वरिष्ठ कथाकार डा. हरिसुमन बिष्ट का नया उपन्यास – ‘भीतर कई एकांत ’

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हमारे बुजुर्ग जीवन की अंतिम बेला में किस कदर अकेले पड़ गए हैं, किस तरह से अकेलेपन में जी रहे हैं, किस तरह से स्मृतियों के सहारे  जीवन ढो रहे हैं, यह सब समझना है तो वरिष्ठ कथाकार डा. हरिसुमन बिष्ट  के नये उपन्यास – ‘भीतर कई एकांत ’ को अवश्य पढि़ए।  

डा. हरिसुमन बिष्ट दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी के सचिव हैं। इससे पहले वे दिल्ली हिंदी अकादमी के सचिव रहे हैं।

——-उनके इस उपन्यास को लेकर दो समीक्षाएं भी दे रहे हैं।——–

अकेलेपन से जूझने की विडम्बना

   —–सुषमा जुगरान ध्यानी

मौजूदा दौर की सबसे बड़ी त्रासदी और विरोधाभास अगर कुछ है तो यही कि चारों ओर मनुष्यों की बढ़ती भीड़ के बावजूद हर कोई अपने भीतर के एकाकीपन से बेतहाशा जूझ रहा है। खासकर उम्र के उत्तरार्ध में जी रही बुजुर्ग पीढ़ी तो अपने ही घर-परिवार और समाज के बीच किसी अजनबी की मानिंद ट्रीट होने के लिए शापित होती चली जा रही है। चाहे महानगर हों या छोटे शहर कस्बे या कि गांव-देहात, हर जगह इंसान जिंदगी के बियावान में अपने भीतर एक अव्यक्त अकेलापन ढोते हुए जीने के लिए अभिशप्त है और उसी में अपने होने न होने की राहतलाश रहा है। इस संघर्ष में जहां उसे एक पल को अपने जीने की राह सुगम दिखाई देती है, वहीं दूसरे क्षण अपने ही अंदर मौजूद निराशा का घटाटोप भटकाकर जीवन के उद्देश्य से दूर करने का षडयंत्र रचने लगता है।

ऐसी स्थिति में वर्तमान के कड़ुवे घूंट पीते हुए वह अपने स्वर्णिम अतीत को भुलाये नहीं भूल पाता है। इस क्रम में ‘भीतर कई एकांत’ का बूढ़ा एक साथ कई भाव भूमियों पर अवस्थित दिखता है। कहीं वह उच्च कोटि का दार्शनिक और चिंतक भाव लिए नैरेटर से वाद-विवाद करते हुए उसे बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है, तो कई मौकों पर चतुर राजनीतिज्ञ की तरह खेल खेलता नजर आता है। इससे अलग कई बारवह समाज द्वारा तिरस्कृत निरीह और लाचार बूढ़े की शक्ल में अपने बाहर और भीतर के अकेलेपन से भिड़ता रहता है। लेकिन इस बहुरुपिए का रहस्यात्मक, दार्शनिक और चिंतक रूप ही बाकी रूपों पर भारी है, कदाचित इसीलिए नैरेटर न चाहते हुए भी उसकी ओर खिंचा चला आता है और कई बार चले जाने के लिए तैयार होते हुए भी सारी रात उसकी गुमटी में बिता देता है।

समकालीन गल्प शिल्प के जाने-पहचाने हस्ताक्षर डॉ. हरिसुमन बिष्ट का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘भीतर कई एकांत’ का सार संक्षेप यही है। एपीएन पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित आलोच्य उपन्यास जीवन के उत्तरार्ध में एकाकी जीवन जी रहे एक ऐसे वृद्ध का आख्यान और अंतर्द्वद्व है जो प्रकारांतर से पूरे बूढ़े समाज का आख्यान और अंतर्द्वद्व बन जाता है। इस अर्थ में ‘भीतर कई एकांत’ का बूढ़ा विश्वमोहन उस पूरे वृद्ध समाज का प्रतिनिधि है जो घर-परिवार से लेकर देश-समाज तक एकाकी जीवन जीने के लिए शापित हो चला है। आज ऐसे उपेक्षित बुजुर्ग चाहते हुए भी अपने घर परिवार या समाज को अपनी भावनाओं से आत्मसात नहीं करवा पा रहे हैं जबकि उनके अंदर समाज को दिशा देने का भरपूर माद्दा और हुनर मौजूद होता है।

