हर क्षेत्र में आगे हैं उत्तराखंड की महिलाएं ——- अनुराधा पांडे

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उत्तराखंड की महिलाए हमेशा से ही जीवन के हर क्षेत्र में आगे रही हैं।  पेड़ों को बचाने के लिए उन पर चिपक कर दुनिया को अदभुद आंदोलन देने वाली गौरा देवी भी उत्तराखंड से थीं। उत्तरखंड के लगभग हर आंदोलन में वे आगे रही हैं।  मुगल सेना के नाक काटने वाली महान रानी कर्णावती का नाम भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। उत्तराखंड आंदोलन में तो महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है।
पहाड़ की महिलाएं कभी भी अबला नहीं रही हैं। वे सबला हैं। वे पढ़ लिख कर देश-दुनिया में अपना व अपने समाज का नाम रोशन कर रही हैं। उनके हाथों में मोबाइल फोन है और सीमा पर तैनात अथवा शहरों में रह रहे पति से सीधे बात कर लेती हैं। वह समय बीत गया है जब उनका लगभग पूरा ही आंसुओं के साथ बीत जाता था। जीवन फौज अथवा शहरों में रोजगार की तलाश में गये पति के विरह में  कटता था।  तमाम उम्र बच्चों व बूढ़े सास-ससुर की सेवा में खप जाता था। वे खेतों से लेकर चूल्हे में खुद को झोंक देती रही। लेकिन अब पहाड़ी महिलाएं नये रूप में आ चुकी हैं। स्कूलों में ज्यादातर टीचर महिलाएं ही हैं। डाक्टर, इंजीनियर से लेकर पुलिस में भी उन्हें देखा जा सकता है। उद्योग धंधों में भी हाथ आजमा रही हैं।
उत्तराखंड की महिलाओं ने हमेशा ही पति से एक कदम आगे बढक़र परिवार की सेवा की है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद वे पुरुषों की तुलना में अधिक परिश्रमी, संघर्षशील, कर्मठ व जुझारू रही हैं। खेतों में काम करने से लेकर कई मील दूर से पानी ढोना हो या घास काट कर लाना।  वे मेहनत करने से कभी भी दूर नहीं भागी।  वे आज भी पहाड़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उत्तराखंड आंदोलन में भी उनकी अग्रणी भूमिका रही हैं। मुजफ्फरनगर कांड में तो महिलाएं भारतीय के इतिहास के काले पन्नों की गवाह रही हैं। उत्तराखंड में तीलू रौतेली से लेकर रैणी की गौरा देवी, बागेश्वर की बिश्नी शाह, थलीसैण की टिंचरी माई यानी इच्छा गिरि माई, पिथौरागढ़ की तुलसी देवी, टिहरी की विनय लक्ष्मी सुमन, पौड़ी की रेवती उनियाल, धारचूला की गंगोत्री गब्र्याल जैसी सैकड़ों महिलाएं हैं जिन्होंने समाज सेवा के लिए अपना जीवन लगा दिया। उत्तराखंडी समाज की यह विशेषता रही है कि यहां महिलाओं में परदा प्रथा नहीं है। उन्हें हमेशा ही समाज में पुरूष के समान दर्जा मिला है। अब आईएएस, आईपीएस से लेकर समाज के हर क्षेत्र में उत्तराखंड की महिलाएं अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज करा चुकी हैं। एवरेस्ट विजेता बछेंद्रीपाल हो या अब विश्व सुंदरी मनस्वी ममगांई, हर क्षेत्र में  उत्तराखंड की महिलाएं दिख रही हैं।
दूसरे समाजों की तुलना में उत्तराखंड में महिलाओं के प्रति अत्याचार बहुत कम हैं। लेकिन अब चिंता की बात यह है कि वहां भी दूसरे समाजों की बीमारियों पहुंचने लगी हैं। दहेज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां भी उपभोक्तावादी संस्कृति तेजी से फैल रही है। 90के दशक में कुछ लड़कियां मिस यूनिवर्स और मिस वल्र्ड चुनी गई थीं, उसके बाद तो भारत में लड़कियों में विश्व सुंदरियों बनने की होड़ शुरू  हो गई। यह एक अजीब तरह की क्रांति थी, जिसमें महिलाओं में अपने शरीर को सुंदर बनाए रखने की जागरुकता तो पैदा हुई, लेकिन उससे ज्यादा इस तरह की प्रतियोगितओं में हिस्सा लेने की भावना ज्यादा प्रबल हुई। दूसरे शब्दों में कहें तो वह घटनाएं उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा देने वाली साबित हुई।
( अनुराधा पांडे —राजकीय इंटर कॉलेज, कोटाबाग नैनीताल में अंग्रेजी की प्राध्यापक हैं।)

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