यह प्रेम कथा विश्व की महान प्रेम कथाओं में से एक तो है ही अदभुद भी। गहरी नींद में देखे सपनों में भी प्यार हो सकता है। कहानी पन्द्रहवीं शताब्दी की है। कत्यूर राजवंश के राजकुमार मालूशाही और शौका वंश की कन्या राजुला की प्रेम कथा है। इस कथा के 40 रूप मौजूद हैं।
एक बार पंचाचूली पर्वत श्रृंखला के क्षेत्र में स्थित मल्ला दारमा का सम्पन्न व्यापारी सुनपति शौक अपनी पत्नी गांगुली शौक्याण के साथ मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर बागेश्वर के बागनाथ मंदिर में दर्शन करने आता है। उस समय भोट के हुणों के साथ उनका अच्छा व्यापार चलता था , वह अपने व्यापार से संतुष्ट तो था ही उसके पास अपार धन संपन्नता थी किन्तु उसकी अपनी कोई संतान न होने कारण वह बहुत परेशान रहता था। उसकी पत्नी गांगुली शौक्याण भी एक धर्म प्रिय महिला थी, धन वैभव संपन्न होते हुवे भी वह भी संतान न होने के कारण बहुत चिंतित व दुखी रहती थी, दोनों उस समय भगवान बागनाथ के दर्शन को बागेश्वर के बागनाथ धाम आये थे ईश्वर की रचना व संयोग से उसी समय भगवान बागनाथ के मंदिर में बैराठ नगर के राजा दुलाशाही भी अपनी रानी धर्म देवी के साथ बागनाथ के मंदिर में आये थे, ईश्वर की लीला देखिये कि पाजा दुलाशाही रानी धर्म देवी भी वैभव संपन्न थे किंतु संतान के लिए चिंतित व उदास थे जिससे वे बड़ी आशा लेकर बागनाथ के दरबार में आये थे। दोनों दंपतियों की एक ही व्यथा थी और दोनों ने भगवान बागनाथ से एक ही वरदान मांगा, दोनों का प्रथम परिचय भी यहीं बागनाथ के द्वार पर हुआ, पहले दोनों आपस में गले मिले और फिर दोनों ने प्रण किया कि एक को पुत्र व दूसरे को पुत्री प्राप्त होगी तो हम उन्हें परिणय सूत्र में बांधंगे। समय बीतते गया ईश्वर की रचना व लीला अपंरपार है,  दोनों महिलाऐं गर्भवती होती हैं और भगवान बागनाथ की कृपा से राजा दुलाशाही के घर में पुत्र जिसका नाम मालूशाही तथा सुनपति शौक के घर में रूपवती कन्या का जन्म होता है और जिसका नाम होता है राजुला। समय की धारा बहते जाती है समय बितता चला जाता है,दोनों ही सपने में एक दूसरे को हर रात देखेंते हैं और लग जाते हैं . बचपन बीतता है और दोनों बच्चे बड़े हो जाते हैं बड़ी होकर एक दिन अचानक राजुला ने अपनी मां से पूछा कि…..
…मां दिशाओं में कौन सी दिशा प्यारी है ?
……..पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा है ?
गंगाओं में कौन गंगा है ?
देवों में कौन देव है ?
राजाओं में कौन राजा ?
तथा देशों में कौन देश ?