संवादात्मक शैली में रचे गए आलोच्य उपन्यास में बेशक बूढ़े विश्वमोहन का अंतर्द्वद्व और एकालाप ही सबसे बड़ा स्पेस पाता है, लेकिन नैरेटर और बूढ़े के बीच के संवाद में एक सांगोपांग समाज का चित्र भी बराबर खिंचता चला जाता है, जहां समाज और संस्कृति के साथ ही प्रकृति-पर्यावरण से लेकर धर्म दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का विस्तृत वितान तना हुआ नजर आता है और जहां मनुष्य आशा- निराशा के भंवर में तैरता नजर आता है।

उपन्यास का आरंभ ही प्रकृति राग और श्रीमद्भगवद गीता के तत्वज्ञान के साथ शुरू होता है जहां नैरेटर सुबह-सुबह बांज-बुरांश और देवदारु की खपच्चियों से छाई हुई गुमटी में बैठे उस कथानायक बूढ़े का परिचय कराता दिखता है जो पास ही बरगद और पीपल के झड़ते पत्तों को जमा करते हुए स्वयं को 84 लाख योनियों के महाकुंड में तैरता महसूस करता है। पेड़ से गिरे पत्ते को वह देह से मुक्त आत्मा का प्रतीक मानता है। पूरे उपन्यास में बूढ़ा कहीं गीता के कृष्ण की तर्ज पर कर्म का ज्ञान देता दिखता है तो कहीं अथाह संघर्षों के बाद मिली आजादी के बाद के भारत की दुर्दशा पर आक्रोश जताते हुए व्यथित होता है।

उपन्यास की भूमिका में कवि आलोचक प्रताप सिंह ने ‘भीतर कई एकांत’ के बूढ़े विश्वमोहन की तुलना अमेरिका के नोबेल पुरस्कार प्राप्त उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे के कालजयी उपन्यास ‘ओल्ड मैन एंड द सी’ के लाचार बूढ़े से उपयुक्त ही की है। हेमिंग्वे के ‘ओल्ड मैन एंड द सी’ का बूढ़ा नायक जीवन की अदम्य इच्छा की प्रतीक एक अदद मछली के लिए सारा दिन भूखा-प्यासा समुद्र के बीच गुजार देता है और कुछ हासिल नहीं कर पाता है। ‘भीतर कई एकांत’ का विश्वमोहन भी गांव से अलग-थलग अपनी गुमटी में 65 साल पुराने अतीत की याद में वर्तमान विषम परिस्थितियों से अकेले जूझ रहा है और कुछ सार्थक नहीं कर पा रहा है। हालांकि कथा के अंत में बूढ़ी औरत की आवाज और गांव के बच्चों का उसकी राह तकना इस बात का प्रतीक है कि आशा की एक किरण अभी कहीं उसके मन में शेष है। कदाचित इसीलिए वह तेजी से गांव की पगडंडी पर आगे बढ़ने लगता है।

आज जबकि साहित्य में पाठकों की संख्या कम से कमतर होती जा रही है,किसी कृति की सफलता के लिए कहानी या उपन्यासकार का दो बिंदुओं पर फोकस बेहद जरूरी हो जाता है- पहला कृति का शीर्षक और दूसरा उसका आकार। पाठक को रचना का शार्षक रास आ जाए, साथ ही उसके भारी भरकम होने का डर न हो तो किताब हाथ में आते ही वह कथानक के भीतर प्रवेश करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। कह सकते हैं कि किसी औपन्यासिक कलेवर को रोचक शीर्षक के साथ कम से कम शब्दों में समेटने की कला जिस कथाशिल्पी को आती हो, वही मौजूदा दौर में सफलता के पायदान पर आगे बढ़ने का माद्दा रखता है।

