देहरादून। उत्तराखंड की प्रसिद्ध चारधाम यात्रा शुरू हो गई है। गुरुवार 27 अप्रैल  को गंगा जी की डोली रवना होने के साथ ही यात्रा का शुभारंभ हा गया। अब शुक्रवार को गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए जाएंगे। इसके बाद केदारनाथ के कपाट तीन मई और बदरीनाथ के कपाट छह मई को खुल जाएंगे।
शुक्रवार दोपहर 12.15 पर गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए जाएंगे। इससे पहले बृहस्पतिवार को मां गंगा के मायके मुखबा गांव से गंगा जी की डोली यात्रा गंगोत्री धाम के लिए रवाना हुई । बृहस्पतिवार सुबह से ही मुखबा में मां गंगा की विदाई की तैयारियां शुरू हो गईं थीं। प्रात:  विशेष पूजा-अर्चना एवं आरती के बाद गंगा जी की डोली को सजाया गया। तय मुहूर्त के अनुसार दोपहर 1 बजे मुखबा से डोली यात्रा रवाना हुई। मां गंगा की डोली में सरस्वती की मूर्ति भी साथ रवाना हुई। गंगा जी की डोली यात्रा में मुखबा के साथ ही धराली, हर्षिल समेत उपला टकनौर के ग्रामीण तथा कई तीर्थयात्री भी जयकारे लगाते हुए शामिल हुए।
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हिमालय की भी चिंता करें चारधाम के तीर्थयात्री
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा पर आने वाले बंधुओं आपका स्वागत है। लेकिन उत्तराखंड में आकर आपको हिमालय की चिंता भी करनी चाहिए। हिमालय बचा रहेगा तभी यह यात्रा भी रहेगी।
आपको मालूम ही है कि यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा को उत्तराखंड में चार धाम के नाम से भी जाना जाता हैं। यहां सबसे पहले तीर्थयात्री यमुनोत्री (यमुना) और फिर गंगोत्री (गंगा) का दर्शन करते हैं। यहां से पवित्र जल लेकर श्रद्धालु केदारनाथ में शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं।
यमुनोत्री–  बांदरपूंछ के पश्चिमी छोर पर पवित्र यमुनोत्री का मंदिर स्थित है। परंपरागत रूप से यमुनोत्री चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यहां यमुना मंदिर का निर्माण जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं शताब्दि में किया था। यमुना का उदगम स्थल यमुनोत्री से लगभग एक किलोमीटर दूर 4,421 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री ग्लेशियर है। यमुनोत्री मंदिर के समीप कई गर्म पानी के सोते हैं। इनमें से सूर्य कुंड प्रसिद्ध है।
गंगोत्री—गंगोत्री समुद्र तल से 9,980 (3,140 मी.) फीट की ऊंचाई पर स्थित है। गंगोत्री से ही भागीरथी निकलती है। ऐसा माना जाता है कि 18वीं सदी में गोरखा कैप्टन अमर सिंह थापा ने आदि शंकराचार्य के सम्मान में गंगोत्री मंदिर का निर्माण किया था। यह मंदिर भागीरथी नदी के बाएं किनारे पर स्थित सफेद पत्थरों से निर्मित है। इसकी ऊंचाई लगभग 20 फीट है। मंदिर बनने के बाद राजा माधोसिंह ने 1935 में इस मंदिर का पुनरुद्धार किया। इसलिए मंदिर की बनावट में राजस्थानी शैली की झलक मिल जाती है।
केदारनाथ—– यह तीर्थ समुद्र तल से 11,746 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदाकिनी नदी के उदगम स्थल के समीप है। यहीं आदि शंकराचार्य  32 वर्ष की आयु में समाधि में लीन हुए थे। इससे पहले उन्होंने वीर शैव को केदारनाथ का रावल (मुख्य पुरोहित) नियुक्त किया था। यह मंदिर कात्युरी शैली में बना हुआ है। यह पहाड़ी के चोटि पर स्थित है। इसके निर्माण में भूरे रंग के बड़े पत्थरों का प्रयोग बहुतायत में किया गया है। इसका छत लकड़ी का बना हुआ है जिसके शिखर पर सोने का कलश रखा हुआ है। मंदिर के बाह्य द्वार पर पहरेदार के रूप में नंदी का विशालकाय मूर्ति बना हुआ है।

बद्रीनाथ–बद्रीनाथ मंदिर अलकनंदा नदी के किनारे है। यह नर और नारायण पर्वतों के मध्य स्थित है। यह समुद्र तल से 10,276 फीट (3,133मी.) की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु यहां ध्यानमग्न रहते हैं। लक्ष्मीनारायण को छाया प्रदान करने के लिए देवी लक्ष्मी ने बेर (बदरी) के पेड़ का रूप धारण किया। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण वैदिक काल में हुआ था जिसका पुनरूद्धार बाद में आदि शंकराचार्य ने 8वीं शदी में किया। इस मंदिर में नर और नारायण के अलावा लक्ष्मी, शिव-पार्वती और गणेश की मूर्ति भी है। बाद में मंदिर का पुनर्निर्माण लगभग दो शताब्दी पहले गढ़वाल राजा ने किया।  यह मंदिर शंकुधारी शैली में बना हुआ है। इसकी ऊंचाई लगभग 15 मीटर है। जिसके शिखर पर गुंबज है। इस मंदिर में 15 मूर्तियां हैं। मंदिर के गर्भगृह में विष्णु के साथ नर और नारायण ध्यान की स्थिति में विराजमान हैं।
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