जिज्ञासा वश पूछे गये प्रश्नों का उसकी मां ने भी उत्तर दिया –
……. कि दिशाओं में सबसे प्यारी पूर्व दिशा जो हमारी नवखंडी पृथ्वी को प्रकाशित करती है,
पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा है क्योंकि उसमें देवता का वास होता है।
गंगाओं में भागीरथी जो सबके पाप धोती है ।
देवताओं में सबसे बड़े महादेव आशुतोष हैं,
राजाओं में राजा हैं रंगीला मालूशाही, और देशों में देश है रंगीलो बैराठ ।
मां की ये बातें सुनकर राजुला धीमे से मुस्कराई और उसने अपनी मां कहा कि मां मेरा विवाह रंगीलो बैराठ में ही करना। इस बीच राजुला को पता चलता है कि उसके पिता इस बार व्यापार के सिलसिले में बैराठ की ओर ही जा रहे हैं तो राजुला भी अपने पिता के साथ जाने के लिए हठ करने लग जाती है । मां के द्वारा पिता को समझाने पर वह अपनी पुत्री राजुला को अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हो जाते हैं, समय की धारा बहते जा रही है नियति अपना खेल खेल रही है , राजुला के पिता अपने व्यापार के लिए उत्तरैणी के पावन पर्व पर भगवान बागनाथ की पावन नगरी बागेश्वर के बागनाथ मंदिर में अपनी सुपुत्री राजुला के साथ पहुंचते हैं । भगवान की लीला तो देखिये कि राजुला को बागनाथ की कृपा से मालूशाही के दर्शन हो जाते हैं , राजुला को पता चलता है कि राजा मालूशाही प्रतिदिन सबेरे अग्नयारी देवी के दर्शन के लिए जाते हैं, तो राजुला के मन में उनसे मिलने की लालसा अत्यधिक बढऩे लगी।  एक दिन अपने पिता सुनपति शौक से आंख बचाकर राजुला भी देवी के मंदिर पहुंच गयी, काफी समय इंतजार करने के बाद मालुशाही भी रोज की तरह मंदिर पहुंचे तो उन्हें देख राजुला मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई ।
वहीं मालूशाही भी राजुला से प्रण करते हैं कि वह एक दिन उसे ब्याहने के लिए दारमा जरूर आएंगे तथा मालूशाही राजूला को प्रेम के निशानी के रूप में मोतियों की माला उसके गले में डाल देते हैं , और यही से प्रसिद्ध अमर प्रेम लोककथा का प्रेम प्रसंग परवान चढऩे लगता है। राजुला के पिता सुनपति को जब इस प्रेम का अहसास होता है तो वह बहुत ही क्रोधित हो जाते हैं तथा अपनी पुत्री राजुला से बार बार पूछते हैं कि तेरे गले में यह मोतियों की माला किसने डाली, किन्तु राजुला ठीक से जबाब नहीं दे पाती है। क्रोधित होकर सुनपति अपना व्यापार आधे में ही छोडक़र अपने देश दारमा वापस लौट जाता है तथा अपनी बेटी राजुला का विवाह तिब्बत के हुण राजा ऋषिपाल के साथ तय कर देते हैं, ऋषिपाल राजुला से दुगुनी उम्र का है बेटी के प्रेम प्रसंग के बारे में जब उसकी मां को पता चलता है तो उसे भी काफी दुख होता है । इसी बीच में भगवान बागनाथ की लीला देखिये मालूशाही ने भी सपने में राजुला को देखा और सपने में भी राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हे दारमा से ब्याह कर अवश्य ले जाऊंगा।
यही सपना उसी समय राजुला ने भी देखा  प्रेम भक्त राजुला ने स्वंय निश्चय किया कि वह स्वंय बैराठ देश जायेगी और मालूशाही से मिलेगी, उसने अपनी मां से रास्ता जानना चाहा लेकिन मां भी उसके निर्णय से बड़ी असमंजय में थी 7 रात्री के समय एक हीरे की अंगूठी लेकर अपने दृढं संकल्प से राजुला रंगीली बैराठ की ओर चल दी । बहुत कठिन डगर , उबड़ खाबड़ रास्ते , नदी , पहाड़  का सामना करते हुए मुनस्यारी, फिर बागेश्वर के रास्ते से वह बैराठ नगर पहुंचती है  और मालूशाही से मिलती है, उसके अचानक थके हारे इस हाल इतनी दूर पहुंचने पर मालूशाही बड़े अचंभित होते हैं  और वह राजूला को आश्वासन देते हैं कि वह जल्द ही दारमा आकर उसे ब्याह कर ले जायेंगे। राजुला हीरे की अंगुठी मालूशाही को पहनाकर अपने देश वापस आने से पहले