उत्तराखंड की लोककथा

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किसी जंगल में एक लोमड़ी का परिवार रहता था। जब मादा लोमड़ी गर्भवती हुई तो उसने अपने पति से घर का इंतजाम करने को कहा। इस पर पति लोमड़ी बहुर्त ंचंतित हो गया, लेकिन उसने वादा किया कि वह घर का इंतजाम जरूर कर देगा।  जब बच्चों के जन्म का समय आया तो लोमड़ी अपनी पत्नी को बाघ की गुफा में ले गया।
तब गुफा खाली थी। बाघ खिाकर के लिए बाहर गया हुआ था। गुफा देखकर मादा लोमड़ी बहुत खुश हुई। उसने गुफा में बच्चों को जन्म दे दिया। इसके बाद लोमड़ी ने अपनी पत्नी को बता दिया कि गुफा बाघ की है। वह हर वक्त गुफा के द्वार पर बैठा रहता था। उससे पत्नी के साथ मिलकर एक योजना बनाई । जैसे ही वहां  बाघ आया, मादा लोमड़ी ने योजना के तहत बच्चों को रुला दिया। पति लोमड़ी  ने पूछा कि बच्चे क्यों रो रहे हैं तो मादा ने जोर से जवाब दिया कि बाघ का मांस मांग रहे हैं।
ऐसा सुनते ही बाघ घबरा गया और सोचने लगा कि गुफा में उससे भी ताकतवर जानवर आ गया है, तभी तो बाघ का मांस मांग रहा है। वह गुफा छोड़कर भाग गया। रास्ते में उसका दोस्त बंदर मिला। बंदर जानता था कि गुफा में लोमड़ी का परिवार रह रहा है। उसने बाघ को समझाया। पहले तो बाघ मानने को तैयार नहीं हुआ, लेकिन बाद में बंदर के साथ गुफा में जाने को तैयार हो गया। जैसे ही बाघ बंदर के साथ गुफा के निकट पहुंचा, लोमड़ी ने जोर-शोर से कहना शुरू कर दिया कि हे बंदर जब तक तू हमारा नौकर था, तब तो रोज चार-चार बाघ लाता था और अब सिर्फ एक बाघ ला रहा है। ऐसा सुनकर बाघ को लगा कि बंदर ने उसके साथ विश्वासघात किया है, उसने बंदर को मार दिया और खुद भी गुफा छोड़कर भाग गया। इस तरह लोमड़ी ने चालाकी से बाघ की गुफा को हड़प लिया।

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