कविता —-सुन ए मेरे पहाड़——- द्वारिका प्रसाद चमोली

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ए मेरे पहाड़ कब तक तू/
अपनों की वापसी के लिए गिड़गिड़ायेगा /
बहुत हुआ तू अब न अपने को यूँ तड़पाएगा/
जो गए वो अपने थे /
लौट के आएंगे ये अब सपने है/
जो बचा है उसकी परवरिश की सोच/
नयी राहों की कर तलाश /
बांस और निंगाल को तराश/
उफनती नदियों व् /
धंसती धरती पर लगा अंकुश/
बृक्षों की पाट दे अपार श्रृंखला /
पुष्पों से अपने यौवन को खिला /
मुफ्त की स्कीमों से पार पा /
मेहनत से तू अपने खेतों का लहलहा /
ए मेरे पहाड़ कब तक तू /
अपनों की वापसी के लिए गिड़गिड़ायेगा /
बहुत हुआ तू अब न अपने को यूँ तड़पाएगा//
पर्यटन को बना व्यवसाय /
मधुर वाणी व् शिष्टाचार से /
प्रेम के बीज बोता जा /
ये बोध है तुझे/
खैर लेने तेरी अब कोई नहीं आएगा /
पर सब भूल तू फिर से खुद को /
बंजर होने के दंश से बचाएगा /
अंगारों पे चलना तुझको आता  है /
देवस्थल कहलाना तुझको भाता है /
करदो अब ये शंखनाद /
कि न अब कोई/
पलायन के गीत गायेगा/
नई नई उपज से अब मेरा /
हर गांव लहलहाएगा  /
ए मेरे पहाड़ कब तक तू /
अपनों की वापसी के लिए गिड़गिड़ायेगा /
बहुत हुआ तू अब न अपने को यूँ तड़पाएगा//

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(द्वारिका प्रसाद चमोली दिल्ली में रहते हैं )

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