कविता— एक नदी हूं मैं—— नन्दनी बड़थ्वाल

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एक नदी हूँ मैं।
हिमखंड से निकली छोटी सी धारा चलती जा रही हूँ मैं।
ना साथी कोई ना कोई सहारा बस अकेले ही सफर पर चली हूँ मैं।
मिल गए साथी भी सफर में
हो गयी थोड़ी बड़ी मैं।
हिला दिया पत्थर को बना लिया रास्ता अपना
थोड़ी जि़द्दी हो गयी हूँ मैं।
ठान ली समन्दर से मिलने की, मिल कर ही रही हूँ मैं।
कोशिश बहुत हुई रोकने की पर निडर हो कर चली हूँ मैं।
कहीं बांध तो कहीं नहर पर हमेशा चलती रही हूँ मैं।
कहीं बिजली दे कर करती घर को रोशन
कहीँ सिंचाई कर  फल और अन्न देती आ रही हूँ मैं।
निरन्तर चलती कभी ना रुकती
ठान लिया तो पहाड़ भी हटा देती इतनी जि़द्दी हूँ मैं।
जिसे कोई ना बहा पाया उसे भी बहा ले गयी
सारी गन्दगी तेरे शहर की एक मिनट में साफ  कर रही हूँ मैं।
खुद जहर पीती पर तुझे अमृत देती रही हूँ मैं।
आज गंगा भी मैली हो गयी ,
हो गयी जमुना सरस्वती भी।
इतना सब सह कर भी समन्दर से वैसे ही मिलने जा रही हूँ मैं।
जो ना माना तू ए इंसान याद रख एक दिन पूरा शहर बहा ले गयी थी मैं।
बस मुझे मत रोक कहीँ भी चलने दे जैसे चलती जा रही हूँ मैं।
एक नदी हूँ मैं।


( पहाड़ से निकले लोग भी निर्मल नदी की तरह रहे हैं, लेकिन शहरों के प्रदूषण से वे भी मैले होते जा रहे हैं। नंदनी की कलम से निकले ये शब्द सच्चाई बयां करते हैं। हिमालयीलोग के लिए लगातार लिख रही नंदनी का एक बार फिर आभार)

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