कहती है कि यदि तुमने सत्य में अपनीमामतामयी  मां रानी धर्म देवी का दूध पिया है और तुम्हारे खून में तुम्हारे पिता दूलाशाही का रक्त संचार कर रहा है तो तुम मुझसे विवाह करने शौक देश दारमा जरूर आना। बहुत ही कठिन परिक्षा का दौर था मालूशाही के लिए। मालूशाही ने चिंतित होकर अपना राजसी मुकुट व कपड़े नदी में बहा दिये । मालूशाही भक्तों के रक्षक गुरू गोरखनाथ जी की शरण में गये । गुरू गोरखनाथ ध्यानमग्न होकर धूनि रमाये बैठे थे । राजा मालूशाही ने गुरू गोरखनाथ को प्रणाम किया और कहा कि गुरू मुझे मेरी राजुला से मिला दो । तब राजा मालूशाही गेरूवे वस्त्र धारण कर धूनि की वभूति (राख) को अपने शरीर में मलकर गुरू गोरखनाथ से जिद करने लगे की मुझे राजुला कैसे मिलेगी मेरा मार्गदर्शन करो । गुरू गोरखनाथ ने उसे वापस जाकर राजपाठ संभालने के लिए भी कहा किंतु वह अपने प्रेम पर अडिग था ।
यह देखकर गुरू गोरखनाथ भी दयावान हो जाते हैं और अपने भक्त की सहायता के लिए तैयार हो जाते हैं गुरू गोरखनाथ अपने भक्तों की सच्चे मन की हर मनोकामना पूरी करते हैं और उनकी सहायता करते हैं । फिर दयावान गुरू गोरखनाथ जी ने मालूशाही को दीक्षा दी और बोक्साड़ी विद्या भी सिखाई, और गुरू ने तंत्र मंत्र भी दिये ताकि हूण और शौका देश का विष उसे न लग सके । मालूशाही गुरू गोरखनाथ का आशीर्वाद लेकर राजपाठ छोडक़र साधु के वेश में कत्यूरी सेना लेकर शौक देश पहुंचता है । दोनों प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे को पहचान लेते हैं, साधक की साधना और साधिका की प्रतिक्षा भी मानो पूरी उठती है । सुनपति शौक भी मालूशाही को पहचान लेता है । वह अपने साजिस से मालूशाही और उसके साथियों को समाप्त करने की योजना बना चुका था । समय था भगवान बागनाथ के द्वार पर वर्षो मांगी एक साथ मुराद पूरी होने का समय था गुरू गोरखनाथ के भक्त की लाज रखने का।  सुनपति शौक ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि ये सब अब हमारे मेहमान हैं इनकी सेवा के लिए हलवा पूरी खीर बनाओ। परन्तु वह खीर में धोखे से जहर मिला देता है। मालूशाही और उसके साथी बेहोस हो जाते हैं। योगी गुरू सिद्धनाथ अपनी शक्ति से उनकी हालत जान लेते हैं । वह अपने मंत्र बल से ही मलूशाही व उसके साथियों को जीवित कर देते हैं । मालूशाही जाग उठता है गुरू गोरखनाथ की मंत्रणा कर वह कत्यूरी सेना के साथ सुनपति व हुण देश की सेना पर हमला बोल देता है और गुरू कृपा साकार हो उठती है , वह विजयी होता है सुनपति लज्जित होकर अपनी पुत्री राजुला का हाथ मालूशाही को दे देता है । दोनों की प्रेम साधना साकार हो जाती हैं । भगवान बागनाथ व गुरू गोरखनाथ जी की कृपा से हताशा भी आशा में बदल जाती है, और दृढ़ संकल्प का हर सपना साकार हो जाता है ।
उत्तराखंड की लोक गाथाओं में गाई जाने वाली 15वीं सदी की इस अनोखी प्रेम कथा राजुला-मालूशाही का एक रूप यह है जिसमें कहा गया गया है कि कुमाऊं के पहले राजवंश कत्यूर से ताल्लुक रखने वाले मालूशाही जौहार के शौका वंश की राजुला के प्रेम में इस कदर दीवाने हुए कि राज-पाट छोड़ संन्यासी हो गए। उनके प्रति राजुला की चाहत भी इस कदर थी कि उसने उनसे मिलने के लिए नदी, नाले, पर्वत किसी बाधा की परवाह नहीं की। कत्यूरों की राजधानी बैराठ (वर्तमान चौखुटिया) में थी। जनश्रुति के अनुसार बैराठ में राजा दोला शाह राज करते थे। उनकी संतान नहीं थी। उन्हें सलाह दी गई कि वह बागनाथ (वर्तमान बागेश्वर) में भगवान शिव की आराधना करें तो संतान प्राप्ति होगी। वहां दोला शाह को संतानविहीन दंपति सुनपति शौक-गांगुली मिलते हैं। दोनों तय करते हैं कि एक के यहां लडक़ा और दूसरे के यहां लडक़ी हो तो वह दोनों की शादी कर देंगे। कालांतर में शाह के यहां पुत्र और सुनपति के यहां पुत्री जन्मी।
