आंदोलन की स्मृतियों को सहेजकर रखना इतिहास जैसा काम — जनरल मदन मोहन लखेड़ा (पूर्व राज्यपाल),

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उत्तराखंड आंदोलन: स्मृतियों का हिमालय। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है पत्रकार हरीश लखेड़ा ने इस पुस्तक में अपनी उन स्मृतियों को एक साथ रखने का प्रयास किया है जो उत्तराखंड आंदोलन से जुड़ी रही हैं। हमारे धर्म ग्रंथों का आधार भी श्रुति और स्मृति ही रहा है। यह मानव स्वभाव  है कि हम  पिछली बातों को याद रखते हैं। हमारी स्मृतियों में व्यक्ति, स्थान, घटनाएं सभी कुछ होती हैं लेकिन एक इतिहास बनने की घटनाओं को याद रखकर हम उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। अपने अतीत की स्मृतियों के प्रति आकर्षण सभी में होता है लेकिन समाज से जुड़ी स्मृतियों को सहेजकर रखना एक बड़ी बात है। हरीश लखेड़ा की पुस्तक इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे एक स्वस्फूर्त आंदोलन का इतिहास देशवासियों के सामने आएगा। यह अब एक इतिहास है और आशा है कि इस आंदोलन के अनुभवों से देश -दुनिया के लोग कुछ सीखेंगे ताकि भविष्य में मुजफ्फरनगर कांड जैसी दुखदाई घटनाएं न हों।
उन दिनों मैं भी दिल्ली में ही था। इसलिए उस दौर की स्मृतियां ताजी हो गई हैं। तब सेना नेतृत्व ने भी केंद्र सरकार को आगाह कर दिया गया था कि इस मामले को संवेदनशीलता के साथ सुलझाना चाहिए क्योंकि जवान भी नाराज थे।  हरीश लखेड़ा ने उत्तराखंड आंदोलन से जुड़ी स्मृतियों को पुस्तक का रूप देकर सराहनीय कार्य किया है, क्योंकि उत्तराखंड आंदोलन को लेकर लेखन के मामले में संभवत: अभी तक कोई खास काम नहीं हो पाया है। आशा है कि हरीश लखेड़ा की पुस्तक से भविष्य की पीढिय़ों को हमेशा यह जानकारी मिलती रहेगी कि यह अदभुद आंदोलन कैसे हुआ और कितना बलिदान दिया गया। पुस्तक इस जनांदोलन को विस्मृत नहीं होने देंगी।
शुभकामनाओं के साथ–
जनरल मदन मोहन लखेड़ा (पूर्व राज्यपाल),

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