इतिहास लेखन जैसा ही है आंदोलन की बिखरी यादें समेटने का काम…….. राजेंद्र धस्माना

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(पूर्व समाचार संपादक डीडी न्यूज, पूर्व प्रधान संपादक संपूर्ण गांधी वांग्मय)
हम लोग तब मोतीबाग में रहते थे। एक दिन एक युवक आया और अपना परिचय दिया कि वह हरीश लखेड़ा है और भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता कोर्स कर रहा है। हरीश को तब पहली बार देखा था और तभी से वह परिवार का हिस्सा भी बन गया। दिल्ली आने के कुछ समय बाद उसने पत्रकार के रूप में अपनी पहचान कायम कर ली थी। हरीश को लेकर मुझे कुछ ऐसा अहसास हुुआ कि इस नौजवान में कुछ दमखम है।  ऐसा दमखम बाहर निकलने की कुछ ऐसी कोशिश जन्म ले रही है जो लहरों में जन्मजात रूप में होती है  और उन्हें चट्टानों से टकराने को भीतर ही भीतर उद्वेलित करती है। यह बात तब और भी स्पष्ट होने लगी थी जब उसमें एक ऐसी पीड़ा प्रकट होने लगी थी जो पहाड़ छोडऩे को लेकर उसके अंदर थी और दिल्ली आने पर साफ दिखने लगी थी।
उत्तराखंड के 1994 के आंदोलन के दौरान वह जनसत्ता में था। लगभग हर कार्यक्रम में उसकी मौजूदगी रहती थी। तब हरीश का एक नया रूप भी देखा। पत्रकारिता में होने के बावजूद उसने आंदोलन के दौरान कई कार्यक्रम भी कराए। आंदोलन को लेकर हरीश ने कविताएं भी लिखीं। मुजफ्फरनगर कांड को लेकर लिखी कविता और पोस्टर खूब सराहा गया।
हरीश की भीतरी अंत:चेतना को राज्य आंदोलन के दौरान भी देखा जो कुछ कर गुजरने को उसे रेंगते हुए आगे की ओर धकेल रही थी और इसी क्रम में वह बहुत कुछ करने के झंझावत में अपनी एक पहचान को आगे बढऩे के लिए उकसा रही थी।
अंतत: हरीश ने अपनी पहचान बना ली थी। राज्य आंदोलन की बिखरी यादों को समेटने का जो काम हरीश ने तटस्थ भाव से किया है वह इतिहास लेखन से कम नहीं है। यह काम अपने आप में भी एक इतिहास बनने जा रहा है।
(यह दुखद है कि किताब आने से पहले ही धस्माना जी हमारे बीच से चले गए. नमन)

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