खेमेबाजी में बंटे हैं उत्तराखंड के आला अफसर

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नई दिल्ली। खेमेबाजी में बंटे उत्तराखंड के आला अफसरों को सुधारना मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के लिए बड़ी चुनौती है।  विधानसभा चुनाव के समय दिल्ली में तैनात किए उत्तराखंड के अपर स्थानिक आयुक्त डॉ. मृत्युंजय मिश्रा को प्रदेश सचिवालय में तैनात करने को लेकर शुरू हुआ विवाद इस पहाड़ी प्रदेश के आला अफसरों की कहानी को बयां करता है। उत्तराखंड के अफसर विभिन्न खेमों में बंटे हैं।
विशेष तौर पर वे मैदान और पहाड़ में बंटे हैं। मैदानी अफसरों में भी बिहार और गैर बिहारी का विवाद बहुत पुराना है। यहां बात आईएएस और पीसीएस अफसरों की हो रही है। वे अफसर अपने साथ उत्तर प्रदेश और बिहार की जातिवादी मानसिकता को लेकर आए हैं और उसी ढर्रे पर प्रदेश का प्रशासन चला रहे हैं।
उत्तराखंड में सिर्फ जनरल बीसी खंडूड़ी ही एक मात्र ऐेसे मुख्यमंत्री थे जिनसे अफसर खौफ खाते रहे हैं। बाकी मुख्यमंत्रियों से ये आला अफसर जरा भी नहीं डरे। अफसरों को बेलगाम छोडऩे के मामले में नारायण दत्त तिवारी सबसे आगे रहे। अब देखना होगा कि त्रिवेंद्र रावत इन बिगड़ैल अफसरों की लगाम कितनी कस पाते हैं।
आप देहरादून में सचिवालय चले जाइए। आम लोगों में चर्चा रहती है  कि वहां सरकार किसी भी दल की रही हो सचिवालय में बिना रिश्वत के काम करना संभव नहीं है। भ्रष्ट अफसरशाही के कारण छोटे बाबू भी बिना पैसा लिए फाइलों को आगे नहीं बढ़ाते हैं।
अफसरशाही के हाथ इतने मजबूत हैं कि वे रिटायर होने के बाद भी अपने लिए जगह तलाश लेते हैं। एक-दो उदाहरण काफी हैं। एक पूर्व मुख्य सचिव राकेश शर्मा थे, हिमाचल प्रदेश के इस अफसर ने रिटायर होते ही तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के विशेष प्रधान सचिव बन गए। हालांकि राष्ट्रपति शासन लगते ही राकेश शर्मा ने पाला बदल दिया था।
दूसरे मुख्य सचिव  थे बिहार के शत्रुधन सिंह। उन्होंने रिटायर होते ही मुख्य सूचना आयुक्त बन गए। खास बात यह है कि  प्रदेश में सूचना आयुक्तों के चयन को लेकर झगड़ते रहने वाले हरीश रावत तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और तत्कालीन विपक्ष के नेता अजय भट्ट इस अफसर को  मुख्य सूचना आयुक्त बनाने के मामले में एक हो गए। इसके लिए कई तरह की बातें सुनी जाती हैं।

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