अखबारों में उत्तराखंडियों की खबरें हरीश लखेड़ा के समय से ही दिखीं— हरिपाल रावत, अध्यक्ष उत्तराखंड महासभा, दिल्ली

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हमारे घर पर उन दिनों हिंदी का अखबार जनसत्ता भी आता था। बात 1992 की है। जनसत्ता के जमनापर पेज में हरीश लखेड़ा की खबरें पढऩे को मिलने लगीं। लखेड़ा नाम से यह तो जान लिया था कि ये पत्रकार उत्तराखंड मूल के ही हैं और उनकी खबरों से यह भी अहसास हो गया था कि वे उत्तराखंडियों के बारे में जमकर लिखते हैं। सच कहें तो अखबारों में उत्तराखंडियों की खबरें हरीश लखेड़ा के समय से ही दिखनी शुरू हुई। वैसे तब दिल्ली के समाचार पत्रों में उत्तराखंड मूल के ज्यादातर डेस्क में थे।  लोकल रिपोर्र्टिंग में पहाड़ के बहुत कम पत्रकार थे। जो भी थे वह उत्तराखंडियों को लेकर बहुत कम लिख पाते थे। इसके बाद 1994 के आंदोलन के दौरान उनसे मुलाकात भी हो गई और हम दोस्त भी बन गए। यह जानकर तब आश्चर्य हुआ था कि गणित में एम.एससी. करने के बाद भी वे पत्रकारिता में संघर्ष करने आ गए। यह जानकर और भी सुखद आश्चर्य हुआ कि पत्रकार होने के बावजूद वे किसी भी तरह का नशा नहीं करते हैं। पत्रकारिता में ऐसा बहुत कम है।
उस दौर में दिल्ली के अखबारों में उत्तराखंड समाज की खबरें बहुत बहुत कम छप पाती थीं। हरीश लखेड़ा के जनसत्ता में आने केे बाद उत्तराखंडी समाज की खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होने लगीं थी। उत्तराखंड आंदोलन की खबरें तो खूब छपीं। हरीश लखेड़ा उत्तराखंड आंदोलन के लगभग हर कार्यक्रम में शामिल होते थे। उन्होंने कई कार्यक्रम भी कराए। आंदोलन को लेकर कविताएं भी लिखीं ।
यह पुस्तक हम सभी के संघर्षों का दस्तावेज है और हमारी भावी पीढिय़ों को याद दिलाती रहेगी कि उत्तराखंड राज्य पाने के लिए कितना बलिदान देना पड़ा था। हरीश लखेड़ा की कलम हमेशा ऐसी ही चलती रहे इन उम्मीदों के साथ उनको मेरी शुभकामनाएं
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