कनाडा में रह रहे पहली गढ़वाली फिल्म के निर्माता पारासर गौड़ उत्तराखंड राज्य के हालातों से निराश हैं। वे कहते हैं कि इससे तो बेहतर था कि उत्तराखंड राज्य ही न बनता। हम उत्तर प्रदेश में ही रहते। तब शायद ज्यादा विकास होता, हमारी सोच तो बरकरार रहती। यह उत्तराखंड तो पुरानी झजुली  पर नई थेगली जैसा है। हाल में वे उत्तराखंड गए थे वहां अपने गांव में पुश्तैनी मकान की मरम्मत कराई। दिल्ली आकर वरिष्ठ पत्रकार हरीश लखेड़ा से उत्तराखंड को लेकर लंबी बातचीत की। पेश है बातचीत———-

प्र- आप उत्तराखंड से लौटे हैं, क्या शहीदों के सपनों का उत्तराखंड बन पाया है।
उ- जिस उद्देश्य को लेकर यह राज्य बना था वह पूरा होता नहीं दिख रहा है। जो बलिदान दिया वह कोई काम नहीं आया। शहादत किसी ने दी और सत्ता में काबिज कोई और हो गए और वे बलिदान देने वालों को ही भूल गए।

प्र- आपको वहां क्या-क्या कमियां दिखीं?
उ- यह दुर्भाग्य है कि जिस बैनर तले राज आंदोलन हुआ वह संगठन उत्तराखंड क्रांतिदल सत्ता में नहीं आ पाया। यदि वह सत्ता में आता तो शायद बात ही कुछ और होती। नई सोच होती, नया उत्तराखंड होता। कांग्रेस और भाजपा ने तो पुराने ढर्रे पर ही राज्य को चलाया। उत्तर  प्रदेश की कॉपी बन गया है।

प्र-लंबे प्रवास के बाद आप उत्तराखंड से लौटे हैं, वहां के समाज में क्या बदलाव दिखा।
उ- वहां बच्चे-बच्चे के हाथ में भी मोबाइल हैं। हर हाथ को काम मिल गया है। वह मोबाइल पर लगा है। वहां भी शहर का कल्चर पहुंच गया है। गांव का कल्चर खत्म सा हो गया है।  पहले  शादी-ब्याह में सामूहिकता थी, अब समाज में यह भावना खत्म हो गई है। सडक़ें तो आ गई लेकिन अपनत्व खत्म हो गया है। ‘ मैं’ का प्रभाव बढ़ गया है। पहले शहर से आए व्यक्ति को सभी मिलने आते थे, लौटते समय सभी छोडऩे आते थे लेकिन अब कोई पूछता तक नहीं है। परंपरागत मकान खत्म हो रहे हैं सीमेंट के जंगल उग रहे हैं। खेती भी खत्म हो गई है। खषत बर्बाद हो गए हैं। पानी के स्रोत भी सूख रहे हैं।
वहां दारू बहुत ज्यादा पीने लगे हैं। कई पूर्व फौजी भी शराब बेच रहे हैं। शराब ने पहाड़ को बर्बाद कर दिया है।

प्र- दिल्ली के उत्तराखंडी समाज को लेकर क्या कहेंगे।
उ- यहां नेतागिरी ज्यादा है। मंचों के माध्यम से नेतागिरी करते हैं। यहां हर गली में उत्तराखंडी नेता हैं। हर कोई खुद को प्रधानमंत्री का करीबी बताता रहता है। बात यह है कि जहां राजनीति करनी चाहिए वहां वे नगण्य हैं। राजनीतिक दलों में उनकी पूछ नहीं है। दिल्ली में बिहार के लोगों को देखिए कितने सांसद व विधायक हैं जबकि उत्तराखंडी कहीं नहीं हैं। यहां लोग अपनों की मदद नहीं करते हैं वे अपनों को बोझ समझते हैं। यहां एक -दूसरे की टांग खींचना लोगों का पहला गुण है। हालांकि सभी ऐसे नहीं हैं। कई मिलजुल कर काम कर रहे हैं।
दिल्ली में यह तो है कि लोगों ने तरक्की बहुत की है। पहली पीढ़ी ने बहुत कष्ट सहे लेकिन उनके बच्चे आगे बढ़ते चले गए।  हमारे समाज ने शिक्षा को स्किल के तौर पर लिया और आगे बढ़ते चले गए।

प्र- पहाड़ से पलायन कैसे रुकेगा?
उ- यह तो प्रकृति का नियम है। पलायन से ही हमें मौके मिले । हम उच्च पदों तक पहुंचे।  लेकिन हमें अपनी माटी से जुड़े रहना चाहिए।

प्र- उत्तराखंडी सिनेमा को लेकर क्या सोचते हैं, यह कहां तक पहुंचा है।
उ-  अब फिल्में नहीं बल्कि एलबम ज्यादा बन रहे हैं। उनकी क्यालिटी किसी भी मामले में ठीक नहीं है।  एलबम में बस स कर चखुलिया डांस कर रहे हैं। न संगीत है न भाव, न गीत।  संगीत की विधा खत्म सी हो गई है।  नेगी जी ने शुरू में बेहतर काम किया लेकिन बाद में वे प्रोफेशनल हो गए। छह साल से उनकी कोई एलबम भी नहीं आई है।  फिल्मों का भविष्य भी ठीक नहीं है। अब फिल्मों में जो पैसा लग रहा है वही डायरक्टर, हीरो, लेखक सभी कुछ बन जा रहा है।  इसलिए तो उसे अपनी बनाई फिल्म को खुद ही देखना पड़ रहा है।

प्र- कनाडा में उत्तराखंडी समाज के बारे में बताइए।
उ- टोरंटो में लगभग 1500 उत्तराखंडी हैं। वहां उनकी संस्था भी है। उत्तराखंड कल्याण ऐसाशिएन। पहले अमरीका में भी दो संस्थाएं बनी थीं। हम लोग दीवाली होली में कार्यक्रम करते हैं। उत्तराखंड के कलाकारों को भी बुलाते हैं। गढ़वाली-कुमाउंनी भी बोलते हैं। मेरे परिवार में मेरे पौत्र के साथ तय है कि दादा-दादी (हम) गढ़वाली में बोलेंगे। उसके पिता अंग्रेजी में और उसकी मां हिंदी में। इससे वह सभी भाषाएं सीख रहा है।
प्र- हिमालयीलोग पोर्टल को लेकर क्या कहना चाहेंगे।
उ- मैं उसे सात समुंदर पार पढ़ता हूं। यह बहुत अच्छा है। इसका आने वाला कल बहुत ही अच्छा है।  इसकी कथावस्तु, सामाग्री, प्रजंटेशन, सभी कुछ बहुत अचछा है।  कई लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। जैसे कि पदमादत्त नंबूरी  और नंदनी बड़थ्वाल। हिमालयीलोग पोर्टल लोगों को अपनी संस्कृति के लिए जागरूुक कर रहा है, आपको साधुवाद।
———————-

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here