‘भीतर कई एकांत’ की इस परिप्रेक्ष्य में विवेचना की जाए तो मात्र 87 पृष्ठों में समाहित यह उपन्यास न सिर्फ अपने रोचक शीर्षक के चलते पाठक को अपनी ओर खींच ले जाता है, बल्कि सीमित शब्दों में दशकों के कालखंड के सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक परिवेश के साथ ही भारतीय धर्म-दर्शन का एक सुगुंफित विचार भी पाठक के सामने परोस देता है। मात्र दो पात्रों के माध्यम से नई और पुरानी पीढ़ियों के अंतर को भी बेबाकी से उकेरने का उपन्यासकार का प्रयास सार्थक सिद्ध होता है।

कह सकते हैं कि सीमित पात्रऔर लघु आकार के बावजूद आलोच्य कृति एक समग्र उपन्यास की सभी अर्हताएं पूरा कर जाती है। बल्कि इससे ऊपरयह इस मौलिक सोच के साथ भविष्य के कथाकारों के लिए एक नमूना बन जाती है कि आज जबकि भारी-भरकम उपन्यासों का समय चुकता जा रहा है, उपन्यास विधा को बड़ी कहानी और वृहद उपन्यास के बीच के आकार में लोकप्रिय बनाया जा सकता है।

(सुषमा जुगरान ध्यानी 117, पत्रकार परिसर, सेक्टर 5/वसुंधरा , गाजियाबाद/ 201012)

कृति- भीतर कई एकांत (उपन्यास)

लेखक- डॉ. हरिसुमन बिष्ट

प्रकाशक- एपीएन पब्लिकेशंस

मूल्य- 120 रुपये


 

पुस्तक समीक्षा

स्‍मृतियों के आधार पर पूरे जीवन की कथा: भीतर कई एकांत

———— हरियश राय

हरिसमुन बिष्‍ट हमारे समय के वरिष्ठ कथाकार है.  उनके अभी तक छ उपन्‍यास, छ कहानी संग्रह, यात्रा वृतांत व कई नाटक प्रकाशित हुए है. वे हमारे आज के समय के ऐसे कथाकार हैं जो अपनी जमीन ,अपने  पहाड़ , अपने  परिवेश , उस परिवेश में रह रहे मनुष्य के दुखों,उनके संघर्षों को अपनी रचनाओं के केन्‍द्र में लाते है . अपने कथा साहित्य में  हरिसुमन बिष्‍ट ऐसी स्त्रियों को अपने  पात्रों के रुप में  खड़ा करते है जो जीवन की कठोर  भूमि से निकली है  और  जिनमें अपने समय से जद्धोजहद्ध कर उसे बदलने का भरपूर माद्धा है. पहाड़ों की वे स्त्रियां उनकी रचना भूमि में रहती है जो खेतों और खलिहानों में  हाड़ तोड़ मेहनत करती हैं,जिनके लिए परिवार का भरण पोषण करना ही जीवन का मकसद  है और जो प्रकृति का संरक्षण करते हुए उसे पल्‍लवित और पोषित करती है . उनके कथा साहित्य को पढ़ते वक्त यह बात भी जेहन में उभरती है  कि हरिसुमन बिष्‍ट  जीवन से सकारात्मक पात्रों का चुनाव कर जीवन मेंआस्था के स्‍त्रोतों को तलाश करते है. उनके उपन्यासों‘आछरी –माछरी ’,‘होना पहाड़’,‘और  आसमान झुक रहा है’  की कथाएँ पहाड़ी परिवेश पर आधारित होते हुए भी देश के प्रत्येक भाग की कहानी कहती हई दिखाई देती है . उनकी यही विशेषता है कि आंचलिकता पर अपनी जड़ें मजबूती से  जमाते हुए समग्र परिवेश को अपनी रचनाओं के केन्‍द्र में रखते हैं. उनका लेखन हमारे समय के जटिल और विषम पहाड़ी  परिवेश को पूरे अंतविर्रोधों के साथ    सामने लाता है  . उनके लेखन के केन्‍द्र मेंअभावग्रस्त,  वंचित और संघर्षशील  मनुष्य है जो अपने समय से निरंतर टकराता हुआ अपने परिवेश को बदलने के लिए संकल्पशील है.  वह ऐसा मनुष्य है जो न तो कभी हारा है और न ही कभी परास्त हुआ है .उनका नया उपन्‍यास भीतर कई एकांत अभी हाल ही में सम्‍पन्‍न हुए विश्व पुस्तक मेला में सामने आया है .

