(उत्तराखंड के गठन   हुए 17  साल हो चुके हैं।  राज्य आंदोलन में अग्रणी रहे आईएएस अफसर दिवंगत बहादुर राम टमटा कैसा राज्य चाहते थे, इस बारे में उनके विचार दे रहे हैं। वे चाहते थे कि  उत्तराखंड के  बच्चे अंग्रेजी में कमजोर न रहें।  दिल्ली नगर निगम के आयुक्त रह चुके टमटा जी भले ही आज सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यादें हमारे बीच हैं, टमटा जी देश में लगी इमरजेेंसी के दौरान दिल्ली नगर निगम के कमिश्नर थे। आईएएस अफसर होने के बावजूद वे हमेशा ही आम आदमी जैसे रहे। यहां तक कि उन्हें डीटीसी की बसों में सफर करते देखा  जा सकता था। सज्जन और सरल स्वभाव के टमटा जी उत्तराखंड आंदोलन में भी सक्रि य रहे। टमटा जी का मानना था कि उत्तराखंड को अपनी शिक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा।  यह लेख उन्होंने ‘हिमनाद पत्रिका के लिए  2001 में लिखा था, उसे साभार दे रहे हैं———-)

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मेरे सपनों का उत्तराखंड
——– बहादुर राम टमटा

——यह सर्वविदित है कि ऋषि-मुनियों की संतान होने तथा रमणीय प्रकृति की गोद में खेलने वाले, यहां के बच्चों का बौद्धिक स्तर बहुत उच्च कोटि का है किन्तु उचित शिक्षा-दीक्षा के अभाव में शैशवकाल ही से घरेलू नौकरी या ढाबों, होटलों में बर्तन साफ करने के लिए पलायन मैदानों को हो जाता है। उन्हें अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान नहीं होता। इस ओर ध्यान देना होगा ताकि इस आधुनिकता की दौड़ में युवा पीढ़ी पिछड़ न जाए।————–

