अपनी माटी से जुड़े सवालों को भी मुख्यधारा का अंग बनाया—–व्योमेश चन्द्र जुगरान (वरिष्ठ पत्रकार)

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हरीश लखेड़ा दिल्ली में मुख्यधारा के पत्रकार रहे हैं। वे उन चंद साथियों में हैं जिन्होंने उत्तराखंड की अपनी माटी से जुड़े सवालों को भी समानांतर ढंग से मुख्यधारा का अंग बनाया और आंचलिक मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर पूरी गंभीरता से उठाया। वैसे भी तब दिल्ली के बड़े अखबारों में आंचलिक आग्रहों के लिए बहुत सीमित जगह हुआ करती थी। बावजूद इसके उन्होंने जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा और अमर उजाला में पहाड़ के लिए खूब स्पेस निकाला और खुलकर लिखा। उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान दिल्ली में एक सजग पत्रकार की भूमिका निभाई। तब उनसे हर उस जगह मुलाकात हो जाती जहां आंदोलन के सरोकार हुआ करते। भावुकता और आक्रोश जो तब हर पहाडिय़ों की रग में था, उस रौ में बहकर लखेड़ा सार्वजनिक मंचों से काफी कुछ कह जाते। कभी यह विचारणीय होता और कभी नहीं भी होता। पर इसमें उनका उग्र आंदोलनकारी स्वभाव ही उभरता। बहादुर शाह जफर मार्ग की प्रेस लेन में एक्सप्रेस बिल्डिंग और टाइम्स हाउस दोनों ही आसपास थे। मैं कभी-कभार नवभारत टाइम्स से उतर कर तब जनसत्ता संपादकीय कार्यालय में अरविंद उप्रेती और राजेश जोशी से मिलने जाया करता। वहीं हरीश लखेड़ा से भी शुरुआती मुलाकातें याद हैं। बहुत जल्द हम उत्तराखंड से संबंधित आयोजनों/बैठकों में मिलते चले गए और अच्छे याड़ी हो गए। आज भी यह मित्रता बनी हुई है। मैं इस पुस्तक के लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
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