में देश में अंग्रजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया। इसका असर टिहरी की जनता पर भी था। जनता इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भागीदारी करने लगी। देश के ज्यादातर राजे-रजवाड़े अंग्रेजों के दलाल थे। वे अंग्रेजों के दमन में हर वक्त उनके साथ थे। 29 अगस्त, 1942 को श्रीदेव सुमन जैसे ही देव प्रयाग पहुंचे उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कुछ दिन मुनी की रेती व देहरादून जेल में रखने के बाद उन्हें आगरा जेल में 15 महीनों तक नजरबंद रखा गया। नबम्वर 1943 में श्रीदेव सुमन को रिहा किया गया। जेल से रिहा होने के बाद श्रीदेव सुमन चुप नहीं बैठे। उन्होंने अंगेजी हुकूमत व राजशाही के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। 30 दिसम्बर को श्रीदेव सुमन को पुनः गिरफ्तार कर टिहरी जेल भेज दिया गया। टिहरी जेल कैदियों को यातनाएं देने के लिये बेहद कुख्यात थी। श्रीदेव सुमन को लोहे की भारी जंजीरों से जकड़ कर, टिहरी जेल के वार्ड नं. 8 में बंद कर दिया। वहां उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी गयीं। जिस फर्श पर वे सोते थे, उसे गीला कर दिया जाता। उनके खाने की रोटियों में भूसा व रेत मिला दिया जाता था तथा उन पर माफी मांगने के लिए दबाव बनाया गया। प्रजा मंडल का संचालक होने के नाते उन पर टिहरी शासन के खिलाफ घृणा, द्धेष  व विद्रोह फैलाने का अभियोग चलाया गया। उनके खिलाफ झूठे गवाह पेश कर उन्हें दफा 124 अ के तहत 2 वर्ष की कैद तथा दो सौ रुपये जुर्माने का दण्ड दिया गया गया।

श्रीदेव सुमन ने जेल प्रशासन से प्रजा मंडल को पंजीकृत करवाने व अपने लिए कपड़ों व किताबें आदि उपलब्ध कराए जाने की मांग को लेकर जेल के भीतर अनशन प्रारम्भ कर दिया। अनशन को 21 दिन बीत जाने पर जेल प्रशासन ने आश्वासन दिया कि शीघ्र ही उच्च अधिकारियों से वार्ता कर उनकी मांगों का समाधान किया जाएगा। परन्तु जेल प्रशासन का आश्वासन झूठा निकला। उनकी मांगों पर कार्यवाही करने की जगह जेल प्रशासन ने उनके साथ सख्त रवैया अख्तियार कर लिया। उन्हें कागज कलम की जगह बेतों की मार पड़ने लगी। उन्होंने निर्भीकता के साथ  कहा कि मेरी यह तीन मांगे महाराज तक पहुंचा दो अन्यथा 15 दिनों के बाद मुझे जेल के भीतर पुनः आमरण अनशन प्रारम्भ करना पड़ेगा। श्रीदेव सुमन की मांग थी कि प्रजा मंडल को पंजीकृत कर उसे राज्य में जनसेवा करने की पूरी छूट दी जाए, उनके मुकदमें की सुनवाई स्वयं महाराज के द्वारा की जाए तथा उन्हें जेल से बाहर पत्र व्यवहार करने की छूट दी जाए।
उनकी उक्त मांगों पर कोई भी सुनवाई नहीं हुई। 3 मई, 1944 को टिहरी जेल में श्रीदेव सुमन ने अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया। उनका अनशन तोड़ने के लिए उनका मुंह संडासी से जबरन खोलने की कोशिश की जाती। उनकी नियमित पिटाई कर उनके पैरों में बेड़िया डाल दी गईं। अनशन के दौरान जेल के भीतर कई बार मजिस्ट्रेट, डाक्टर व जेल मंत्री ने श्रीदेव सुमन से अनशन तोड़ने की अपील की। अनशन के 48वें दिन राज्य के जेल मंत्री डाक्टर बैलीराम ने जेल में आकर उनसे अनशन तोड़ने की अपील की तथा आश्वासन दिया कि वे महाराज से मिलकर स्वयं उनकी मांगों को मंजूर करवाने का प्रयास करेंगे। श्रीदेव सुमन पहले भी झूठे आश्वासन में आकर अनशन तोड़ चुके थे। इस बार वे अपने निर्णय पर अटल रहे और मांगें माने जाने के बगैर अनशन समाप्त करने से इंकार कर दिया।  श्रीदेव सुमन दिल में देश प्रेम का जज्बा लिए टिहरी जेल में तिल-तिल कर अपना शरीर नष्ट कर रहे थे। परन्तु टिहरी राजशाही उनकी मांगों पर विचार करने की जगह झूठी खबर का प्रचार कर रही थी कि श्रीदेव सुमन ने अनशन तोड़ दिया है।4 जुलाई को पुनः टिहरी जेल गए तथा श्रीदेव सुमन को आश्वासन दिया कि 4 अगस्त को उन्हें महाराज के जन्म दिन पर रिहा कर दिया जाएगा, अतः वे अनशन तोड़ दे। इस पर श्रीदेव सुमन ने कहा कि क्या महाराज ने प्रजा मंडल को पंजीकृत कर उन्हें राज्य में सेवा करने की आज्ञा दे दी है, उनका अनशन रिहाई के लिए नहीं है।
जेल के भीतर 20 जुलाई की रात से उन्हें बेहोशी आने लगी। जेल प्रशासन ने उनके शरीर में गर्मी पैदा करने के नाम पर उन्हें कुनैन के इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिए। नस के भीतर लगे इन इंजेक्शनों ने उनके शरीर में गर्मी पैदा कर दी और वे पानी की मांग करने लगे। 25 जुलाई, 1944 की शाम लगभग 4 बजे जेल की काल कोठरी में इस अमर बलिदानी ने अपनी अंतिम सांस ली। उनकी मृत्यु खबर किसी को दिए बगैर ही श्रीदेव सुमन का पार्थिव शरीर बोरे में बंद कर राजशाही द्वारा भिलंगना नदी में इस उम्मीद के साथ फेंक दिया गया।

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