यह उपन्‍यासमनुष्य के जीवन की स्मृतियों पर आधारित  के  मार्मिक आख्यान  के रूप में  हमारे सामने  है. कथा के नाम पर उपन्‍यास की कथा सिर्फइतनी है कि एक बूढ़ा, है विश्‍वमोहन नाम का . वह  जीवन –  जगत  से दूर किसी पहाड़ पर बरगद और पीपल के पेड़ के नीचे गुमटी बनाकर रहता है .उपन्‍यास में एक और पात्र है मैं का जो कि बूढ़े हरिमोहन से संवाद करता है .संवाद की इस प्रक्रिया में दोनों बीते हुए जीवन के बारे में बात करते हैं . बातचीत के क्रम में बूढ़े की चेतना में  अनेक स्‍मृतियां कौंधती हैं.  वे स्‍मृतियां इतनी प्रभावशाली और विश्वसनीय हैं कि उपन्‍यास को जीवंत बनाती है . उपन्‍यास का यह बूढ़ा विश्‍वमोहन एक ऐसा पात्र है जिसके अपने मूल्य हैं, अपने विश्वास हैं,अपनी आस्‍थाएं है और अपनी सोच है. इन्‍हीं मूल्यों,आस्‍थाओं के सहारे वह एकांत में रहकर अपने जीवन के शेष दिन गुज़ारना चाहता है . उपन्‍यास का दूसरा पात्र मैं बूढ़े को अपना एकांत छोड़कर  वापस जीवन के केन्‍द्र में लाना चाहता है तो  अंतत: बूढ़ा अपना एकांत छोड़कर वापस अपने गांव की ओर चला जाता है . हरिसुमन बिष्‍ट ने इस बूढ़े का चरित्र अपने परिवेश से उठाया है . इस चरित्र के बारे में वे बताते है कि ‘’  मेरे जेहन में बचपन से ही इस बूढ़े का चरित्र घूम रहा था .यह बूढ़ा गांव –गांव घूमता था. उसके कंधे पर लाठी होती थी और लाठी में झंडा टंगा रहता था और उसके हाथ में एक लोटा भी रहता था.  वह बार –  बार लोटे से डंडे को बजाया करता था और भारत माता की जय बोलता था . यह चरित्र मेरे जेहन में लगातार समाया रहा और मुझे हांट करता रहा.’’

