कविता — दूर्णागिरी— नीलम पांडेय “नील”

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पाण्डवखोली के
समीप दूर्णागिरी
द्रोणांचल शिखर
माया-महेश्वर
प्रकृति-पुरुष
दुर्गा कालिका
क्या हो तुम
कहाँ हो तुम
सिर्फ हिमालय में
या मेरे संर्वाग में
हाहाकार करती
एक गहन इतिहास
छुपाये हिमालय की
तलहटी में वर्षो
से  एक कौतुहल
एक जिज्ञासा मेरी
या अबाध आस्था
कई बार देखा या
यूँ कहो हर बार
सुबह उठकर देखा
“रानीखेत” से पल पल
पिघलते हिमालय को
कभी हरे,सफेद, धानी
कभी नांरगी बनते फिर
शाम के ढलते सूरज में
सवंरती पहाड़ियों को
वो साक्षी रही तब जब
मेरी शिकायतों के अंबार थे
किन्तु फिर भी लुभाती थी
वो दूर से दिखती,
रंग बदलती पहाड़ियां
वो दरख्त,वो बांज
देवदार,सुरई ,अकेसिया
की गहन  लंबी कतारें
रात होते ही वो पहाड़ियां
असंख्य दीपमालाओं की
रोशनियों से जगमगाती
तब घनी सर्द हवाओं में
तुलसी के नीचे तुम्हारे
नाम से रखे  दिये में
खुद को जिंदा रखने की
ताकत एकाएक आने लगती
हवा में टिमटिमाता दिया
आज भी जलता  है ।
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नीलम पांडेय  “नील”
रानीखेत, अल्मोड़ा
12/7/17
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1 COMMENT

  1. समकालीन कविता लेखन के युग मे”नील”एक उम्दा कवयित्री है।भावों को सही दिशा देने मे सक्षम एक बेहतरीन व सार्थक लेखिका है।पिछली कविताओं की भांति यह कविता नायाव अल्फ़ाज़ों से गढ़ी सुन्दर रचना।
    बधाई हो।

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