कैसे बचेगी धरती : पेरिस के जलवायु सम्मेलन के बाद भी ढाक के वही तीन पात

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नई दिल्ली। पेरिस के जलवायु सम्मेलन को दो साल हो चुके हैं।   तब तय किया गया था कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सभी देश धरती का तापमान अब दो डिग्री से ज्यादा नहीं बढऩे देंगे, लेकिन यह घोषणा कागजी साबित  होती दिख रही है।
यदि इस घोषणा पर अब भी ईमानदारी से अमल नहीं हुआ तो यह तय है कि दुनियाभर के ग्लेशियर भी पिघल जाएंगे। हमारा हिमालय भी बर्फ विहीन हो जाएगा। गंगा-यमुना भी सरस्वती की तरह घरती के पेट में गायब हो जाएंगी। तब पीने के लिए भी पानी नहीं मिलेगा। समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और ज्यादातर तटीय शहर डूब जाएंगे। केदारनाथ व चेन्नई जैसी त्रासदी होंगी। ग्रीन हाउस गैसें वायुमंडल की सुरक्षा कवच  ओजोन परत में हुए छेदों को और बड़ा कर देंगी। फिर तो इस दुनिया को कोई नहीं बचा पाएगा।

पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते पर 23 अप्रैल  2015 को 175 देशों के प्रतिनिधियों ने एक साथ एक मंच पर जलवायु परिवर्तन से संबंधित पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे । तय किया था कि  ये सभी देश ग्लोबल वार्मिग के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ेंगे।  इस समझौते को प्रभावी बनाने के लिए 55 प्रतिशत वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार कम से कम 55 देशों को समझौते के क्रियान्वयन की प्रक्रिया हर हाल में पूरी करनी थी।  लेकिन मामला  कागजों तक रह गया है।
दरअसल, ग्रीनहाउस प्रभाव एक ऐसी प्राकृतिक क्रिया है जो धरती को इतना गर्म कर रही है कि इंसान का जीना मुश्किल होता जा रहा है।  नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बनडाई ऑक्साइड और दूसरी गैसों की अदृश्य चादर ने धरती को घेर रखा है और वह सूरज की गर्मी को सोख कर रखता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि धरती को गर्म होने से रोका नहीं गया तो इंसान का जीना मुश्किल हो जाएगा।
इसलिए हाल में पेरिस में हुए सम्मेलन में धरती के तापमान को दो डिग्री से ज्यादा नहीं बढऩे देने पर आम सहमति बन गयी।
दरअसल, विकास की अंधाधुंध दौड के कारण आज  कार्बनडाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। आबादी बढऩे से जंगल घट रहे हैं। कोयला जलाना या तेल और पेट्रोल से गाड़ी चलाना, यह सब कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में योगदान दे रहे हैं। वास्तव में सीमा से ज्यादा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2014 में 53 अरब टन के बराबर ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन हुआ। सन 1970 से 2000 के बीच के 1.3 प्रतिशत के मुकाबले 2000 के बाद के वर्षों में सालाना वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत रही है। हर साल निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा हिस्सा यानि 35 प्रतिशत बिजली के उत्पादन की प्रक्रिया में पैदा होता है।  24 प्रतिशत के साथ कृषि और जंगलों का कटना दूसरे नंबर पर है।  भारी उद्योग 21 प्रतिशत तथा परिवहन क्षेत्र 14 प्रतिशत  ग्रीनहाउस गैसों के लिए जिम्मेदार हैं। संयुक्त राष्ट्र की विज्ञान संस्था का कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी नहीं की गई तो 2100 तक वैश्विक तापमान 3.7 से 4.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। इसलिए दुनिया अब धरती का तापमान दो डिग्री सेल्सियस की सीमा में रहने के लिए प्रयासरत हो गई है।
पेरिस में संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन में 150 देशों के राज्य व सरकार प्रमुखों ने  सहमति जताई थी कि अब ग्लोबल वॉर्मिंग की गति को औद्योगिक क्रांति के पहले के स्तर से 2 डिग्री ज्यादा पर रोक देंगे। यदि ये देश अपने घोषित योगदान को 2030 तक लागू करते हैं और उसके बाद भी प्रयास जारी रखते हैं तो दुनिया को बचाया जा सकेगा। अन्यथा यह ग्रह भी मंगल की तरह वीरान हो जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2100 तक तापमान में औद्योगीकरण से पहले के तापमान के मुकाबले 2.7 डिग्री की बढ़ोतरी हुई है. वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर दो डिग्री से ज़्यादा तापमान में बढ़ोतरी होती है तो इससे जलवायु में बड़े और ख़तरनाक परिवर्तन होगें जो गऱीबों पर ख़ास तौर पर बुरा असर डालेंगे..धरती की सतह पर पिछले 100 साल में औसत तापमान 0.85 सेल्सियस की दर से बढ़ चुका है. 14 सबसे गर्म सालों में से 13 साल 21 वीं सदी में रिकॉर्ड किए गए हैं  वैज्ञानिकों का मानना है कि उद्योग-धंधों और खेती से निकलने वाले गैस प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव को बढ़ा देते हैं. प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव सूर्य से मिलने वाली कुछ ऊर्जा को धरती के वातावरण में कैद कर के रखती है.

जीवाश्म ईंधनों जैसे कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस को जलाने जैसी मानवीय गतिविधियों से कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) की मात्रा बढ़ रही है. कार्बन डाई ऑक्साइड ग्लोबल वार्मिंग पैदा करने वाली एक प्रमुख गैस है.कार्बन का अवशोषण करने वाले जंगल भी काटे जा रहे हैं.  अधिक तापमान, मौसम की मार, बढ़ता समुद्री जल स्तर, ये सब धरती का तापमान बढ़ने के परिणाम हैं, इन सबका दुनिया पर काफ़ी गंभीर असर हो सकता है. 1900 से अब तक दुनिया में समुद्र का जल स्तर औसतन 19 सेमी बढ़ा है, पिछले कुछ दशकों में समुद्री जलस्तर के बढ़ने की गति तेज़ हो गई है, इसकी वजह से कम ऊँचाई पर बसे टापुओं और कई देशों के लिए ख़तरा पैदा हो गया है. ध्रुवीय बर्फ़ का पिघलना इस वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारण है.तेज़ तापमान की वजह से आर्कटिक सागर की बर्फ़ सिमट रही है, हालाँकि समुद्री जल के स्तर के बढ़ने में इसका योगदान मामूली है. अगर 1980 के दशक के शुरुआती दौर के औसत स्तर से तुलना की जाए तो ब्रिटन से 10 गुणा बड़े क्षेत्र के बराबर समुद्री बर्फ़ अब तक पिघल चुकी है. बदलावों की वजह से पानी की कमी, फ़ूड प्रोडक्शन पर असर पड़ सकता है बाढ़. इससे बाढ़, सूखे, लू और आंधी की वजह से हताहतों की संख्या बढ़ सकती है. दुनिया संकट में आ सकती है।

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