कविता —- नदी और झरने कुछ कह रहे हैं तुमसे —– उमा पांडे

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 ……लौट भी आओ ना पहाड़ /
देखो ना /
 ये नदी और झरने कुछ कह रहे हैं तुमसे  /
सुनो तो सही इनकी प्यारी बातें  /
जैसे कि पुकार रही हैं  तुमको /
कि अब तो लौट आओ पहाड़ /
 ………… देखो वो नीले आकाश में /
 चमक रहे हैं सितारे बस तुम्हारे लिए /
ये बुरांश, ग्वीराल भी तो खिले हैं तुम्हारे लिए   /
अपने मन का दरवाजा तो खोलो जरा /
मैं जानती हूं /
पहाड़ की याद में /
अपने आंसू रोक दिए तुमने /
ये दर्द दबा दिया तुमने /
झूठी मुस्कान को चेहरे पर सजा लिया है तुमने /
बस एक बार लौट आओ ना /
 ……….. देखो ना कितनी मतलबी हो गई है शहरों की दुनिया /
अपनी धुन में मस्त हैं सभी /
और  तुम हो कि डरते हो इस दुनिया से /
उनको तो बस नाटक नजर आती है दूसरों की बेबसी /
आओ ना पहाड़ /
 ………….. यहां तुम अपने मन की बात कहना  फूलों से /
इन  सितारों से /
इक कलम से पन्नों पर लिख देना /
मन में छुपे पिटारों से बाहर निकल आएगा दुख /
फिर दुख तुम्हें बनाएगा पहाड़ जैसा  मजबूत  /
तुम पार करो इस तूफां को  /
फिर देखो सूरज उगेगा  /
तुम लौट तो आओ पहाड़।  /
…………………………………………………….


( काशीपुर  निवासी उमा पांडे ने यह कविता  विशेष तौर पर हिमालयी लोग के लिए लिखी है। हिंदी में एम.ए. उमा पांडे को साहित्य पढऩे का शौक है। वे कविताएं लिखती हैं। उमा पांडे  जी का आभार)

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