ज्योतिषी राजा दोला शाह को पुत्र की अल्प मृत्यु का योग बताते हुए उसका विवाह किसी नौरंगी कन्या से करने की सलाह देते हैं। लेकिन दोला शाह को वचन की याद आती है। वह सुनपति के यहां जाकर राजुला-मालूशाही का प्रतीकात्मक विवाह करा देते हैं।
इस बीच राजा की मृत्यु हो जाती है। दरबारी इसके लिए राजुला को कोसते हैं। अफवाह फैलाते हैं कि अगर यह बालिका राज्य में आई तो अनर्थ होगा। उधर, राजुला मालूशाही के ख्वाब देखते बड़ी होती है। इस बीच हूण देश के राजा विक्खीपाल राजुला की सुंदरता की चर्चा सुन सुनपति के पास विवाह प्रस्ताव भेजता है। राजुला को प्रस्ताव मंजूर नहीं होता। वह प्रतीकात्मक विवाह की अंगूठी लेकर नदी, नाले, पर्वत पार करती मुन्स्यारी, बागेश्वर होते हुए बैराठ पहुंचती है। लेकिन मालूशाही की मां को दरबारियों की बात याद आ जाती है। वह निद्रा जड़ी सुंघाकर मालूशाही को बेहोश कर देती है। राजुला के लाख जगाने पर भी मालूशाही नहीं जागता। राजुला रोते हुए वापस हो जाती है।
यहां माता-पिता दबाव में हूण राजा से उसका विवाह करा देते हैं। उधर, मालूशाही जड़ी के प्रभाव से मुक्त होता है। उसे राजुला का स्वप्न आता है, जो उससे हूण राजा से बचाने की गुहार लगाती है। मालूशाही को बचपन के विवाह की बात याद आती है। वह राजुला के पास जाने का निश्चय करता है तो मां विरोध करती है।

इस पर मालूशाही राज-पाट, केश त्याग संन्यासी हो जाता है। दर-दर भटकते उसकी मुलाकात बाबा गोरखनाथ से होती है। उनकी मदद से वह हूण राजा के यहां जा पहुंचता है। राजुला मालूशाही को देख अति प्रसन्न हो जाती है, लेकिन मालूशाही की हकीकत विक्खीपाल पर खुल जाती है। वह उसे कैद कर लेता है। प्रेम कथा का दुखद अंत होता है।
उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में प्रेम कहानियां लोकगाथाओं के रूप में जन-जन तक पहुंची हैं, हालांकि यह अधिकतर राजघरानों से जुड़ी हैं। हरूहीत और जगदेच पंवार की कहानी से लेकर रामी-बौराणी । रामी -बौराणी में पति के इंतजार में सालों गुजारना राकी के समर्पण को दर्शाता है। राजुला-मालुशाही की अमर प्रेम कथा प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। उत्तराखंड की लोककथाओं में प्रेम कथाओं का विशेष महत्व है। यह लोक गाथाओं के रूप में गाई जाती है, हालांकि अलग-अलग हिस्सों में इन कहानियों को अपनी तरह से लोक गायकों ने प्रस्तुत किया है, कुमाऊं और गढ़वाल में प्रेम गाथायें झोड़ा, चांचरी, भगनौले और अन्य लोक गीतों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में सुनी सुनाई जाती रही हैं, मेले इनको जीवन्त बनाते हैं।
राजुला-मालुशाही पहाड़ की सबसे प्रसिद्व अमर प्रेम कहानी है। यह दो प्रेमियों के मिलन में आने वाले कष्टों, दो जातियों, दो देशों, दो अलग परिवेश में रहने वाले प्रेमियों की कहानी है। सामाजिक बंधनों में जकड़े समाज के सामने यह चुनौती भी थी। यहां एक तरफ बैराठ का संपन्न राजघराना है, वहीं दूसरी ओर एक साधारण व्यापारी, इन दो संस्कृतियों का मिलन आसान नहीं था। लेकिन एक प्रेमिका की चाह और प्रेमी का समर्पण प्रेम की एक ऐसी इबारत लिखता है जो तत्कालीन सामाजिक ढ़ाचे को तोड़ते हुए नया इतिहास बनाती है।