उपन्‍यास का नायक विश्‍वमोहन एक ऐसे चरित्र के रूप में हमारे सामने है जिसके जीवन में परम एकांत व्याप्त गया है  लेकिन वहअंततोगत्‍वा जीवन का वरण करता है .कथा नायक की सजग चेतना में  गुज़ारे गये जीवन कीअंतहीन स्‍मृतियां हैं और अपनी स्मृति  के सहारे  जीवन के शाश्वत सवालोंसे रूबरू होता है और इस क्रम में   जीवन के रहस्यों की सघन पड़ताल करता  हुआ दिखाई  देता है.  उपन्‍यास का यह पात्र बरगद और पीपल के दो पेड़ों से घिरी इस  गुमटी को सिर्फ सिर छुपाने की जगह नहीं मानता बल्कि उसके लिये यह जीवन की अमूल्य निधि है जहां पर बैठकर वह वृक्ष से झड़ते   पत्तों को जमीन पर गिरने से पहले अपनी हथेली में रखकर  उसकी आखिरी गरमाईश को महसूस करना चाहता है. वह इस गुमटी में धरती की मिट्टी,हवा और पानी से भीष्म की तरह  बंधा हुआ है. हरिसुमन बिष्‍ट का  यह उपन्‍यास अपने एकांत को भरने के लिए प्राकृतिक उपमानों के बीच से गुजरता हुआ जीवन में रहकर ही जीवन के अर्थों को तलाशने की कोशिश करता  है .हरिसुमन बिष्‍ट ने इस उपन्‍यास में बूढ़े के समानान्तर ‘मैं’ जैसे पात्र की रचना की है जो कि बूढ़े के मन की भीतरी तहों को पकड़ने की कोशिश करता हैं . लेकिन जितना वह बूढ़े के मन को पढ़ने की कोशिश करता है, उतनी ही  उसकी स्‍मृतियां  अधिक घुमावदार और जटिल होती जाती हैं. इतनी घुमावदार और जटिल  कि लेखक को लगता है बूढ़े की अंतरमन की बारीकियों का हाथ लगना आसान नहीं है.. मैं द्वारा बूढ़े से संवाद करने की प्रक्रिया में जीवन की अनेक स्‍मृतियां बूढ़े़ की सजग चेतना में कौंधती हैंऔर उन्‍हींस्‍मृतियों में एक स्मृति  है 15 अगस्त, 1947 की  जिसे हरिसमुन बिष्‍ट ने एक ऐसे रूपक के माध्यम से बुना है जो उपन्‍यास की कथा में एक अंत:सलिला की तरह रहता है.  इस रूपक के माध्यम से हरिसुमन बिष्‍ट देश की आजादी के समय दिखाए  गए उस सपनो को याद करते हैं जिसमें आम आदमी को  खुशहाल जीवन देने  और कतार में खड़े आखिरी  आदमी तक  के आंसू पौछने के वायदे किए गए  थे . उपन्‍यास की कथा में बार –  बार 15 अगस्त के दिन झंडे के प्रसंग का आना  उन मूल्यों और विश्वासों को याद दिलाता है जिन्हें आत्मसात कर देश ने भविष्य का मार्ग तय करना था  .अपने कंधे पर रखी लाठी और उस पर झूलते हए तिरंगे को ऊँचा उठाकर बूढ़े विश्‍वमोहन को  रेडियो पर भाषण देते  नेहरू याद आते हैं, सेवाश्रम चलाते हुए गांधी याद आते हैं इसलिये बूढ़ा विश्‍वमोहन  तिरंगे को हमेशा उपर रखता है , यानी उन विश्वासों और मूल्यों को उपर रखता है जो गांधी और नेहरू के  तिरंगे में निहित हैं.  पर उसे यह भी लगता है कि गांधी, नेहरू का समय बीत चुका है . गांधी और नेहरू के मूल्य और विश्वास ध्वस्त हो चुके हैं . इन मूल्यों और विश्वासों के टूटने की पीड़ा बूढ़े की सजग चेतना में लगातार विद्यमान रहती है .

हरिसमुन बिष्‍ट इस रूपक के माध्यम से सादगी और सच्‍चाई के प्रतीक  गांधी और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने वाले  नेहरू को अप्रासंगिक बना दिये जाने को बहुत अफसोस के साथ  याद करते हैं. दरअसल  गांधी और नेहरू ने  इस देश में एक मजबूत और सफल लोकतंत्र बनाने के जो स्वप्न देखे थे, वे स्वप्न धूल –  धूसरित हो गये. गांधी और नेहरू ने देश के विकास का जो रास्ता चुना था, बाद की पीढ़ी उस रास्ते से ही भटक गई और  गांधी को अप्रासंगिक  साबित कर दिया. यह देश गांधी जी के मूल्यों को किस तरह आत्मसात कर सका, इसका अंदाजा बूढ़े विश्‍वमोहन के इस कथन से लगता है कि ‘शहर का अध्यापक ही महात्मा गांधी को नहीं जानता तो देश कैसेजानेगा, देश का भविष्य कैसे जानेगा.दरअसल इस  उपन्‍यास में  केवल विश्‍वमोहन की  स्‍मृतियां ही नहीं हैं बल्कि उन स्‍मृतियों के माध्यम से गांधी और नेहरू को अप्रासंगिक बना दियेजाने की करुण कथा भी मौजूद है.

