उत्तराखंड का सती माता अनूसूया मंदिर —- ममता गैरोला

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चमोली का सती माता अनूसूया मंदिर गोपेश्वर से 12 किमी दूर गाड़ी से पहुंचा जाता है। इसके बाद अनुसूया गेट से 5 किमी पैदल दूरी तय करने के बाद माता अुनूसूया मंदिर पहुंचा जाता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालूं यहां पहुंचते हैं हालांकि माता के मंदिर में बारह महीने पूजा के लिए जा सकते हैं, लेकिन पौष माह की पूर्णिमा के दिन दत्तात्रेय जयंती के अवसर पर लगने वाला दो दिवसीय अनुसूया मेला अपने आप में अन्य मेलों से विशेष रूप से अलग मेला है। अनूसूया माता के मंदिर में निसन्तान दम्पति संतान प्राप्ति के लिए माता से मन्दिर में मन्नत के लिए जाते हैं। इस क्षेत्र में माता अनुसूया के दरबार में मन्नत पूरी होने से जो संतान प्राप्ति होती है। उनका नाम अनुसूया रखा जाता है। मण्डल, कठूड, देवधार, बणद्वारा, सगर, खल्ला पूरे इलाके की अराध्य देवी हैं। सभी लोग माता को सगर, देवलधार बणद्वारा, कठूड खल्ला गांव से देव डोलियों जो 2 ज्वाल्पा, सर्वेस्वरी, अनुसूयामाता, चण्डिका इन सभी अलग रूपों में पूजते हैं। कहते हैं कि माता अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने आए ब्रहमा विष्णु महेश खुद ही फेल हो गए थे और माता के सतीत्व के आगे नतमस्तक हुए तीनों देवों की देवियां। भले ही आज विज्ञान का युग है और लोग वैज्ञानिक विधि द्वारा संतान प्राप्ति कर सकते हों लेकिन चमोली के मण्डल से 5 किमी पैदल दूरी पर स्थित मा अनूसूया का मंदिर आज भी निसंतान दम्पितियों की आस है।

जहां पर जाकर वे लोग अपने लिए संतान की मन्नत मांगते हैं और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो अपने बच्चे का नाम अनूसुया माता के नाम पर रखते हैं, और आज भी पूरे क्षेत्र में कई बच्चों के नाम अनूसूया हैं भक्तों का मानना है कि सती माता अनुसूया पुत्र दायनी माता है जो कभी भी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाती है। बड़ी दूर- दूर से लोग यहां आते है, उनकी मन्नतें पूरी हो जाती हैं। अनुसूया माता अपने सतीत्व के लिए प्रसिद्ध हैं कहा जाता है कि सतयुग में जब माता के सतीत्व की चर्चा तीनों लोकों में होने लगी इस पर लक्ष्मी, पावर्ती, में रोष हो गया कि धरती में हमसे बढ़कर कौन है। इस बात पर तीनों देवियों ने ब्रहमा विष्णु महेश को धरती पर जाकर माता अनुसूया के सतित्व की परीक्षा लेने के कहा तो तीनों देवियां की जिद के आगे ब्रहमा विष्णु महेश मजबूर होकर धरती पर पहुंचते हैं और ऋषियों का भेश बदलकर माता के आश्रम में पहुंचकर माता को विश्राम कराने और माता के सतीत्व की परीक्षा के लिए माता से स्तन पान करवाने की शर्त रखते हैं।

त्रिदेवों की इस तरह की शर्त से परेशान माता अनुसूया अपने सतीत्व के बल से तीनों ऋषियों को बालक रूप बना देते हैं और कई वर्षों तक बच्चों की तरह तीनों देवों को अपने पास रखते हैं जब कई वर्षों तक पति की कोई खबर नहीं पहुंचती हैं तीनों देवियां अपने पतियों की खोज में धरती पर पहुंचते हैं और माता अनुसूया के पास अपनी गलतियों के माफी मांगते हैं और ब्रहमा विष्णु महेश को माता द्वारा असली रूप में लाया जाता है। तब तीनों देवों द्वारा माता को ये आर्शीवाद दिया जाता है। जो भी तेरे दरबार में मन्नत मांगेगा वो पूरी होगी उसमें और निसंतान दम्पतियों को तेरे दरबार में आने से संतानोत्पति हो जाएगी। तब से सती माता अनुसूया को दत्तात्रेय के नाम से भी जाना जाता है इसी तरह से आज भी दूर दूर से निसंतान दम्पति माता के मंदिर में आकर संतान की मन्नत मांगते हैं और उनकी मन्नते पूरी हो जाती है।
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—- ममता गैरोला

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