राजुला मालूशाही लोकगाथा का एक प्रचलित रूप यह भी है । कुमाऊं के पहले राजवंश कत्यूर के वंशज मालूशाही को लेकर यह कहानी है। उस समय कत्यूरों की राजधानी बैराठ वर्तमान चौखुटिया थी। जनश्रुतियों के अनुसार बैराठ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे, उनकी कोई संतान नहीं थी, इसके लिए उन्होंने कई मनौतियां मनाई। अन्त में उन्हें किसी ने बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करे तो उन्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है। वह बागनाथ के मंदिर गये वहां उनकी मुलाकात भोट के व्यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में वहां आये थे।  दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लडक़ा और लडक़ी हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। ऐसा ही हुआ भगवान बागनाथ की कृपा से बैराठ के राजा का पुत्र हुआ, उसका नाम मालूशाही रखा गया। सुनपत शौका के घर में लडकी हुई, उसका नाम राजुला रखा गया।  समय बीतता गया, जहां बैराठ में मालू बचपन से जवानी में कदम रखने लगा वहीं भोट में राजुला का सौन्दर्य लोगों में चर्चा का विषय बन गया। वह जिधर भी निकलती उसका लावण्य सबको अपनी ओर खींचता था।
पुत्र जन्म के बाद राजा दोलूशाही ने ज्योतिषी को बुलाया और बच्चे के भाग्य पर विचार करने को कहा। ज्योतिषी ने बताया कि हे राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसकी अल्प मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिये जन्म के पांचवें दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से करना होगा। राजा ने अपने पुरोहित को शौका देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति तैयार हो गये और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया।  लेकिन विधि का विधान कुछ और था, इसी बीच राजा दोलूशाही की मृत्यु हो गई। इस अवसर का फायदा दरबारियों ने उठाया और यह प्रचार कर दिया कि जो बालिका मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आयेगी तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिये मालूशाही से यह बात गुप्त रखी जाये।
धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगेर राजुला जब युवा हो गई तो सुनपति शौका को लगा कि मैंने इस लडक़ी को रंगीली बैराट में ब्याहने का वचन राजा दोलूशाही को दिया था, लेकिन वहां से कोई खबर नहीं है, यही सोचकर वह चिंतित रहने लगा।
एक दिन राजुला ने अपनी मां से पूछा कि
मां दिशाओं में कौन दिशा प्यारी?
पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा?
देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?
उसकी मां ने उत्तर दिया … दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंड़ी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीली वैराट । तब राजुला धीमे से मुस्कुराई और उसने अपनी मां से कहा कि  हे मां! मेरा ब्याह रंगीले बैराट में ही करना। इसी बीच हूण देश का राजा विक्खीपाल सुनपति शौक के यहां आया और उसने अपने लिये राजुला का हाथ मांगा और सुनपति को धमकाया कि अगर तुमने अपनी कन्या का विवाह मुझसे नहीं किया तो हम तुम्हारे देश को उजाड़ देंगे। इस बीच में मालूशाही ने सपने में राजुला को देखा और उसके रुप को देखकर मोहित हो गया और उसने सपने में ही राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हें ब्याह कर ले जाऊंगा। यही सपना राजुला को भी हुआ, एक ओर मालूशाही का वचन और दूसरी ओर हूण राजा विखीपाल की धमकी, इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निश्च्य किया कि वह स्व्यं वैराट देश जायेगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी मां से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी मां ने कहा कि बेटी तुझे तो हूण देश जाना है, वैराट के रास्ते से तुझे क्या मतलब। तो रात में चुपचाप एक हीरे की अंगूठी लेकर राजुला रंगीली वैराट की ओर चल पड़ी।