हरिसुमन बिष्‍ट अपने इस उपन्‍यास में सर्जनात्‍मक कल्‍पना के आधार पर बूढ़े की स्‍मतियों का आभास कराते है और उपन्‍यास की कथा को इन्‍हीं स्‍मृतियों के सहारे कहते हैं . वे कुछ ऐसे सवाल उस बूढ़े से करते हैं जिससे समाज का परिवेश ,समाज के देखे जाने की दृष्टि का परिचय मिलता है . वह उसकी जिंदगी की पर्ते ही नहीं सामने लाते बल्कि उसके अतीत को भी कुरेदते हैं.   बूढ़े की स्‍मृतियों के सहारे हरिसुमन बिष्‍ट  हमारे समय के सवालों से रूबरू होते है.  जब उनकी जिज्ञासा शांत नहीं होती तो वे नये तरह से अपने सवालों को दोहराते हैं . स्‍मृतियों की जमीन पर खड़े हरिसुमन बिष्‍ट जीवन के प्रति गहरे लगाव और मानवीय सरोकारों  के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार करते हैं . लेखक के रूप में हरिसुमन बिष्‍ट जीवन में स्‍मृतियों को बचाये रखना चाहते हैं  इसलिये ‘  मैं ‘  उस बूढ़े से अंतरंग संवाद करते हुए  उससे पूछता है कि  क्या गांधी मर गया.  तो उसके जवाब में बूढ़ा कहता है दरअसल गांधी मरा नहीं, गांधी पर से विश्वास उठ गया.  गांधी मरा नहीं, वह जिंदा है. एक दिन वह लौट आयेगा . यह विश्‍वमोहन  1947 के दिन  के आजादी के उत्सव याद करता है, . जब पूरे गांव में पूरियाँ और पकोडि़यां  बनी थीं.  मुलायम मुलायम जलेबियां खाने को मिली थीं पर आजादी के बाद देश की कहानी  बदल गई  और उसका मन करता है कि जिन नेताओं ने आजादी के बाद की कहानी लिखी.  उन्हें एक – एक करके, उनके हाथ पैर बाँध कर  पहाड़ों की चोटी से नीचे लुढ़का दूं जहां पर चीले मँडराती हैं. आजाद भारत में विकास की कहानी लिखने वालों के प्रति एक तीव्र घृणा हरिसुमन बिष्‍ट ने इस बूढ़े विश्‍वमोहन के माध्यम से कही है .

ऐसा अक्‍सर होता है कि पिता के साथ की स्‍मृतियां जीवन पर्यंत जिस  शिद्दत से मन में कौंधती रहती हैं उस शिद्दत से मां की स्‍मृतियां नहीं कौंध पाती . हरिसमुन बिष्‍ट ने  इस मनोविज्ञान को पकड़ते हुए बूढ़े की स्‍मृतियों  का संसार बुना है.  बूढ़े की स्‍मृतियों में एक स्मृति है अपने पिता के चल बसने की. उसे याद आता है कि जिस दिन उसके पिता ने यह दुनिया छोड़ी, उस  दिन से ही वह उनकी दृष्टि से हमेशा- हमेशा के लिए मुक्त हो गया  और वह दिन उसके बचपन के खेलने का आखिरी दिन रहा होगा और पिता के जाने के बाद भी मां  तो हमेशा समझाने वाली उम्र में ही रहीं.

