नई दिल्ली। बैशाखी यानी बिखोती से उत्तराखंड में ग्रीष्मकालीन मेलों की शुरू आत हो गई है। ये मेले मई तक चलेंगे।
वैसे तो उत्तराखंड में लगभग हर मौसम में मेले लगते रहे हैं। ठंड के मौसम में प्रसिद्ध गिंदी मेले लगते हैं। हर छह व 12 साल में हरिद्वार में कुंभ लगता है। बरसात में भगवान शिव के मंदिरों में मेले जैसे ही लगते हैं।
इस  मौसम में स्याल्दे बिखौती कौतिक यानी मेला उत्तराखंड के प्रमुख मेलों में से एक है। हर साल अल्मोड़ा के द्वारहाट में चैत्र-बैशाख महीने में लगने वाला यह पौराणिक मेला विश्व प्रसिद्ध है। बिखौती मेले के नाम से जाना जाने वाला यह मेला द्वारहाट से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित विभांडेश्वर शिव मंदिर में आयोजित किया जाता है।़

बिखोती-
उत्तराखंड में बैसाखी को बिखोती कहते हैं। वसंत ऋ तु के आगमन की खुशी में बैसाखी मनाई जाती है। बैसाखी मुख्यत: पंजाब या उत्तर भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है, लेकिन इसे भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नाम (बैसाख, बिशु, बीहू व अन्य) से जाना जाता है। यह त्यौहार अक्सर 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। बैसाखी रबी की फसल के पकने की खुशी का प्रतीक है।
बैसाखी का इतिहास——–
मान्यता है कि गुरु गोविंद सिंह ने वैशाख माह की षष्ठी को खालसा पंथ की स्थापना की थी, जिस कारण बैसाखी पर्व मनाया जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने इस मौके शीशों की मांग की, जिसे दया सिंह, धर्म सिंह, मोहकम सिंह, साहिब सिंह व हिम्मत सिंह ने अपने शीशों को भेंट कर पूरा किया। इन पांचों को गुरु के ‘पंच-प्यारे’ कहा जाता है, जिन्हें गुरु ने अमृत पान कराया।

आज आरम्भ होने वाला विक्रमी संवत नेपाल का राष्ट्रीय संवत है। वैसे ही जैसे शक शालिवाहन भारत का राष्ट्रीय संवत है। हर भारतीय संवत्सर का एक नाम होता है और उस कालक्षेत्र का एक-एक राजा और मंत्री भी। संवत्सर के पहले दिन पडऩे वाले वार का देवता/नक्षत्र संवत्सर का राजा होता है और वैसाखी के दिन पडऩे वाले वार का देवता/नक्षत्र मंत्री होता है। नव वर्ष का यह बैसाख संक्रांति उत्सव उत्तराखंड में बिखोती, बंगाल में पोइला बैसाख, पंजाब में बैसाखी, उडीसा में विशुवा संक्रांति, केरल में विशु, असम में बिहु और तमिलनाडु में थइ पुसम के नाम से मनाया जाता है। श्रीलंका, जावा, सुमात्रा तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों कम्बोडिआ, लाओस, थाईलैंड में भी संक्रांति को नववर्ष का उल्लास रहता है। वहाँ यह पारम्परिक नव वर्ष सोंग्रन या सोंक्रान के नाम से आरम्भ होगा।
भारतीय संवत्सर साठ वर्ष के चक्र में बन्धे हैं और इस तरह विक्रम सम्वत के हर नये वर्ष का अपना एक ऐसा नाम होता है जो कि साठ वर्ष बाद ही दोहराया जाता है। साठ वर्ष का चक्र ब्रह्मा,विष्णु और महेश देवताओं के नाम से तीन बीस-वर्षीय विभागों में बंटा है। दक्षिण भारत (तेलुगु/कन्नड/तमिल) वर्ष के हिसाब से इस संवत का नाम खर है। जबकि आज आरम्भ होने वाला विक्रम सम्वत्सर उत्तर भारत में क्रोधी नाम है।
आप सभी को सप्तर्षि 5087, कलयुग 5113, शक शालिवाहन 1933, विक्रमी 2068 क्रोधी/खरनामसंवत्सर की मंगलकामनायें।
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