कविता ———धरती और नील गगन ——— अनूप मिश्रा

0
295

एक दिन दुःखी होकर धरती ने कहा नील गगन से
देख अत्याचार मुझ पर तू भी तो दुःखी होता है मन मे
बस मुझ पर तू इतनी दया करना
अपने आगोश मे छुपे बादलों से कहना
कि तुम अब की बार जोरों से बरसना
ताकी हरा भरा हो जाये धरती का कोना
बोला नील गगन
तुझ पर यूँ ही अगर जंगल साफ होते जायेंगे
तो मेरे आगोश मे बादल मे कैसे बन पायेंगे
दया के बजाय तू अपने आपको इनसे बचा
लोगों को पेड़ लगाने का उपाय बता
बोली धरती लोग मुझ पर यूँ ही जुल्म करते जायेंगे
मेरे टुकड़ों को यूँ ही नीलाम करते जायेंगे
मेरी शरण मे रहने वाले पशु भी विलुप्त हो जायेंगे
धरती पर बोझ बनने वाले ही इंसान कहलायेंगे
ऐसे ही इंसान मुझे खोखला करते जाते हैं
और उसी के कारण मुझ पर भूकम्प आ जाते हैं
जब कई बेकसूर मारे जाते हैं
तो बदनाम धरती को ही कर जाते हैं
पर मत भूल एक दिन मै भी तेरे रंग मे मिल जाऊँगी
मै भी अपना अस्तित्व मिटा तेरे रंग मे समा जाऊँगी
हँस कर बोला नील गगन अरे पगली तू कैसे मुझ
मे मिल जायेगी
मै फिर भी विशाल गगन और तू धरती ही कहलायेगी
बोली धरती
गर यूँ ही लोग मुझे खोदते चले जायेंगे
तो मुझ पर असंख्य छिद्र हो जायेंगे
फिर मै पूरी तरह नीले सागर मे समा जाऊँगी
इसी तरह मै तेरे नीले रंग मे समा जाऊँगी
———————————–

——  अनूप मिश्रा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here