हरिसमुन बिष्‍ट ने अपने इस उपन्‍यास में बूढ़े को अपनी स्‍मृतियों के सहारे जीवित रहने वाला अतीत पंथी  नहीं बनाया है बल्कि उसे   जीवन के प्रति अदम्य आस्था के रूप में चित्रित किया है . यह बूढ़ा जीवन में ठहराव का नहीं, गति का प्रतीक है क्योंकि उसका मानना है कि  जिस जीवनमें ठहराव आ  जाता है वह अधिक दूर तक नहीं चल सकता, पानी की तरह सड़कर बू मारने लगता है.  इसलिए चलता- फिरता जीवन ही अच्‍छा  लगता है. . उपन्‍यास का दूसरा पात्र मैं उस बूढ़े को अपने गांव ,  घर  वापस  ले जाना चाहता है, लेकिन बूढ़ा घर जाने को तैयार नहीं  होता . वह पीपल और बरगदकी छांव में ही जीवन का अर्थ तलाश करने की कोशिश करता है.  उसका मानना है,’’ बूढ़ों का घर तो होता ही नहीं, घर तो युवाओं का होता है.  मेरी उम्र में  घर कहां रह जाता  है ज्यों- ज्यों उम्रबढ़ती जाती है,त्यों- त्यों घर भी उतना ही दूर होता चला जाता है .

घर को लेकर उसके अंतर्मन में एक टीस ने लगातार एक ऐसी जगह बनारखी है, जहां वह जाना तो चाहता है लेकिन जा नहीं पाता. हरिसमुन बिष्‍ट इस प्रसंग के माध्यम से बूढ़ों द्वारा अपनों से उपेक्षित होकर उनके अकेले पड़ जाने की व्यथा –  कथा को कहते हैं.  यह अकारण नहीं है कि बाजार केन्द्रित अर्थव्यवस्था  ने जिन मूल्यों और विश्वासों को हमारी पीढ़ी में  रोपा, वह मूल्य और विश्वास आज इतनेआक्रामक और हिंसकहो गये हैं कि  परिवार के बूढ़े अपनों द्वारा ही उपेक्षित और अपमानित होने लगे हैं.  परिणाम स्वरूप भारत के हर शहर  में  विश्‍वमोहन जैसे अनेक वृद्ध मिल जायेंगे जो अपना घर छोड़कर किसी गुमटी में या किसी मंदिर या किसी धर्मशाला में शरण लेने के लिए बाध्य हो गये हैं  .ऐसी स्थिति में संबंधों का शुष्क होना तेजी से बढ़ता चला जाता है तब बूढ़ों का जीवन के भयावह सन्‍नाटे और अकेलेपन से सामना होता है और यह अकेलापन किसी खूंखार जानवर से अधिक क्रूर होता है.

हरिसुमन बिष्‍ट ने यह उपन्‍यास संवाद शैली में लिखा है जिसमें मूल रुप से दो पात्र हैं विश्‍वमोहन और मैं. मैं एक ऐसे पात्र  के रूप में इस उपन्‍यास में है जो  विश्‍वमोहन से संवाद करता है और विश्‍वमोहन  उससे संवाद करने के साथ –  साथ  अपनी उन  स्‍मृतियों को सजीव करता है जो उसकी अन्‍तश्‍चेतना में गहराई से विद्यमान रहती है. इस संवाद में विश्‍वमोहन अपनी मां नौरंगी को याद करता है, जिसनेगांव से बाहर जाने का रास्ता पकड़ लिया और फिर कभी नहीं लौटी . बातचीत केक्रम में वह बताता है कि प्रकृति ने औरत को मजबूत और सुलझा  हुआ बेहतर इंसान बनाया है और वह गहराई से महसूस करता है कि दुनिया में पुरुषों की बहादुरी के गीत हर कोई सुनता है लेकिन औरत के जीवन की उमड़न –  घुमड़न कोई नहीं सुनाता .

हरिसुमन बिष्‍ट ने अपने इस उपन्‍यास में विश्‍वमोहन के माध्यम से पहाड़ों में या कहा जाये सभी जगह एकांत में  रहने वाले वृद्धों की कथा कही है . एकांत में रहकर भी वह अकेला नहीं है. वह अपने  आस – पास के पेड़ों से ,पेड़ों से गिरती पत्तियों से  संबंध स्थापित कर जीवन का अर्थ तलाश करने की कोशिश करता है .  हरिसुमन बिष्‍ट का यह कथा नायक एकांत में रहकर एकालाप नहींकरता,  बल्कि अपने मां– बाप को धरती और  आकाश के रूप में याद करता है .  पेड़ों से गिर रहीपत्तियों को एक नये अर्थ में देखता है और जीवन में आस्था के स्वरों की तलाश करता है क्योंकि उसका मानना है कि भ्रमों को पालते – पोसते हम बूढ़े हो जाते हैं और एक दिन वे भ्रम ही हमें निगल जाते  हैं.हरिसुमन बिष्‍ट ने वटवृक्ष के रूप में इस बूढे को चित्रित कर उसके जीवन का एक नया अर्थ दिया है .