वह पहाड़ों को पारकर मुनस्यारी और फिर बागेश्वर पहुंची, वहां से उसे कफू पक्षी ने वैराट का रास्ता दिखाया। लेकिन इस बीच जब मालूशाही ने शौका देश जाकर राजुला को ब्याह कर लाने की बात की तो उसकी मां ने पहले बहुत समझाया, उसने खाना-पीना और अपनी रानियों से बात करना भी बंद कर दिया।  लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे बारह वर्षी निंद्रा जड़ी सुंघा दी गई, जिससे वह गहरी निद्रा में सो गया। इसी दौरान राजुला मालूशाही के पास पहुंची और उसने मालूशाही को उठाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह तो जड़ी के वश में था, सो नहीं उठ पाया, निराश होकर राजुला ने उसके हाथ में साथ लाई हीरे की अंगूठी पहना दी और एक पत्र उसके सिरहाने में रख दिया और रोते-रोते अपने देश लौट गई। सब सामान्य हो जाने पर मालूशाही की निद्रा खोल दी गई, जैसे ही मालू होश में आया उसने अपने हाथ में राजुला की पहनाई अंगूठी देखी तो उसे सब याद आया और उसे वह पत्र भी दिखाई दिया जिसमें लिखा था कि ………
…हे मालू मैं तो तेरे पास आई थी, लेकिन तू तो निद्रा के वश में था, अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो मुझे लेने हूण देश आना, क्योंकि मेरे पिता अब मुझे वहीं ब्याह रहे हैं।  यह सब देखकर राजा मालू अपना सिर पीटने लगे, अचानक उन्हें ध्यान आया कि अब मुझे गुरु गोरखनाथ की शरण में जाना चाहिये, तो मालू गोरखनाथ जी के पास चले आये।
गुरु गोरखनाथ जी धूनी रमाये बैठे थे, राजा मालू ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि मुझे मेरी राजुला से मिला दो, मगर गुरु जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके बाद मालू ने अपना मुकुट और राजसी कपड़े नदी में बहा दिये और धूनी की राख को शरीर में मलकर एक सफेद धोती पहन कर गुरु जी के सामने गया और कहा कि हे गुरु गोरखनाथ जी, मुझे राजुला चाहिये, आप यह बता दो कि मुझे वह कैसे मिलेगी, अगर आप नहीं बताओगे तो मैं यही पर विषपान करके अपनी जान दे दूंगा। तब बाबा ने आंखे खोली और मालू को समझाया कि जाकर अपना राजपाट सम्भाल और रानियों के साथ रह। उन्होंने यह भी कहा कि देख मालूशाही हम तेरी डोली सजायेंगे और उसमें एक लडकी को बिठा देंगे और उसका नाम रखेंगे, राजुला। लेकिन मालू नहीं माना, उसने कहा कि गुरु यह तो आप कर दोगे लेकिन मेरी राजुला के जैसे नख-शिख कहां से लायेंगे? तो गुरु जी ने उसे दीक्षा दी और बोक्साड़ी विद्या सिखाई, साथ ही तंत्र-मंत्र भी दिये ताकि हूण और शौका देश का विष उसे न लग सके। तब मालू के कान छेदे गये और सिर मूड़ा गया, गुरु ने कहा, जा मालू पहले अपनी मां से भिक्षा लेकर आ और महल में भिक्षा में खाना खाकर आ। तब मालू सीधे अपने महल पहुंचा और भिक्षा और खाना मांगा, रानी ने उसे देखकर कहा कि हे जोगी तू तो मेरा मालू जैसा दिखता है, मालू ने उत्तर दिया कि मैं तेरा मालू नहीं एक जोगी हूं, मुझे खान दे। रानी ने उसे खाना दिया तो मालू ने पांच ग्रास बनाये, पहला ग्रास गाय के नाम रखा, दूसरा बिल्ली को दिया, तीसरा अग्नि के नाम छोड़ा, चौथा ग्रास कुत्ते को दिया और पांचवा ग्रास खुद खाया। तो रानी धर्मा समझ गई कि ये मेरा पुत्र मालू ही है, क्योंकि वह भी पंचग्रासी था। इस पर रानी ने मालू से कहा कि बेटा तू क्यों जोगी बन गया, राज पाट छोडक़र? तो मालू ने कहा-मां तू इतनी आतुर क्यों हो रही है, मैं जल्दी ही राजुला को लेकर आ जाऊंगा, मुझे हूणियों के देश जाना है, अपनी राजुला को लाने।  रानी धर्मा ने उसे बहुत समझाया, लेकिन मालू फिर भी नहीं माना, तो रानी ने उसके साथ अपने कुछ सैनिक भी भेज दिये।
मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुंचा, उस देश में विष की बावडियां थी, उनका पानी पीकर सभी अचेत हो गये, तभी विष की अधिष्ठात्री विषला ने मालू को अचेत देखा तो, उसे उस पर दया आ गई और उसका विष निकाल दिया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुंचा, वहां बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खी पाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने अलख लगाई और बोला ’दे माई भिक्षा!’ तो इठलाती और गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और बोली ’ले जोगी भिक्षा’ पर जोगी उसे देखता रह गया, उसे अपने सपनों में आई राजुला को साक्षात देखा तो सुध-बुध ही भूल गया। जोगी ने कहा- अरे रानी तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहां कहां से आ गई? राजुला ने कहा कि जोगी बता मेरी हाथ की रेखायें क्या कहती हैं, तो जोगी ने कहा कि ’मैं बिना नाम-ग्राम के हाथ नहीं देखता’ तो राजुला ने कहा कि ’मैं सुनपति शौका की लडक़ी राजुला हूं, अब बता जोगी, मेरा भाग क्या है’ तो जोगी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा ’चेली तेरा भाग कैसा फूटा, तेरे भाग में तो रंगीली वैराट का मालूशाही था’। तो राजुला ने रोते हुये कहा कि ’हे जोगी, मेरे मां-बाप ने तो मुझे विक्खी पाल से ब्याह दिया, गोठ की बकरी की तरह हूण देश भेज दिया’। तो मालूशाही अपना जोगी वेश उतार कर कहता है कि ’ मैंने तेरे लिये ही जोगी वेश लिया है, मैं तुझे यहां से छुड़ा कर ले जाऊंगा’।
तब राजुला ने विक्खी पाल को बुलाया और कहा कि ये जोगी बड़ा काम का है और बहुत विद्यायें जानता है, यह हमारे काम आयेगा। तो विक्खीपाल मान जाता है, लेकिन जोगी के मुख पर राजा सा प्रताप देखकर उसे शक तो हो ही जाता है। उसने मालू को अपने महल में तो रख लिया, लेकिन उसकी टोह वह लेता रहा। राजुला मालु से छुप-छुप कर मिलती रही तो विक्खीपाल को पता चल गया कि यह तो वैराट का राजा मालूशाही है, तो उसने उसे मारने क षडयंत्र किया और खीर बनवाई, जिसमें उसने जहर डाल दिया और मालू को खाने पर आमंत्रित किया और उसे खीर खाने को कहा। खीर खाते ही मालू मर गया। उसकी यह हालत देखकर राजुला भी अचेत हो गई। उसी रात मालू की मां को सपना हुआ जिसमें मालू ने बताया कि मैं हूण देश में मर गया हूं। तो उसकी माता ने उसे लिवाने के लिये मालू के मामा मृत्यु सिंह (जो कि गढ़वाल की किसी गढ़ी के राजा थे) को सिदुवा-विदुवा रमौल और बाबा गोरखनाथ के साथ हून देश भेजा।
सिदुवा-विदुवा रमोल के साथ मालू के मामा मृत्यु सिंह हूण देश पहुंचे, बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर उन्होंने मालू को जीवित कर दिया और मालू ने महल में जाकर राजुला को भी जगाया और फिर इसके सैनिको ने हूणियों को काट डाला और राजा विक्खी पाल भी मारा गया। तब मालू ने वैराट संदेशा भिजवाया कि नगर को सजाओ मैं राजुला को रानी बनाकर ला रहा हूं। मालूशाही बारात लेकर बैराट पहुंचा जहां पर उसने धूमधाम से शादी की। तब राजुला ने कहा कि ’मैंने पहले ही कहा था कि मैं नौरंगी राजुला हूं और जो दस रंग का होगा मैं उसी से शादी करुंगी। आज मालू तुमने मेरी लाज रखी, तुम मेरे जन्म-जन्म के साथी हो। अब दोनों साथ-साथ, खुशी-खुशी रहने लगे और प्रजा की सेवा करने लगे। यह कहानी भी उनके अजर-अमर प्रेम की दास्तान बन इतिहास में जड़ गई कि किस प्रकार एक राजा सामान्य सी शौके की कन्या के लिये राज-पाट छोडक़र जोगी का भेष बनाकर वन-वन भटका।
उत्तराखंड की दन्त-कथाएं एवं आंचलिक गीत किसी भी अन्य क्षेत्र और आँचल की तरह ही प्रेम प्रधान हैं।  हरू हीत, जगदेच पंवार, रामी बौराणी, राजुला मालूशाही आदि यहाँ की लोक गाथाओं के प्रमुख प्रेमी युगल हैं। झोडे, चांचरी, न्योले, छोलिया, बाजूबंद आदि लोक नृत्यों एवं लोक गीतों के माध्यम से इनके विषय में काफी कुछ जानने एवं समझने को मिलता है।
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