काफल पाको : औषधीयगुण से भरपूर —-नन्दनी बड़थ्वाल

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काफल ! जी हां यह उत्तराखंड समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र का प्रसिद्ध फल है। यह हिमालयी  क्षेत्र में पाया जाने वाला मध्यम ऊंचाई वाला पौधा है,  जिसका वैज्ञानिक नाम मैरिका नागी है। यह मैरिटेसि परिवार का पौधा है जो लगभग पूरे भारत में पाया जाता है। उत्तराखंड में इसे काफल के नाम से जाना जाता है। संस्कृत में इसे कटफल और अंग्रेजी में इसे बे बैरी कहा जाता है। यह एक सदाबहार पौधा है।  यह एक औषधीय पौधा है जो भारत,चीन, पाकिस्तान और मलाया महाद्वीप में भी पाया जाता है। भारत में उत्तराखंड के अलावा यह उत्तरी- पूर्वी भारत, हिमाचल प्रदेश, बंगाल में भी पाया जाता है। हिंदी व मराठी तथा गुजराती में कैफल या कच्छल,  अरबी में अंजरी कण्डुल तथा फारसी में दर्शी स्वान कहते हैं।
भारत के हिमालयी क्षेत्र में पाया जाने वाला पेड़ 12-15 मीटर ऊँचा होता है। पत्ते नुकीले 9 सेंटी मीटर लम्बे 3 सेंटी मीटर  चौड़े तथा ऊपर से गहरे हरे तथा नीचे से हल्के पीले रंग के रहतेे हैं। छाल हल्की भूरी रंग की खुरदरी होती है। काफल में नर और मादा पौधा अलग अलग रहता है और फल सिर्फ मादा पौधे पर ही आते हैं। यह देखा गया है  इस पौधे पर फूल 15 फरवरी तक आने लगते हैं जो कि 15 अप्रैल तक देखे जा सकते हैं। फल मई के शुरू में ही आ जाते हैं जो कि मई में ही खत्म भी हो जाते हैं। फल खट्टा मीठा और गुलाबी लाल रंग का होता है। फल ज्यादा देर तक नहीं रखा जा सकता है। इसलिए स्थानीय लोग इसे तोडऩे वाले दिन ही खा लेते हैं। इसकी जीवनावधि 2 से 3 दिन ही होती है इसलिए अगर इसका मूल्य संवर्धन ना किया जाए तो यह फल बाजार तक नहीं ले जाया जा सकता। उत्तराखंड में मई माह में अक्सर यह फल सडक़ पर बिकता हुआ देखा जाता है । कुछ स्थानीय लोगों और गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से इसका रस निकाला जा रहा है जिससे इसकी जीवनवधि  बढ़ जाती है और अच्छे दाम पर साल भर बेचा जा सकता है।
काफल एक औषधीय पौधा है। इसके फल से रिफ्रेशिंग ड्रिंक बनाए जाते हैं जो की ना सिर्फ भारत वर्ष में बल्कि चीन, जापान तथा यूरोप में भी प्रचलित हैं।
काफल की छाल में कुछ औषधीय गुण पाये जाते हैं। यह ठण्डी होती है जो बुखार खांसी तथा गले का संक्रमण दूर करती है।  यह वात तथा कफ वकारों को दूर करती है। इसके आलावा बुखार अस्थमा, बबासीर  तथा खून की कमी, अल्सर आदि के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है। इसके फूल से बनाया गया तेल कान दर्द, शक्तिवर्धक, दस्त तथा लकवा के इलाज में भी इस्तेमाल किया जाता है। काफल के फल में पाया जाने वाला रस इस बात पर निर्भर करता है उस साल कितनी बारिश हुई । बारिश अच्छी हुई तो फल में रस भी भरपूर रहता है। अगर अच्छी बारिश हो तो लगभग 40 प्रतिशत जूस निकल आता है जिसका रंग गहरा लाल रहता है। फल में खाए जाना वाला हिस्सा इसका ऊपरी छाल है जो कि 75.4 प्रतिशत रहती है। इसके अन्दर 80.6 प्रतिशत नमी रहती है।
काफल हिमालय क्षेत्र की संस्कृति से जुड़ा हुआ फल है । उत्तराखंड में ‘काफल पाको मिल नी चाखो’ जैसे लोककथा भी है। इस पर रंगीलो कुमाऊं काफल खेजा कुमांउनी गीत बहुत मशहूर है। बेडू पाको बारह मासा नरैन काफल पाको चैता मेरी छैला एक मशहूर कुमाउंनी  गीत है। नेपाल में रेली खोला वर्ग काफल पक्यो लहर, काफल गेड़ी कुतुकै, काफल पक्यो होला बनमा जैसे कई गीत काफल को संबोधित करते हुए  गाये गए हैं। इतना ही नहीं बेतुल मिखत्यार ने एक फिल्म का नाम ही काफल रखा था जो की एक बाल फिल्म गढ़वाल के दो छोटे बच्चों पर अधारित थी। इसमें शायद निर्देशक यह दिखाने की कोशिश कर रहा है जैसे काफल पहाड़ में अपना अस्तित्व बनाए हुए है वैसे ही फिल्म में दोनों बच्चे भी बिना बाप के, जो कि शहर चला गया रोजी रोटी कमाने के लिए, बच्चे काफल की तरह रोज की जि़न्दगी से लड़ते हैं।
यह भी कहा जाता है जब भगवान राम जी वनवास पर थे सीता माता ने यह फल जंगल में चखा तब से इसका नाम गौरी फल पड़ गया।
एक कविता की कुछ पंक्तियां याद आती हैं
ए मेरे दोस्त पक गया काफल आजा जंगल चले।
हरी हो गयी बांज की पत्तियां आजा जंगल चले।
आ गया पानी बांज की जड़ में आजा प्यास बुझा लें आजा जंगल चलें (वर्मा) ।
नेपाल में एक लोक गाथा है जिसमे एक भाई बहन की कहानी है। भाई फौज की नौकरी करने जाता है और  अपनी बहन से वादा करता है की वह हर साल आएगा और दोनों एक साथ काफल खाएंगे । बहन  हर साल काफल पकने पर भाई को खत लिखती है काफल पक्यो पर भाई का कोई जबाब नही आता। जब बहन की मौत हो जाती है वह एक चिडिय़ा बन कर हर साल सब को सुनाती है काफल पक्यो…..
काफल जो पहाड़ की संस्कृति है पर ना तो इसके मूल्य बृद्धि पर कोई ध्यान दिया जा रहा ना ही कोई वैज्ञानिक तरीके से इसकी पैकिंग , रस निकलने आदी पर कोई सरकार की तरफ से कार्यक्रम चलाया जा रहा। अगर इसे एक विधिवत तरीके से इसका दोहन किया जाए तो ना सिर्फ पहाड़ की आय बढ़ेगी बल्कि पहाड़ का नाम पूरी दुनिया में काफल के नाम से चल सकता है।
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( फोरेस्ट्री में एम. एस-सी. नंदनी बड़थ्वाल उत्तराखंड की वनस्पितियों पर लगातार हिमालयीलोग के लिए लिख रही हैं। वे बहुत अच्छी कविताएं भी लिखती हैं। नंदनी जी का आभार)

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