कविता—- नदी, पहाड़ और औरत —- अल्मोड़ा से नीलम पांडेय “नील”

2
766

ईजा को देखती हूँ बातें करते
गाढ़ गधेरों, नदियों से
और कभी कभी पहाड़ों से
तो महसूस हुआ यकीनन
पहाड़ों में औरतें
दो तरह की होती हैं
एक नदी और दूसरी पहाड़ सी

नदी सी औरत बस बहती है
संवेदनाओं के सुरों में
कभी चंचल, कभी शान्त
कभी मुखर भावों में
अनजानी राहों में हिम सी
पिघलती हुयी छोड़  आती है
अपनी ऊँचाई,अपनी मिट्टी,
अपनी पहचान और अपने
मन के अबाध सौन्दर्य से
खुद को भुल कर सींचने लगती है
आदम और उनकी जड़ों को
कभी जब छलछला कर उतर जाती है
वह जीवन की तलहटी में तब भी
नही छोड़ती वह अपनी आत्मा
देह में बसी और खोल देती है अन्त:श
जीवन भर सबको
नम करते करते जाने कब किस
मोड़ पर एकाएक
समन्दर को सौंप देती है अपना अस्तित्व भी
और खो जाती हैं गंगा ,गोमती, मंदाकिनी,
शारदा, भागीरथी जैसे कई नाम
जो मां और मायके की
शीतल हिमनदी  सी बयारों में कभी मिले थे उसे

और दुसरी पहाड़ सी औरत
कठोर होकर समेट लेती है
अपनी कोमलता
छिपा लेती है सारे भाव
वह पुरुष  बन जाती है
कभी प्रहरी और कभी संबल बन जाती है
बस रोना भुल खड़ी रहती है बरसों
जीती है कई मंजर पहाड़ से जीवन के
जब तक कोई आकाशी बिजली, बादल
गरज कर तोड़ न दे उसका मौन
या उसका स्वाभिमान
फिर बिखर जाती है विनाश की चरमता तक
कभी दहाड़ मार कर रो पडती है
जो आज तक नही कहा वह भी
कह जाती है अनायास
ऐसे में कभी कभी वह
झुक कर गले लगती है
बहती नदी के
नदी और पहाड़  बातें करते हैं और
बाँट लेते हैं आपस में
जीवन के कुछ अपने हिस्से
एक दूसरे से ।
—————————————————————


नीलम पांडेय “नील”
दिनांक : 6/7/2017
शिक्षा : पोस्ट ग्रेजूऐट अंग्रेजी साहित्य
तथा सोसियल वर्क में । कृति: सांझा संकलन (काव्य रचनाएँ ),अखंड भारत तथा अन्य पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ।
मूल स्थान : अल्मोड़ा
———–

2 COMMENTS

  1. वाह एक उम्दा रचना प्रकृति के पंचतत्वों का यथार्थ चित्रण।आप खूब लिखती हैं नीलम जी।

  2. बहुत ही प्रभावशाली प्रतीकात्मक रचना हुई है। आपने एक चित्र खींच कर रख दिया पहाड़ की औरतों की जीवनचर्या का। बहुत बढ़िया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here