उत्तराखंड राज्य का सपना साकार हो चुका है। इससे लोगों में आशा की किरण है कि शायद उनके दिन फिरेंगे। इस स्वप्न को साकार करने के लिए उन्होंने ऐतिहासिक संघर्ष किया। हम उत्तराखंडियों को गर्व है कि हम सचरित्र, ईमानदार व वीरों की संतान हैं। मेरा सपना है कि इस नवगठित राज्य के लोग जाति, धर्म, मैदानी, पर्वतीय आदि तमाम आपसी मतभेद भुलाकर भ्रष्टाचार से मुक्त स्वच्छ, पारदर्शी, प्रशासन से सर्वांगीण विकास करके शहीदों के स्वप्नों के अनुकूल एक आदर्श राज्य बनाने में सफल होंगे।
वैसे भी संसार भर में पर्वतीय प्रदेशों के लोग प्राय: सरल प्रकृति के सच्चे-ईमानदार, स्वाभिमानी, निडर व हठीले स्वभाव के होते हैं। वे बहुत अमीर नहीं होते, पर बहुत गरीब भी नहीं होते। पैसे के लिए वे अपना ईमान नहीं बेचते और न झूठ, दगाबाजी, लूट, डकैती, खून-खराबी का सहारा लेते हैं। उत्तरांचल के लोगों पर भी यह बात लागू होती है किन्तु विश्व की सबसे बड़ी पर्वत श्रेणी हिमालय ने यह रंग भी गहरा कर दिया है तथा इसके साथ आध्यात्मिकता तथा दार्शनिक तत्व और जुड़ गए थे, किन्तु आजादी के इन 50 वर्षों में हमारी संस्कृति अस्मिता व आदर्श सब कुछ चला गया।
भ्रष्टाचार व कानून — नए उत्तरांचल राज्य में सदियों पुराने स्थाई जीवन मूल्यों का पुनस्र्थापन ही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सर्वप्रथम हमें भ्रष्टाचार मिटाना होगा। यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।
विकास – इस नव उदित राज्य को अपनी शिक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा। यह सर्वविदित है कि ऋषि-मुनियों की संतान होने तथा रमणीय प्रकृति की गोद में खेलने वाले, यहां के बच्चों का बौद्धिक स्तर बहुत उच्च कोटि का है किन्तु उचित शिक्षा-दीक्षा के अभाव में शैशवकाल ही से घरेलू नौकरी या ढाबों, होटलों में बर्तन साफ करने के लिए पलायन मैदानों को हो जाता है। उन्हें अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान नहीं होता। इस ओर ध्यान देना होगा ताकि इस आधुनिकता की दौड़ में युवा पीढ़ी पिछड़ न जाए।
संविधान द्वारा पारित प्रस्ताव, हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा होगी, के संदेश से महान विद्वान, शिक्षाविद् तत्कालीन शिक्षामंत्री उत्तर प्रदेश डॉ. संपर्णानंद ने अंग्रेजी शिक्षा की अनिवार्यता को उत्तर प्रदेश में समाप्त कर दिया जो उस समय उचित लगा। दुर्भाग्य से न तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू स्वयं हिन्दी जानते थे और न ही महात्मा गांधी व सुभाषचंद्र बोस की तरह इसका महत्व ही समझते थे। अंग्रेजी भाषा के प्रति उनके मोह ने, उन्हें संविधान की सर्वसम्मति से पारित इस धारा को लागू करने से रोक दिया और हिन्दी सरकारी कागजों में औपचारिक रूप से राष्ट्रभाषा न बन सकी। चूंकि लोगों को नेहरू के इस संबंध में विचार मालूम थे इसलिए खुलेआम अहिन्दी क्षेत्रों विशेष रूप से दक्षिण भारत में हिन्दी के खिलाफ आंदोलन पड़ा, जिसमें नेहरू की मूक सहमति थी। इस प्रकार हिन्दी केवल हिन्दी प्रदेशों की भाषा रही। फलस्वरूप अन्य प्रदेशों में अंग्रेजी का वर्चस्व रहा और उत्तर प्रदेश इस नीति का सबसे बड़ा शिकार बना। आजादी के समय केंद्रीय सेवाओं की परीक्षा में उत्तर प्रदेश का प्रतिशत 50 से ऊपर रहता था जो कालांतर में घटकर पांच प्रतिशत रह गया। दूसरी तरफ अंग्रेजी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगी, क्योंकि देश-विदेश तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियां सभी जगह इसका बोलबाला रहा, यहां तक कि हिन्दी के प्रबल समर्थक मंत्री भी अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में ही भेजते रहे। आज लोगों का सरकारी शिक्षा में विश्वास उठ चुका है और एक साधारण मजदूर भी स्वयं भूखा रहकर भी अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल में भेज रहा है। फलस्वरूप आज हर शहर, गली, कूचों में पब्लिक स्कूलों की भरमार है और सबसे बड़ा उद्योग उभर कर आया है।
नए उत्तरांचल राज्य में, आज के व्यावहारिक पक्ष के संदर्भ में प्रत्येक प्राइमरी स्कूल को शिशु मंदिरों की तरह के स्कूलों में परिवर्तित कर दिया जाना चाहिए और अंग्रेजी की शिक्षा अनिवार्य रूप से नर्सरी के स्तर से आरंभ कर दी जानी चाहिए।
इसी तरह हमें खेलकूद के प्रति ध्यान देना होगा। बचेंद्री पाल ‘एवरेस्ट’ पर चढऩे में इसलिए सफल हुई कि वह बचपन से घास लकड़ी का भारी बोझ चढ़ाई में अपने गांव उत्तरकाशी में ले जाती थी। सीमांत पर बसे जनजाति के युवा बचपन से बहुत ऊंचाई पर दौडऩे भागने के अभ्यस्त हैं इन्हीं चीन की तरह से 4 या 5 वर्ष से दौड़, टेबुल टेनिस जिमनास्ट में प्रशिक्षण किया जाए तो वे आगे बढ़ सकते हैं।
नक्स व अन्य उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा और स्विट्जरलैंड की तरह घडिय़ा व अन्य सूक्ष्म यंत्र भी बनाए जा सकते हैं, जो देश के अन्य हिस्सों में बनने वाले इलेक्ट्रिक उपकरणों से सस्ते होंगे।
पृथक राज्य उत्तरांचल में हिमालय के वनों का प्राचीन नैसर्गिक स्वरूप पुनस्र्थापित किया जाना चाहिए। क्रमानुसार घास, छोटे पौधे, झाडिय़ों वेलें फिर चौड़ी पत्ते वाले बांज, बुरांश, काफल, भीमल लगाए जाएं। स्थानों पर कैल देवदार व अंत में भोजपत्र लगाने चाहिए। बुग्यालों में जड़ी-बूटियां लगाई जाएंगी।
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