 

इस उपन्‍यास में हरिसुमन बिष्‍ट ने अपनी रचना प्रक्रिया के दायरे में आने वाले लोगों के मनोविज्ञान को और मानवीय व्यवहारों को पूरी गहराई से पकड़ कर चित्रित किया है.चाहे वह पहाड़ों में रहने वाली स्त्रियों की पीडा़एं हों,या पहाड़ों के विकास के नाम पर लूट हो या युद्ध में गये सैनिकों के परिवारों की दुर्दशा हो या फिर पहाड़ी जीवन के संस्मरण ही हों, हरिसुमन बिष्‍ट संवेदनशीलता के साथ ऐसे चरित्रों का निर्माण इस तरह  करते हैं कि वह पाठकों को एक दम सजीव और सहज लगें .भीतर कई एकांत  उपन्‍यास में स्त्रियां एक मानवीय धरातल पर सामने आती हैं ये पहाड़ी स्त्रियां गांव के मर्दों के अत्याचार से त्रस्त रहती हैं इसलिये विश्‍वमोहन स्त्रियों के दुःख को दर्ज करता हुआ अपनी मां  की व्यथा कथा सुनाते हुए  कहता है कि ‘’गांव के मर्दों के अत्याचारों और उनकी मनमानी  से हर औरत परेशान रहती है. उनसे कहां तक लड़ सकती है . ‘’उसे लगता है कि नौरंगी को घर छोड़कर नहीं जाना चाहिए था. उसे यह भी  लगता है कि औरत का घर होता ही नहीं है. वह तो सिर्फ बच्‍चे जनती है. उसका भरा पूरा परिवार होता ही कहां है. वह तो हमेशा अकेली होती है. लेकिन उसके अकेलेपन को दूर करने के लिए जब मैं बूढेविश्‍वमोहन से कहताहै  कि अब घर लौट चलिये गांव भर के बच्‍चे तुम्‍हारी राह देख रहे होंगे,तो विश्‍वमोहन अपने एकांत को खत्म कर गांव जाने वाली पगडंडी की ओर चल पड़ता है .यहां आकर  हरिसुमनबिष्‍ट उपन्‍यास की कथा को एक नया आयाम देते हैं अपने एकांत को जीते हुए भी बूढ़ा उस एकांत को छोड़कर जीवन जगत से जुड़ता है . पैंसठ वर्ष की उम्र में बूढ़े का जीवन जगत से यह जुड़ाव जीवन के प्रति अदम्यआस्था का परिचय देता है .

उपन्‍यास को पढ़ने के बाद यह बात दावे के साथ कहीं जा सकती है कि हरिसुमन बिष्‍ट के पास कहने की अद्भुत शैली है और वे एक सजग कथाकार की तरह जीवन स्थितियों को रचना में संवेदनशीलता के साथ प्रस्‍तुत करते हैं . वे ऐसे मुहावरों का इस्तेमाल करते है जो हमारे जीवन में रच बस गये हैं .भीतर कई एकांतउपन्‍यास  स्‍मृतियों के आधार पर पूरे जीवन की कथा  कहता है और यही उनकी विशिष्टता भी है और उपलब्धि भी.  …………………
(हरियश राय / 73, मनोचा एर्पाटमैंट, एफ ब्‍लाक,/ विकास पुरी, नई दिल्ली– 110018 /मो : 09873225505 , ई मेल : hariyashrai@gmail.com )

समीक्षित पुस्तक:  भीतर कई एकांत, ( उपन्‍यास  )
लेखक : हरिसुमन बिष्‍ट
प्रकाशक: एपीएनपब्लिकेशन्‍स,  नई दिल्ली


 

 

 

 

 

 

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